लोग जो मर गए हैं

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क्या हो रहा होगा उनके साथ, जो लोग मर गए हैं। खड़े होंगे अभी किसी कतार में, अपनी बारी का इंतजार करते हुए। पूछ रहे होंगे शायद एक-दूसरे से तुम कैसे मरे- तुम कैसे मरे। क्या जवाब दे रहे होंगे वे, किसे जिम्मेदार ठहरा रहे हाेंगे। और वे लोग जिनका हिसाब होना अभी बाकी है, जिनके लिए अभी कोई कतार नहीं बनी है। किसी पीपल या इमली के पेड़ पर जो बैठे होंगे। क्या सोच रहे होंगे इस वक्त। क्या सच में कहीं कोई अदालत है, जहां किया जाता है सभी का हिसाब, गुनाहों पर दलीले सुनी जाती है, नेकी का पुरस्कार दिया जाता है। अगर हां, तो वहां क्या चल रहा होगा इस वक्त। बहुत व्यस्त होंगे ना वे सब भी।

हो सकता है किसी कतार में लगे लोग नारे लगा रहे होंगे। आवाज उठा रहे होंगे। चीख रहे होंगे कि हमारी तो कोई गलती ही नहीं थी। हम तो अपने घरों में ही बैठे थे। बाहर पैर भी नहीं रख रहे थे। किसी ने दूध का पैकेट हमारी देहरी पर रखा था। सब्जियां पहुंचाई थी। उनमें भी कई मासूम थे, क्योंकि उन्हें भी नहीं पता था कि वे सब्जियों, फल, दूध और किराना के साथ यमदूतों की भी होम डिलीवरी कर रहे हैं।

जैसे दुनिया को अब तक यह भी पता नहीं है कि वास्तव में यह आपदा किसी लैब से लीक हुई है या जानबूझकर लीक की गई है, फैलाई गई है। वे तमाम लोग अपनों को याद कर आंसू बहा रहे होंगे, जो खुद उनकी तरह बेकसूर हैं, लेकिन बिना किए गुनाह की सजा भुगतने को अभिशप्त हैं।

और वे लोग जिन्होंने देवदूतों पर लाठियां बरसाई हैं, उन पर थूका है, पत्थर लेकर दौड़े हैं। जो जान बचाने आए थे, उन्हीं पर जिन जाहिलों ने जानलेवा हमले किए हैं। वे क्या सच में वहां सिर झुकाकर बैठे होंगे या किसी स्वयंवर का हिस्सा बनकर अपने पसंद की हूर तलाश रहे होंगे। अगर सच में वहां इंसाफ की देवी आंखों पर बिना पट्‌टी लगाए बैठी होगी तो क्या इनके नंगे जिस्म पर कोड़े नहीं बरसाए जा रहे होंगे।

उन्हें अफसोस तो शायद ही होगा, क्योंकि जरा भी गैरत होती तो पत्थर उठाने से हाथ इनकार कर सकते थे। मुंह से थूक निकलता ही नहीं, विषधर की तरह सारा हलाहल खुद हजम कर दुनिया को बचाने के लिए किस अज्ञात स्थान पर तप करने बैठ जाते। अब उस अदालत में पहुंचने से पहले कांप रहे होंगे उनके पैर, जिस्म थरथरा रहे होंगे। नीचे से आ रही अनाथ बच्चों, बेसहारा हुए बुजुर्गों और बेवा औरतों की चीखें उनके बदन पर तेजाब बनकर बरस रही होगी।

वे लोग जो भूख के मारे दर-दर भटकते हुए ऊपर पहुंच गए हैं। जिन्हें अपने बीवी-बच्चों की चिंता चिता तक खींच ले गई थी। वहां बैठकर भी शायद यही जतन कर रहे होंगे कि मेरे साथ जो हुआ हो गया,लेकिन नीचे अगर कोई बाकी है तो उसकी भूख का इंतजाम कर दिया जाए। उनकी आंखों के आंसू पोंछ लिए जाएं। उनकी रुलाई को किसी तरह मुस्कान में बदल दिया जाए।

बच्चों के पीठ पर बस्ते, बुजुर्गों के हाथ में लाठी और औरतों के कांधों पर किसी का साथ रख दिया जाए। जो उजड़ गया है, उसे बसाने का इंतजाम किया जाए। वे किसी हसरत को लेकर निकले थे, अब भी उन्हीं ख्वाहिशों की उधेड़बुन में लगे होंगे। यही चाहते होंगे बस थोड़ा इंतजाम हो जाए।

और दमक रहे होंगे उनके चेहरे किसी देवदूत की तरह। उनके लिए नहीं होंगी कोई कतारें, जो अस्पताल में मरीज को इंजेक्शन लगाते हुए, किसी का ऑपरेशन करते हुए, किसी को दवा देते हुए वहां तक पहुंचे हैं। वे अनगिनत लोगों की दुआओं पर सवार होकर सबसे ऊपर नजर आ रहे होंगे। उनसे कोई सवाल नहीं कर रहा होगा, उल्टे वे पूछ रहे होंगे कि आखिर हमसे ऐसी क्या खता हुई, जो ये आपदा हमको मिली।

उन्हें अपनी फिक्र नहीं होगी, लेकिन वे यकीनन जानना चाहते होंगे कि कब थमेगा यह सिलसिला, कैसे रुकेगी यह आपदा, कब मिलेगी दवाई, कब होगी इस बीमारी की विदाई। वे जो दूसरों के लिए जीते आए हैं, वहां भी उन्हीं की राहत की मालूमात में लगे होंगे।

और जो इन सभी को मिलकर उस अदालत में आवाज उठाने का मौका मिलेगा। वे क्या बात करेंगे, किसे कठघरे में खड़ा करेंगे। क्या उन लोगों का हिसाब यहां आने से पहले ही नहीं करा देना चाहेंगे, जिन्होंने फिर भी लापरवाहियां बरती हैं। दवाओं की कालाबाजारी की है, राशन में मुनाफा खाया है। जो लोग मुंह मोड़कर बैठे रहे अपनी जिम्मेदारियों से, जिन्होंने इस दौर में भी दवाओं से ज्यादा सियासत ही की है।

जो बचते रहे हैं आरोपों से, जो अपनों के बीच खाई खोदने में लगे हैं। जिन्हें आपदा में भी रंग नजर आ रहे हैं, गुनहगारों के चेहरों में भी अपने-पराए दिखाई दे रहे हैं। उन सबको क्या वे घसीट कर वहीं नहीं ले जाना चाहेंगे, जहां हो रहा होगा सबका हिसाब। वे चाहते होंगे कि एक दिन तो ऐसा आए जब इकट्‌ठा हो इंसाफ, दुनिया देखे, महसूस करे। शायद उस दिन समझ भी जाए।

आपदा आती रही हैं, आपदा आती रहेंगी। हम कभी कमजोर साबित होंगे, कभी हम ताकतवर बनकर उभरेंगे। हम कभी सामना कर पाएंगे, हम कभी मुंह फेरकर बैठ जाएंगे। मगर हम आखिर सांस तक लड़ेंगे, कांधे से कांधा लगाकर लड़ेंगे। सुना है उस दुनिया में जाने से पहले आंखों के सामने घूमती है अपनी सारे करतूतें ताकि वहां पहुंचते ही ये इल्म हो जाए कि क्यों और कैसे आए हैं और अंजाम क्या होगा।

काश कुछ दिन के लिए ही सही ऊपर वाला ये इल्म हम सभी को यहीं धरती पर बांट दे। हो सकता है उसके बाद कोई बीमारी हमारी चौखट पर फटकने की हिम्मत भी न जुटा पाए। प्रार्थना करता हूं ऊपर वाला एक-एक आईना हमें भेज दे।

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