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सत्ता न होती तो क्या होता

मैं और मेरी तन्हाई अक्सर बातें करती हैं। यदि सत्ता नहीं होती तो क्या होता, कैसा होता। मैं यही सोचता रहा पूरी शाम। मैं सवाल उठाता, मेरी तन्हाई उसका जवाब ढूंढने लग जाती। मैं कुछ सोचता तो सत्ता क्या करती, मैं ये बोलता तो वह क्या जवाब देती। वह किस बात की मुझे इजाजत देती वह किस बात पर मुझे बैन करती। सत्ता होती तो कैसा होता न होती तो कैसा होता। ये सत्ता हमने क्यों बनाई है, ये सत्ता हमारी क्या है, ये सत्ता हमारे लिए है या सिर्फ सत्ता के लिए है।

मैं सोच रहा था सत्ता न होती तो कैसा होता। न देश होते न सीमाएं होती। न कोई अपना होता न पराया होता। वैसा ही जैसे कभी पाषाण युग में होता होगा। लोग हैं, अपनी मर्जी के मालिक। शिकार मिल गया खा लिया, नहीं मिला भूखे रह गए। कोई आ गया लड़ लिए। जीत गए फुल गए। हार गए रो लिए। मिल गया पा लिया। खो गया, भूल गए। क्या यह संभव था। नहीं था, हमें तो विकास चाहिए था, इसलिए व्यवस्था चाहिए थी। वह व्यवस्था जो अनुशासित करे। ऑर्डर में लेकर आए। इंसान को इंसान का हक दिलाने में मदद करे।

तन्हाई ने कहा, सत्ता नहीं होती तो लोग उत्श्रृंखल हो जाते, दूसरों का जीना मुश्किल कर देते, बड़ी मछली छोटी मछली को देखते ही निगल जाती। हर समय अपना ही फायदा सोचते, अलग-अलग कबीले बन जाते, खुद की सेनाएं खड़ी कर ली जातीं। पहाड़, नदियां, रेगिस्तान पर बाहुबलियों और धनपशुओं के कब्जे हो जाते। वे जमीन खोद देते, आसमान उधेड़ देते। सारी नदियों का पानी पी जाते, समुंदर को सोख लेते। तहस-नहस कर देते जंगल, हवा में भर देते जहर। इसलिए जरूरी थी व्यवस्था जो सबका हिसाब रखे, सबको हिसाब से रखे। सबको हिसाब से दे और सबसे हिसाब ले।

इसलिए ही तो हमने सत्ता बनाई, एक केंद्र बनाया, जिसके आसपास सौरमंडल की तरह घूमती रहें सारी कायनात। उसे ताकत दी, सक्षम बनाया, अपने ऊपर शासन का हक दिया। धन दिया, लाठी दी। अपना पसीना दिया। अपने हिस्से की थोड़ी-थोड़ी आजादी दी। इस शर्त पर की हुजुर व्यवस्था बनाइये। व्यवस्था बनी और चली भी, लेकिन कैसी चली। व्यवस्था के सूत्र हाथ में आते ही संघर्ष बदल गया। जो व्यवस्था अनुशासन बनाए रखने के लिए थी, उसे सत्ता बनाए रखने के लिए झोंक दिया गया। किसी ने आपातकाल लगाया तो किसी ने संसाधनों की बंदरबांट कर दी। जिस जल, जंगल, जमीन पर सबका हक था, उसके बंटवारे का जिम्मा रेवड़ी की तरह अंधों के हाथ सौंप दिया।

सुविधाएं जुटीं, संसाधन बने, लेकिन जिसकी जितनी बड़ी झोली थी वह उतना बंटोर कर ले गया। आंखों में उम्मीद की चमक लिए बढ़ाए गए कटोरे खाली ही रह गए। मिलता सबको है लेकिन कितना और कैसा इसका हिसाब कोई और रखता है। किसी को छोटी सी रियायत फिजूलखर्ची है और किसी पर करोड़ों की रेहमत उदारता की निशानी और भविष्य के लिए अनिवार्य निवेश है। कोई लूटकर ले गया तो किसी के हाथ खाली ही रहे। सारे संघर्ष हाशिए पर चले गए, एक सत्ता का संघर्ष ही बाकी रह गया। क्योंकि सत्ता रही, तो रसूख रहेगा, बुलंद इंकबाल रहेगा। उसे कायम रखना हर हाल में जरूरी है।

इसलिए अब मेरी ही लाठी मेरी ही पीठ सुजाती है, क्योंकि मुझे सत्ता के रुख और रवैये से आपत्ति है। दरबार में घुसने से पहले तीन बार घुटनों तक पीठ झुकाकर सलाम करना जरूरी है। बादशाह और उनके फर्माबरदारों के सुर में सुर मिलाना जरूरी है। सवाल करने का जो हक था, उस पर भी पहरा है। क्या सवाल उठाऊं, क्या न उठाऊं यह भी पूछना पड़ता है। जो न पूछें तो फिर भुगतना पड़ता है।

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