अबकी बार ढाई रुपए की सरकार

हमारे धार में मौलाना कमालुद्दीन का उर्स लगता है। उसमें बड़ा मेला भी होता है, जिसमें पुराने कपड़ों की बड़ी मंडी लगती है। इसमें कोट सूट और स्वेटर से लेकर तमाम तरह की नई-पुरानी डिजाइन के कपड़े आते हैं। खास बात यह होती है कि जैसे-जैसे उर्स पूरा होने वाला होता है, वैसे-वैसे कपड़ों के दाम उतरने लगते हैं। आखिरी दौर में तो लॉट है, सेल है कहकर दुकानदार कौडिय़ों के दाम बेचने पर उतर आते हैं। दुकानदार जानते हैं कि इन पुराने कपड़ों का बोझ लेकर आगे का सफर मुश्किल है। पेट्रोल-डीजल पर सरकार के रुख ने आज मुझे उन सेल वालों की याद दिला दी जो बुला-बुलाकर लोगों को कपड़े बेचा करते हैं। आखिरी दो दिन हैं, 20 रुपए में दस्ताने ले जाइये। 700 का स्वेटर 250 में ले जाइये।

सरकार जनता तो कब से पेट्रोल-डीजल के नाम पर त्राही-त्राही कर रही थी, लेकिन आप थे कि टस से मस होने को तैयार नहीं थे। जबकि हर मंच, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में, कार्यक्रम में मोदी-मोदी से ज्यादा पेट्रोल-पेट्रोल सुनाई दे रहा था। बावजूद इसके वही तर्क, वही जुमले दोहराए जा रहे थे। पेट्रोल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार तय करता है। कंपनियां स्वायत्त है, अपने हिसाब से फैसले लेती है। कंपनियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। पहले ही इतना घाटा है, कंपनियां दाम कैसे कम कर सकती है।

प्रायोजित अर्थशास्त्री भी यही दोहराते, कू्रड ऑइल के दाम शीर्ष पर हैं, ऊपर से डॉलर ने रुपए को चारों खाने चित कर रखा है। सांस भी न ले पा रहा बेचारा। इरान और अमेरिका का चक्कर अलग टंगड़ी डाल रखी है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल के दाम कैसे कम हो सकते हैं। जब जनता ढाई घर चलते हुए टैक्स कम करने की बात करने लगी तो मंत्रियों ने नया राग आलपना शुरू कर दिया। कहने लगे, अगर टैक्स नहीं लेंगे तो शहीदों की विधवाओं को पेंशन कहां से दी जाएगी, मेधावी बच्चों की छात्रवृत्ति का क्या होगा। सडक़ें, पुल, स्कूल, अस्पताल कहां से बनाएंगे। गोया देश का सारा विकास हमारी अर्थी के बुते ही हो रहा है।

फिर सोशल मीडिया पर भक्तों ने प्रपंच रचना शुरू कर दिया। दारू की बोतले निकाल लाए कि हजार रुपए का खंबा एक शाम में खाली कर देते हैं तो देशहित में 89 रुपए का पेट्रोल नहीं भरा पाएंगे क्या। पांच रुपए के लिए कोई राष्ट्रभक्तों को छोडक़र विधर्मियों की सरकार तो न बना देंगे। देखिए, सैनिक 24 घंटे देश की हिफाजत के लिए जान जोखिम में डाले रहते हैं और हम पेट्रोल पर 5 रुपए भी ज्यादा खर्च नहीं कर सकते। कहां गई आपकी देशभक्ति, क्या यही राष्ट्रवादिता है, क्या इसी दिन के लिए देश को आजाद कराने लाखों लोग कुर्बान हुए थे।

आप सोच पड़ जाते हैं कि भाई बात सिर्फ पेट्रोल की नहीं है। पांच रुपए में शहीदों से लेकर सैनिकों तक और किसानों से लेकर बीमार लेकर दौड़ती एम्बुलेंस तक सब थम जाएगी। देश जाम हो जाएगा। इसलिए दिल पर पत्थर रखकर सब पेट्रोल भरा ही रहे थे। और जब पम्प से निकलते तो बड़ी देशभक्त वाली फीलिंग भी आती कि मैंने पूरे देश के विकास में एक बड़ा कदम उठा लिया है। पांच लीटर पेट्रोल भरा लिया है।
लेकिन जनाब, वित्त मंत्री के एक फैसले ने देशक्ति के सारे नारों को संदूक में बंद कर दिया है। गौरव के सारे क्षण हवा हो गए। लाठी, गोली खाएंगे, पेट्रोल भराएंगे से, लॉट है सेल है, 89 रुपए का पेट्रोल 85 में के स्वर सुनाई देने लगे हैं। पता किसे नहीं है कि दो-तीन में तीन राज्यों के चुनाव के लिए आचार संहिता लागू हो सकती है। यानी उर्स खत्म होने को है। जानते हैं पुराने कपड़ों का बोझ

बस अब ये मत कहना कि सरकार का तो काम ही जनता का भला करना है। उसके लिए वह चुनाव का इंतजार नहीं करती। पेट्रोल-डीजल के आसमान छूते दाम से मचा जनता का आर्तनाद सहा नहीं गया। ढाई रुपए खट से कम करा दिए। जो सरकारें अब तक नहीं नहीं की रट लगाए बैठी थी, उन्हें भी हां में हां मिलाना पड़ी। कैसा महान त्याग हुआ डेढ़ रुपए जेटली जी ने एक्साइज घटाया, 1 रुपए कंपनी से कम कराया और ढाई रुपए राज्य सरकार के। ढाई-ढाई मिलकर पांच हो गए। वही नारे फिर दौड़ निकले, जन-जन की एक ही पुकार, अबकी ढाई रुपए की सरकार।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.