एक शहर का रिक्त स्थान

एक शहर को छोडऩा वैसा ही है, जैसे अपने जिस्म के किसी अंग से अलग होना। जब आप कुछ वर्षों तक किसी शहर में रहते हैं तो वह आपके भीतर उतर आता है। आपकी सोच-समझ, आचार-व्यवहार, खानपान तक में उसका प्रतिबिंब नजर आता है। एक वक्त के बाद आप शहर में नहीं जीते, बल्कि शहर आप में जीने लगता है। जब उससे बिछडऩे की बारी आती है तो वह आपके भीतर ढेर सारा खालीपन छोड़ देता है। यह रिक्त स्थान, उस शहर के अलावा कोई नहीं भर पाता। जब-तब वह शहर आपके भीतर से झांकता है, कभी गगरी की तरह छलक पड़ता है तो कभी झरने की तरह फूट पड़ता है।

दरअसल, शहर कभी अकेले नहीं होते। गली-चौबारों, इमारतों और लोगों के इतर भी उनमें बहुत कुछ होता है। हर शहर की अपनी तहजीब और तासीर होती है। मिट्टी में अलग तरह का जादू होता है, हवा में कुछ करिश्मा होता है, पानी में और ही बात होती है। उनकी अपनी सुबह और अपनी ही शाम होती है। सबसे मजेदार बात यह है कि कोई शहर अपनी इन नेमतों पर खुद कुंडली मारकर नहीं बैठता। वह दानवीर कर्ण की तरह बिना आंख ऊंची किए, हर किसी को अपनी दौलत लुटाता रहता है। वह नहीं पूछता कि कहां से आए हो, कहां जाओगे, कितने दिन उसके साथ रहोगे। आप कुछ पल के लिए भी किसी शहर से गुजरते हैं तो वह बाहें फैलाए स्वागत करता नजर आता है।

जो चीजें शहर को बनाती हैं, उनमें बाकी सब के अलावा ढेर-सारे किस्से भी होते हैं। एक सांस में 150 दंड लगाने वाले फलां पहलवान से लेकर पतली छड़ी से मारने वाले मास्टरजी और बिना फीस लिए इलाज करने वाले डॉक्टर तक। कचौडिय़ों के स्वाद और गन्ने के रस के ग्लास की साइज, कपड़े रफू करने के उस्तादों से लेकर वहां के अंधे मोड़ तक की कहानियां शहर की फिजां में तैरती रहती हैं। इनमें कई कहानियां ऐसी होती हैं, जो किसी ने देखी नहीं होती, सुनी-सुनाई होती हैं। लोग अपने शहर की शान में कसीदे पढऩे के लिए या यूं कहें तो शेखी बघारने के लिए पीढिय़ों तक इन्हें चलाते रहते हैं। उन किस्सों के बगैर शहरों का जायका बदल जाता है। शहर ये किस्से खुद वहां आने वाले लोगों को बांटते रहते हैं।

ऐसा लगता है, जैसे शहर सिर्फ देने के लिए बने हैं और वे अनवरत इसी काम लगे नजर आते हैं। जो उनमें रहते हैं, वे उसके तौर-तरीकों के साथ कब गड़मड़ हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता। पता तब चलता है, जब आप किसी दूसरे शहर जाते हैं और वहां आपका शहर अंदर से निकल आपके चेहरे, मोहरे और हाव-भाव में मुखर हो उठता है। तब आप अपने शहर के प्रतिनिधि बनकर भीड़ से अलग नजर आते हो। दूसरे शहर के मिजाज पर कभी नाक-मुंह सिकोड़ते हैं तो कभी ठठाके लगाते हैं। इन ठहाकों की आवाज तब और तेज हो जाती है, जब आपको उस भीड़ में अपने ही जैसा चेहरा लिए आपके शहर का कोई मिल जाता है। आपकी बातों में दोनों शहर का अंतर मुख्य मुद्दा बनकर उभर आता है। कैसे लोग हैं यहां के, कैसे बोलते हैं, कैसे खाते हैं, क्या खाते हैं। अरे, ये भी कोई खाना और बोलना है। अगर किसी को देखना हो तो हमारे शहर आकर देखे। और यह जुमला है, जो अधिकतर शहरों के लोग अपने शहर के बारे में इसी शिद्दत के साथ दोहराते हैं।

लेकिन जब आप किसी शहर से विदा लेते हैं, तो सिर्फ उसे शरीर के स्तर पर ही छोड़ पाते हैं। मन के धरातल पर वह वैसे ही बना रहता है। जब छोड़ते हैं तो उतना ही दर्द देता है और जब उससे दूर रहने के आदी हो जाते हैं, तब भी जब-तब पुरानी प्रेमिका की तरह याद आता है। वास्तव में कोई शहर आप से कभी छूटता नहीं। वह आपके भीतर ही बना रहता है। यादों की पोटली में, उम्रभर आपके साथ खिलखिलाता रहता है। जिन लोगों को लगातार शहर बदलने पड़ते हैं, उनके भीतर सारे शहर उसी शिद्दत के साथ मौजूद होते हैं। वे उन शहरों को अपने साथ लेते चलते हैं। आप उनके अंदाज ए बयां में एक-एक शहर के अक्स को महसूस कर सकते हैं।

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