ये छापे अगर पड़ भी जाएं तो क्या है

तो एक बार फिर सीबीआई छापों का दौर शुरू हो ही गया। सुप्रीम कोर्ट ने जिस सीबीआई को कभी सत्ता के पिंजरे में कैद तोते की संज्ञा दी थी, वह फिर वही पाठ दोहरा रहा है। राष्ट्रपति चुनाव के एन पहले लालू की नकेल कसकर नितिश को साध विपक्ष की कोशिशों को तार-तार करने की सियासी साजिश साफ नजर आ रही है। इतिहास गवाह है, सीबीआई हमेशा हरी मिर्च खाकर ही राम-राम बोलती है, उसके बाद उन मामलों को सीने में दबाकर फिर पिंजरे में कैद हो जाती है। इसलिए इन छापों से किसी दूरगामी परिणाम की अपेक्षा करना बेमानी है। देशी सियासत में इनका इस्तेमाल हमेशा से ही तात्कालिक लाभ के लिए किया जाता रहा है। इस बार भी तरकश से वही पुराना तीर निकला है।
बहुत दूर नहीं जाएं तो हाल ही के कुछ सीबीआई छापों पर नजर डालकर देखिए। याद हैं ना कुछ ही दिन पहले पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम और उनके बेटे कार्ति से जुड़े कोई 16 ठिकानों पर सीबीआई ने छापे मारे थे। इसके लिए करीब आधा दशक पुराने आईएनएक्स मीडिया घोटाले का चिराग घिसा गया, जिसमें पीटर मुखर्जी, इंद्राणी मुखर्जी भी शामिल थे। मामला मीडिया समूह में गलत तरीके से विदेशी निवेश का है। छापे पड़ते हैं, चिदम्बरम के स्वर मद्धम हुए और सीबीआई भी बिना वक्त गंवाए आगे बढ़ गई।
इसके पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दफ्तर में सीबीआई का छापा पड़ा। केजरीवाल ने इसे सीधे लोकतंत्र पर हमला बताया। बौखलाए केजरीवाल पूरी सियासी कायनात ढहाने को आमादा हो गए। सीबीआई की तरफ से बयान जारी किया गया कि छापा केजरीवाल के बजाय उनके प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर में मारा गया है। अब दोनों के केबिन जुड़े हैं तो हम क्या करें। उस छापे के बाद क्या हुआ किसी को कुछ नहीं पता। केजरीवाल जी जरूर राष्ट्रीय परिदृश्य से लुप्त प्राय हो गए और अनवरत आने वाले उनके बयान भी थम गए। इस बीच उनके एक और करीबी अधिकारी चेतन सांघी पर भी एंटी करप्शन ब्यूरो ने कार्रवाई की। ये सांघी वहीं है, जिन्होंने दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन में भ्रष्टाचार की रिपोर्ट बनाई थी। सांघी की छवि ईमानदार अफसर की रही है और इस कार्रवाई से आहत होकर वे बीमारी की छुट्टी पर चले गए थे।
इसी तरह एनडीटीवी के प्रमोटर्स पर भी कार्रवाई की गई। बताया गया कि एक निजी बैंक का लोन नहीं चुकाया गया है। उसमें किसी शिकायत के आधार पर तुरत-फुरत देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को सक्रिय कर दिया गया। बाद में पता लगा कि संबंधित लोन तो एनडीटीवी पहले ही अदा कर चुकी है। इस मामले को निधि राजदान द्वारा संबित पात्रा को पूरे देश के सामने चुप कराने के प्रतिशोध से जोड़ कर देखा गया। इसके पहले भी एनडीटीवी को एक दिन के लिए बैन करने का निर्णय सुनाया जा चुका था, लेकिन वह मामला दूसरा था।
अब आते हैं लालूजी और उनके परिवार पर मारे गए छापों की तरफ। उन पर इस बार करीब एक हजार करोड़ रुपए के बेनामी सौदों का आरोप है। मामला आईआरसीटीसी की रांची और पुरी स्थित होटल का है, जिसे रेल मंत्री रहते हुए लालूजी ने अपने करीबी की कंपनी सुजाता होटल्स को सौंप दिया। इसके एवज में पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद गुप्ता को दो एकड़ जमीन मिली और कंपनी लालूजी के परिवार की हो गई। लालूजी देश के कोर्ट प्रमाणित भ्रष्ट नेता हैं दो दर्जन से अधिक मामले उन पर दर्ज हैं, चुनाव लडऩे पर पहले ही प्रतिबंध लगा हुआ है। छापों से बिलबिला उठे हैं और मोदी को सत्ता से हटाकर ही दम लेने के दावे ठोंक रहे हैं। इनके पहले मायावती और नेताजी मुलायम सिंह यादव सीबीआई के रिमोट से चलते हुए ऐसे कई दावे-प्रतिदावे कर चुके हैं और उनके हश्र भी देश की जनता के सामने हैं।
अब थोड़ा इतिहास के पन्ने पलटते हैं। 1993 में एक व्यापारी की डायरी मिली थी, जिसमें कहा गया था कि दोनों दलों के तमाम बड़े नेताओं को हवाला के जरिये रुपए पहुंचाए गए हैं। वह मामला भी सीबीआई ही देख रही थी और देख ही रही है। मप्र के अब तक के सबसे बड़े व्यापमं घोटाले की जांच भी सीबीआई ही कर रही है, लेकिन अब तक वह ऐसे किसी बड़े छापे की तरफ नहीं बढ़ पाई। सतीश शर्मा, शिबू सोरेन, अब्दुल करीम तेलगी, कॉमनवेल्थ घोटाला, नेशनल हेराल्ड केस जैसे मामलों की लंबी फेहरिस्त है, जिनमें सीबीआई की भूमिका सत्ता के इशारों पर ही तय होती आई है।
यहां तक कि वोहरा कमेटी साफ कर चुकी है कि सियासत, अफसर और नेताओं के बीच गहरा घालमेल है। शब्दांतर से यही कहा गया कि इनका माफिया एक समानांतर सरकार चला रहा है। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट कह चुकी कि सीबीआई हवाला कांड के आरोपियों को बचाने के लिए जांच में निष्क्रियता बरत रही है, लेकिन सीबीआई का इकबाल अब तक बुलंद है।
बीजेपी तब भी तिममिलाई थी जब गुजरात के स्वर्ण जयंती समारोह से एक दिन पहले सीबीआई ने वहां के पुलिस प्रमुख के खिलाफ मामला दर्ज कर दिया था। बोफोर्स कांड के प्रमुख आरोपी क्वोत्रोची से रेड
कॉनर्र नोटिस वापस लेने के निर्णय के खिलाफ तब भाजपा ने काफी शोर मचाया था, भाजपा के सर्वमान्य वयोवृद्ध मार्गदर्शक लालकृष्ण आडवाणी ने सत्ता में आने पर सीबीआई के सियासी दुरुपयोग की जांच के खिलाफ आयोग बैठाने की घोषणा तक कर दी थी, लेकिन हो उल्टा ही रहा।
मतलब ये कहानी दो ही शिक्षा देती है। ये छापे लाख पड़ जाएं होगा वही और उतना ही जितना सत्ता चाहेगी। और दूसरा सियासत में किसी कर्मकांड का कभी उपसंहार नहीं होता।
कुछ भी कीजिए, लेकिन सबूत मत छोडि़ए। अगर कोई लकीर रह गई है तो फिर उम्रभर उसकी पिटाई होते देखने के अलावा आपके पास कोई चारा नहीं है। लालूजी भी तो चीख-चीख कर यही कह रहे हैं, सीबीआई के पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है। फिर भी छापे पड़ रहे हैं, सब कह रहे हैं कानून अपना काम कर रहा है। जानते सब हैं कौन सा कानून है और वह क्या कर रहा है।

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