नीली रेखाएं

वे दो नीली रेखाएं ही तो हैं, लेकिन कितना कुछ बदल दिया है, उन्होंने। तुम्हे याद नहीं होगा, लेकिन मैं तुम्हे संदेश भेजता था। मन ही मन में। रोज नए किस्से गढ़ता था। कोई किस्सा हवाओं ने तुम तक पहुंचाया या नहीं मैं नहीं जानता। मेरी आंखों में तुमने कभी झांका या नहीं मुझे यह भी नहीं मालूम। मैं भी कब हिम्मत जुटा पाया था इतनी। जबकि रोज बात होती थी, ख्वाबों में खयालों में। मैं जानता हूं, वह मेरा एकालाप था। मेरा सारा एकांत तुम्हारे हवाले था। तुम थी और बस मैं था। वैसे मैं भी अक्सर उन मुलाकातों में गुम रहता था। कुछ ही देर में खयालों के पूरे मंच पर सिर्फ तुम होती थी। मैं नेपथ्य में भी कहीं नहीं होता था। जब कुछ नहीं होता था, तब भी तुम होती थी।

फिर सब बदल गया, जैसे बदल जाता है, कहानियों में। वक्त का क्रूर राक्षस सुहाने दिनों की राजकुमारी को जैसे कैद कर लेता है, हकीकत के पिंजरे में। इस राक्षस की जान किसी तोते में नहीं बसती कि उसकी गर्दन मरोड़ कर दिनों को फिर आजाद किया जा सके। यह पिंजडा सिर्फ कैदियों को भीतर करने के लिए खुलता है, बाहर जाने का रास्ता इसमें बना ही नहीं है। यादों पर भी किवाड़ लगा देता है, उसके सुराखों में ठूंस देता है रूई के फोहे, जो सिर्फ होते नरम है, लेकिन इतने तंगदिल की रोशनी की एक किरण भी भीतर नहीं जान देते। न इजाजत देते हैं, यादों के किसी पुरसुकून झोंके को इधर आने की। उबड़-खाबड़ रास्ते पर पैरों का दर्द आत्मा तक पहुंचता है, लेकिन कहीं मरहम नहीं मिलता। वे यादें भी इसलिए बिछड़ जाती है क्योंकि उन पर पुल नहीं बन पाया था। मेरी तरफ से तुम्हारी तरफ जाती तो थींं, लेकिन नहीं मालूम तुम तक कभी पहुंची भी थी या नहीं। फिर तुम्हारी तरफ से कोई पुल मुझे तक कैसे बन सकता था।

आंखों की शर्म और झिझक ने भी तो हमारे बीच ऐसा कोई रास्ता बनने नहीं दिया। मेरी आंखों से निकली कोई किरण भी तुम्हारी आंखों तक कभी जा पाई होगी, क्या पता। जुबान इसमें कहीं नहीं थी, वह हो भी नहीं सकती थी। क्योंकि आंखों को ही इतनी इजाजत नहीं थी तो जुबान अपने लिए इतनी बड़ी ताकत कहां से लेकर आती। उसके कांपने से पहले तो दिल बैठ जाता था। पैर कांपने लगते थे, गले को सूखना ही था, पसीने को आना ही होता था और फिर मुझे मुड़ जाना ही पड़ता था। कई अनचाहे रास्ते, मैंने यूं ही तय किए हैं, जबकि मैं हर बार सिर्फ तुम्हारी ओर बढऩा चाहता था।

एक जो ये अबोलापन था, वह पसरा था और अब तक मौजूद है हमारे दरमियान। सिर्फ इसलिए क्योंकि हवाएं उन्मुक्त होती हैं। वे कभी एक छोर को दूसरे से बांधती नहीं। आम के बौर और बूंदों से नहाई मिट्टी की सौंधी खुशबू तो यहां से वहां पहुंचाती है, लेकिन प्रेम का संदेश भीतर ही छुपा लेती है। पास से गुजरो तब भी दूसरे के अहसास को दबा जाती है। गूढ़ था बहुत वह रास्ता जो पहुंच सकता था, तुम तक। मुझे बता सकता था, कह सकता था, सुना सकता था, सुन सकता था, वही जो मैं खयालों में तुमसे कहता था, वह कभी तुम तक पहुंचा सकता था। लेकिन फिर वही हवा, जो बड़ी निष्ठुर है, जीवन देती है, लेकिन जीने नहीं देती।

अब सोचता हूं तो लगता है कि यदि जिंदगी वैसे शुरू नहीं होती, जैसी हुई तो कैसा होता। हम सब अपनी उम्र के 15 साल बाद पैदा होते। ये दुनिया हमसे पहले वहीं आ चुकी होती थी, जहां ये आज है। क्या पता मैं हवाओं के बजाय कोई संदेश हाथ से टाइप कर भेज पाता और मेरे मोबाइल पर किसी दिन उभर आती वही दो नीली रेखाएं, जो बन जाती कोई पुल हमारे बीच। मैं जान पाता कि हमारे बीच कोई बात है, जो तुम तक पहुंची है। कोई बात है, जो कह दी गई है, कोई बात है, जो अब एकालाप नहीं है। मेरा एकांत, अब सिर्फ एकांत नहीं है, उसमें दो नीली रेखाएं भी हैं, जो तुम्हारी मौजूदगी का उत्सव है। मैं गुजार देता, जिंदगी की सारी शाम उन्हीं नीली रेखाओं को खुद से चिपटाए हुए। वे नीली रेखाएं तुम बनकर रह जातीं मेरे पास हमेशा के लिए। और तब मैं सोचता, वैसी ही दो नीली रेखाएं, तुम्हारे पास भी पहुंची होंगी, मैं बन कर।

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