सिर्फ अदालत के कहने से क्या होता है

मुस्लिम महिलाएं सदियों से जिस रूढ़ी का बोझ ढो रही हैं, सर्वोच्च अदालत ने उसे उतारने की दिशा में एक अहम कदम बढ़ाया है। पांच जजों की बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक को गैर कानूनी करार देते हुए केंद्र सरकार से इस बारे में कानून बनाने को कहा है। राष्ट्रवादी सरकार है, इसलिए बहुत उम्मीद है कि कोई कानून बन भी जाए। हालांकि बदलाव की सूरत नजर आ जाएगी, इसकी बहुत उम्मीद फिलवक्त बेमानी लगती है। यह जंग बहुत लंबी है।

वैसे भी भारतीय समाज रूढिय़ों के मामले में बहुत धरती पकड़ टाइप है। खासकर महिला अधिकारों के मामले में सारे कायदे-कानून इन संकीर्णताओं के आगे घुटने टेक देते हैं। महिलाओं के हक के फैसले अदालतों से ज्यादा खाप पंचायतों और घर की चहारदीवारियों में होते हैं, जहां उसकी सिसकियों को भी गले से बाहर जाने की इजाजत नहीं होती। महिलाओं के लिए गली-मोहल्ले के नुक्कड़ और अड़ोस-पड़ोस के ओटले भी अदालतों पर भारी पड़ जाते हैं। प्रगतिशील समाज की सारी अवधारणाएं महिलाओं तक आते-आते दम तोड़ देती है। और इस मामले में झोपड़पट्टी से लेकर महलों तक गजब का साम्य देखने को मिलता है।

बहुत दूर न जाएं और दो-चार मौजूदा कानूनों की बात करें तो सारी हकीकत सामने आ जाएगी। बाल विवाह उन्मूलन को लेकर हमारे पास लंबे समय से कानून है, लेकिन हम जानते हैं कि हर साल हजारों बाल विवाह हो रहे हैं। समाज का एक बड़ा तबका इसके दुष्प्रभाव भुगतने को अभिशप्त भी है। नींद के झोंकों के बीच मासूमों के ब्याह की तस्वीरें अभी भी आंखों से ओझल नहीं हो पाई हैं। ऐसा ही भारी-भरकम कानून दहेज प्रताडऩा को लेकर भी है और उसकी हकीकत हम सब के सामने है। शगुन के नाम पर सदियों से दहेज लिया जा रहा है और उसके लिए लड़कियों को अमानवीय प्रताड़तना देने का सिलसिला भी थमा नहीं है।

कुछ बरस पहले घरेलू हिंसा को लेकर भी बड़ा ही प्रगतिशील कानून बनाया गया है, बावजूद इसके ऑफिस जाते वक्त एक-दूसरी की कलाई में चूड़ी टूटने से लगी चोट के निशान देखकर महिलाएं सहम जाती हैं। बोलती कुछ नहीं है, लेकिन आंखों ही आंखों में सब समझ जाती हैं। जिस्म पर खरोंचों के निशान रूह तक को छलनी किए रहते हैं। कई चोंटें तो वे बाथरूम में फिसल गई थी, जैसे बहानों के पीछे छुपा लेती हैं। अड़ोस-पड़ोस में अब कोई पूछता भी नहीं कि कल शाम को अचानक तुम्हारे घर टीवी इतना तेज क्यों चल रहा था। पूछने की जरूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि सूजी हुई आंखें सब बयां कर देती है।

और फिर निर्भया को कैसे भूल सकते हैं, जिसकी चीखों से पूरा देश दहल उठा था। सडक़ों पर उतर आए हिंदुस्तान की ताकत थी कि सारे कानून बदल गए। इतनी धाराएं बना दी गईं कि लोग उनसे ही सहम उठे कि अरे अब घूर के देखने पर भी अपराध हो जाएगा क्या। अगर किसी ने झूठा आरोप ही लगा दिया तो क्या करेंगे। लेकिन उसके बाद हुआ क्या। निर्भया के कुछ ही दिन बाद मुंबई की एक फोटो जर्नलिस्ट उसी तरह की अमानवीयता का शिकार हुई। यह सिलसिला उसी तरह बदस्तूर जारी है। दफ्तरों से लेकर घर और गली-चौबारों तक पीछा करतीं आंखें स्त्रियों को किस हद प्रताडि़त करती हैं, समझना मुश्किल है।

लगे हाथ अदालत के फैसलों का भी हश्र देख लेते हैं। शाह बानो का प्रकरण हमारे सामने है। शाह बानो मूलत: धार की रहने वाली थीं, उनकी इंदौर में शादी हुई थी। तलाक के बाद उसने धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मांग लिया था। कानून में तलाकशुदा महिला ही लिखा था, हिंदू-मुस्लमान का कोई भेद नहीं था। कोर्ट ने कानून के आधार पर शाहबानो को भरण-पोषण देने का हुक्म सुनाया। तमाम लोग सडक़ पर उतर आए थे कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ में कानून का बेवजह दखल है। यह कौम का व्यक्तिगत मामला है, इसमें अदालत का क्या काम। और असर देखिए कि तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने अदालत के फैसले को रोकने के लिए कानून ही बदल दिया। अब शाह बानो इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी चीखें आज भी महसूस कर सकते हैं।

मैं निराश नहीं हूं, अदालत के फैसले से खुश भी हूं, लेकिन हालातों ने इस हद तक सोचने पर विवश कर दिया है। सामाजिक बदलाव की रफ्तार इतनी धीमी है कि एक बारगी भरोसा ही नहीं होता कि ये बदलाव हमारे नसीब में भी कही हैं। उम्मीद करता हूं कि सरकार जल्द इस पर कानून बनाएगी और वह समाज को मंजूर भी होगा। क्योंकि सिर्फ कानून बनाने से हमारे देश में कुछ नहीं होता। महिलाओं के मामले में तो न जाने क्यों सारे कानून बोथरे साबित होते हैं।

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