मां खादी की चादर दे दे

मोहल्ले में तीन दिन से पानी नहीं आ रहा था। किसी ने नेताजी को खबर की, बर्तन सूखे हैं। लोग बेहाल हो रहे हैं। नेताजी कुछ लोगों के साथ पालिका के दफ्तर पहुंचे अफसरों से बात की। मोहल्ले में लौट आए। एक तंबू तान दिया गया। होर्डिंग बना लिए गए, जिसमें नेताजी के साथ दाएं-बाएं के फोटो थे और मोहल्ले की समस्या का निदान होने तक धरना खत्म न करने का वादा भी। नेताजी आए हार-फूल हुए, भाषण, तालियां और नारेबाजी की गई। पालिका और शहर हिला देने का हौसला दिखाया गया। शाम को पालिका के कुछ अफसर आए। धरना खत्म कराया, पानी शुरू कर दिया गया। लोगों ने उत्साह में भरकर नेताजी को कांधों पर उठा लिया। फिर पटाखे, मिठाई और हार-फूल हुए, गुलाल भी चढ़ा दिया गया। 15 मिनट बाद कोने में नेताजी उन्हीं अफसर से बात कर रहे थे, साला पांडे तो उसी समय पानी चालू करने जा रहा था। अच्छा हुआ चौरसिया ने उसे रोक दिया। तुम्हारी जली मोटर तो ठीक होना ही थी, अपना क्या होता। वो तो ऊपर से फोन आ गया, वरना एक-दो दिन और मजमा जमता तो मजा आता।

हॉस्पिटल में कुछ लोग स्टाफ से झगड़ रहे थे। बिल का कोई इश्यू था शायद। लोगों का कहना था कि वे पैसे जमा करा चुके हैं। इसके बाद भी उनसे और रुपए वसूले जा रहे हैं। पेशेंट की डेथ हो चुकी है, लेकिन अब बॉडी देने में आनाकानी की जा रही है। इस बीच कोई फोन कर देता है। नेताजी कुछ लोगों के साथ पहुंच जाते हैं। आते ही क्या डॉक्टर साब कफन की दलाली कर रहे हो। इत्ता कमा रहे हो फिर भी बीवी-बच्चे पल नहीं रहे क्या, जो गरीबों की लाश भी बेचने में लगे हो। डॉक्टर कुछ बोल पाता उससे पहले दाएं-बाएं आईसीयू के कांच पर लाठी बरसा देते हैं। देर तक हुज्जत होती है, पुलिस आती है। अफसर नेता की सुनते हैं और डॉक्टरों को हुल देकर बॉडी छुड़ा देते हैं। डॉक्टर की बात जुबान पर ही रह जाती है कि सिर्फ दवाई का पैसा ही मांग रहे थे, शव रोकने की बात नहीं थी। अगली बार से नेताजी और पुलिस अफसर के परिवार वालों के लिए अस्पताल फ्री हो जाता है। वे जब-तब आकर जांच कराते हैं, डॉक्टर को दिखाते हैं और दवाई ले जाते हैं। खाएं या न खाएं क्या फर्क पड़ता है।

गांव के स्कूल में मास्टर तीन दिन से नहीं आ रहा था। एक ही तो टीचर था और वह भी गैरहाजिर, पढ़ाई चौपट पड़ी है। स्कूल के नाम पर बच्चे मैदान में खेल-कूदकर लौट आते हैं। चौथे दिन मास्टर आए तो नेताजी ने उन्हें घेर लिया। पंचनामे की कॉपी दिखाई जो पिछले दिन उन्होंने गांव के लोगों के साथ मिलकर बनाया था। मास्टर से कहा, क्या चाहते हो मास्टर। गांव शहर से सात किमी दूर ही है। ऐसा न हो कि कहीं दूर ट्रांसफर हो जाए। पेट्रोल भराते-भराते सारी मास्टरी निकल जाएगी। कहो तो भेज दूं ये पंचनामा शिक्षा अधिकारी को। मेरे चाचा के साले लगते हैं। मैं कहूंगा तो कल आ भी जाएंगे और तुम्हारे सारे कागज-पत्तर खोल देंगे। मास्टर हाथ जोडक़र खड़ा हो जाता है, कह भी नहीं पाता कि बीमार था कैसे आता। अगले दिन से मास्टर रोज गांव आता है, शाम को स्कूल के बाद नेताजी के बच्चे को घर जाकर ट्यूशन पढ़ाता है। परीक्षा से पहले 100 परसेंट श्योर आईएमपी देने का वादा भी किया है, उन्होंने। उसके बाद से कोई नहीं देेखता, बच्चे कब कक्षा में होते हैं और कब पूरे दिन बाहर मैदान में खेलते नजर आते हैं।

नेताजी सडक़ से गुजर रहे थे। देखा एक दुकान के बाहर मजमा लगा है। पास की बस्ती की कोई महिला बिस्किट लेकर गई थी। वह खराब निकला। महिला उसी की शिकायत करने आई थी। बहस के दौरान किसी नौकर ने महिला को धक्का दे दिया। नेताजी के साथ चार-पांच लोग भी पहुंचे। नेता सेठ की उतार रहे थे। इस बीच किसी का हाथ गल्ले तक पहुंचा, किसी का मर्तबानों तक। कितना सामान इधर-उधर हुआ कोई नहीं जानता। फूड डिपार्टमेंट के छापे, पुलिस कार्रवाई के खौफ से दुकानदार कुछ बोल नहीं पाया। एक साथी ने यह कहकर आग और भडक़ा दी कि पिछले महीने भंडारे के समय आए थे, तो सेठ से एक बोरी शकर भी न निकली इतनी बड़ी दुकान से। नेताजी ने समझाया सेठजी थोड़ा धर्म पुन भी करा करो। इसके बाद भंडारे के लिए सेठ पूरा सामान देता है और अब भंडारा हर महीने होता है। क्या फर्क पड़ता है कि गली के मंदिर में हो या नेता के घर में।

खादी की चादर ओढक़र कुछ यही हो रहा है। आज बापू होते तो 150 बरस के होते। वे 15 हजार बरस बाद भी हमारे साथ होंगे, लेकिन उनकी खादी की चादर कहां होगी, कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है।

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