सबसे भली चुप

silence

भारतीय योग और साधना पद्धति में मौन का बड़ा महत्व है। यहां तक कि श्रीमद् भगवद् गीता में इसे तपस्या की तरह निरूपित किया गया है। यहां मौन से आशय सिर्फ जिव्हा को विराम या विश्राम देने से नहीं है। मौन यानी पूर्ण निस्तब्धता, बाह्य और आंतरिक दोनों ही स्तरों पर पूर्णत: संवादहीनता। न कुछ सुनिए, न महसूस कीजिए, न बोलिये और ना ही किसी तरह से प्रतिक्रिया व्यक्त कीजिए। मौन की उच्चतम स्थिति वही है कि पार्थिव देह और आपके भीतर सिर्फ श्वास-नि:श्वास का फर्क रह जाए।

योगी इस साधना को आत्मपरिवर्तन की राह का पहला चरण मानते हैं। मौन रहकर आपको आत्मअवलोकन का अवसर मिलता है और मन की शांति के लिए निस्तब्धता अचूक है। आप मौन के जरिये भीतर उतरते हैं और फिर मन की सीढिय़ों से आत्मा की गहराइयों तक पहुंच जाते हैं, खुद से रूबरू होते ही सारे सवाल खत्म हो जाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यात्रा में मौन सबसे बड़ा सहभागी बनता है, जो अंतत: आपको वैराग्य की ओर ले जाता है। वैराग्य यानी वह अवस्था, जहां आप स्थिर बुद्धि हो जाते हैं। सर्दी-गर्मी, सुख-दु:ख, मान-अपमान, हानि-लाभ सबमें एक समान रह जाते हैं। फिर न कोई सवाल बचता है और न ही जवाब की कोई अपेक्षा आपको परेशान करती है।

इसलिए मौन रहना आध्यात्मिक उन्नति के लिए, चारों पुरुषार्थों में अंतिम और सर्वोच्च मोक्ष की प्राप्ति की प्रथम सीढ़ी है। मौन दरवाजा है, खुद के भीतर जाने का। हम सब दुनिया की भागदौड़ में, रोजमर्रा की उहापोह में वह दरवाजा बंद किए बैठे हैं। इस वजह से ही बाहर इतना कोलाहल है। मौन के कपाट खोलकर हम सारे शोर-शराबे से ऊपर उठ सकते हैं। और आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि सब यही चाहते हैं कि हम मौन हो जाएं और तमाम उहापोह को परे रखकर आत्मसाक्षात्कार के पथ पर आगे बढ़े। छोटे-छोटे हानि-लाभ और सरोकारों में उलझने के बजाय जीवन का सर्वोच्च सत्ता से साक्षात्कार कराएं। बूंद को सागर में विलीन कर दें।

चुप रहना इसीलिए तमाम मर्ज की अचूक दवा है। खुद को निर्लिप्त कर लीजिए, ये सारी संसारी बातें, दरअसल आत्मोन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। गीता ने यही तो कहा है कि जीवन सफर में हम न कुछ लाते हैं और न लेकर जाते हैं। इस बीच में जो व्यापार हो रहा है, उससे निस्पृह रहकर ही आप जीवन के असली आनंद को प्राप्त कर पाएंगे। जो कर रहे हैं उसे ईश्वर को समर्पित कर दीजिए और जो हो रहा है, उससे उदासीन हो जाइये। सारे प्रपंचों से खुद को अलग कर लीजिए। अथवा जो हो रहा है, उसे साक्षी भाव से स्वीकार कर लीजिए। जो होता है अच्छे के लिए होता है और जो होगा वह भी अच्छे के लिए होगा।

और फिर मौजूदा हालात में तो हम मौन रहकर सर्वोच्च सत्ता के साथ ही भौतिक सत्ता के खेवनहारों का भी कितना भला कर सकते हैं। आप कुछ बोलने से पहले महसूस करेंगे फिर उसे अभिव्यक्त करना चाहेंगे और अगर वह प्रशस्ति नहीं है तो आपकी अभिव्यक्ति तय मापदंडों में है या नहीं इसका फैसला आने तक आपको कठघरे में खड़ा होना पड़ेगा। आप बोले तो क्यों बोले और बोले तो यही क्यों बोले। पहले क्यों नहीं बोले और अभी ही क्यों बोले। और सबसे बड़ा तर्क कि जब दूसरे यही कर रहे थे तब आप क्यों कुछ नहीं बोले। हमसे ही ऐसी क्या अदावत है। गोया कि दूसरों ने अगर कोई गलती की है तो हमें वही गलती दोहराने क्यों नहीं दिया जा रहा है। ये अन्याय है जनता-जनार्दन। न्याय तो यही है ना कि सभी को समान हक मिलना चाहिए। एक तलवार ने अगर गर्दनें काटी हैं तो दूसरी तलवार को नरसंहार के लिए कठघरे में क्यों खड़ा किया जाना चाहिए।

समझ लीजिए अगर प्रशस्ति नहीं है तो मौन ही यथेष्ट है और मौन ही अभीष्ट भी। मौन से ऊपर अगर कुछ है तो वह सिर्फ बैन है। वह भी स्थगित हो ही जाता है।

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