प्रतिगामी

इस अंधेरे में दीपक जलाना क्यों चाहते हो
अपनी लकीरों को आजमाना क्यों चाहते हो
बह चुका है नदी का सारा पानी यहां से
हाथों में प्यास लिए भटकना क्यों चाहते हो।

इस राख में अंगारों की खोज निरर्थक है
उम्मीदों की नाव पर ये सफर मुश्किल है
अंधेरे को आमंत्रण दे रहे हैं मिलकर सारे
रात को जुगनुओं से सजाना क्यों चाहते हो।

मान लिया किसी रोज बदल जाएगी सूरत
होगा सवेरा अंधेरा चीरकर उगेगा सूरज
सोए हैं चादर तान कर सारे घरों में अपने
तुम उनके लिहाफ हटाना क्यों चाहते हो।

अकेले चने की कहावत बनी ही इसलिए
ताकि नहीं कर पाए कोई बड़ी हिम्मत
खुंटियों में टांग रखी है कहानी की किताबें
उन्हें नए किस्से सुनाना क्यों चाहते हो।

जितनी जल्दी समझ जाओ अच्छा है
ये तेज तलवार है म्यान में ही अच्छा है
बोलने का हुनर है तो कविताएं पढ़ों
किसी की पोल खोलना क्यों चाहते हो।

मुंह में जुबान है तो उसे वहीं कैद रखो
सीने में आतिश है तो वहीं सुलगने दो
अच्छा बुरा जैसा है कबूल कर लो
सच पर लगा बैन उठाना क्यों चाहते हो।

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