कितने कम सवाल हैं तुम्हारे पास मां

Mother's day 2020

वह पूछती ही कितना है। खाना खा लिया, ठीक से मिल गया था न। काम ज्यादा है तो बीच-बीच में आराम करते रहना। वीडियो कॉल पर देखा आंखें बहुत अंदर नजर आ रही है। इतना दुबला क्यों लग रहा है। नींद नहीं हो रही है क्या ठीक से। किसी बात की ज्यादा चिंता मत करना। जो होगा देख लेंगे। किसी बात की परेशानी नहीं है, बस अपना ख्याल रखना। बचपन से ऐसे ही तीन-चार सवाल हैं। जो मुझ पर सफेदी की परत चढ़ने तक बदस्तूर जारी है। क्या पता वह और सवाल नहीं जानती या उसे पूछना नहीं आता। या फिर इन सवालों के अलावा वह कुछ पूछना नहीं चाहती। उसके लिए पूरी दुनिया के सवालों में से बस उतने ही सवाल काफी हैं जो बता दे कि मैं ठीक हूं। इससे ज्यादा वह कुछ नहीं जानना चाहती। उसे किसी और जानकारी से कोई मतलब नहीं है।

जबकि मैं जानता हूं वह कितना कुछ कहती आई है, बताती रही है। मैं कितना सुनता रहा, कितना अनसुना करता रहा। घर से निकलते वक्त मां ने कहा था कि भूखे मत रहना। रास्ते में रुककर कुछ खा लेना। साथ में पराठे, चटनी-अचार और आलू की सब्जी भी बांधी थी। मैं चिढ़ा भी कि अचार मत रखा करो तेल निकल आता है। बैग, कपड़े, कागज सब खराब हो जाते हैं। फिर साफ भी नहीं होता। जवाब में मां सिर्फ हंस दी थी। कपड़ों और बैग से ज्यादा उसे इस बात की चिंता थी कि लंबे सफर में सब्जी गड़बड़ हुई तो भी अचार काम आ जाएगा।

घर से निकलते ही मैं एक दुकान पर रुका, कुछ चिप्स के पैकेट, नमकीन भी बैग में ठूंस लिए। बड़ा खराब लगता था ट्रेन में छह लोगों के बीच टिफिन खोलकर बैठ जाना। या फिर मुंह छुपाकर इधर-उधर देखते हुए खाते रहना। चिप्स खाते हुए मुंह से आती आवाज में दिलफेंक क्रंच है, किक है, मां के टिफिन का देशीपन 70 के दशक की फिल्मों की याद दिलाता है। जिस पर अब सिर्फ हंसी आती है कि बेटा मैंने तेरे लिए गाजर का हलवा बनाया है।

स्कूल जाते वक्त भी टिफिन ठीक से खाना, लड़ाई मत करना, टीचर जो पढ़ाए उस पर ध्यान देना। और भी न जाने क्या-क्या। मगर स्कूल तो स्कूल ही था। दोस्त थे तो दुश्मन भी। लड़ाई करते नहीं थे हो जाती थी। कभी मेरी बेंच पर कोई बैठ जाता, कभी मेरे दोस्त से कोई भिड़ लेता। टिफिन का खाना अच्छा लगता था, लेकिन बाहर जो जाम, बोर, इमली और उनके साथ चटपटा मसाला मिलता था, उसका क्या करते। टीचर तो रोज ही पढ़ाते थे, लेकिन दूरदर्शन पर फौजी तो बुधवार को ही आता था न। इसलिए उसकी बातें शुरू होती तो फिर रुकती कहां थी। फिर किताब के पन्नों के आखिरी नंबर से क्रिकेट भी तो खेलना होता था। पन्ने घूमाते और जहां रुकता, उसका आखिरी अंक सामने वाले के रन हो जाते।

परीक्षा के दिनों में तो जैसे उसे न जाने क्या हो जाता। पूरे समय नजर रखती। पढ़ रहा हूं या नहीं, कहीं इधर-उधर ध्यान तो नहीं है। आईएमपी के चक्कर में तो नहीं लगा हूं। दोस्तों के साथ पढ़ाई के दौरान किस तरह की बातें चल रही हैं। कितनी बजे उठे, कितनी बजे सोए, कितनी पढ़ाई की। टेस्ट के नंबर कितने आए, आगे कौन-पीछे कौन। उम्र बढ़ी तो नजर और पैनी हो गई। कब कौन से गाने सुन रहा हूं। गुनगुना रहा हूं।

खिड़की पर कितनी खड़ा हूं और कितनी देर से ओटले से नहीं हटा हूं। कौन दोस्त आए, उनसे किस तरह की बात हुई। कौन सी बात थी, जो उनके कमरे में आते ही बंद हो गई। सारा हिसाब जितना मुझे पता था, उतना ही उन्हें भी बिना बताए पता चल जाता। इसका राज क्या था यह आजतक समझ ही नहीं आया। कब मेरे दोस्तों से बात करती, कब टीचर से मिलने पहुंच जाती। चिढ़ भी जाता कि क्या जासूसों की तरह नजर रखती हो, वे बस हंस देती। स्कूल छूटा, कॉलेज पूरा हुआ, नौकरी में पहुंचे तब भी मां की हिदायतें उतनी ही थी, वैसी ही हैं। गिनती के उन सवालों के बीच मैंने जरूर एक सफर पूरा कर लिया है। सफर अपनी समझ का, सफर दुनियादारी का।

और जो सवाल तब मुझे झुंझलाते थे, अब मैं उन्हीं सवालों के सिरहाने रोज रात को सोना चाहता हूं। अब जब किसी सफर पर होता हूं तो टिफिन खोलते हुए अपने बैग पर चटनी की खुशबू और अचार के तेल-हल्दी वाले दाग से ज्यादा उन सवालों को मिस करता हूं। कभी सोचता हूं कि पूरी जिंदगी को एक बार रिवाइंड कर दूं और फिर मां के उन्हीं सवालों से इसे शुरू करूं। इस मदर्स डे मैं मां को उनके वही सवाल गिफ्ट करना चाहता हूं।

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