सवालों से घबराहट क्यों

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कुछ लोगों को आपत्ति है कि भोपाल की जेल से फरार सिमी आतंकियों के एनकाउंटर पर सवाल क्यों खड़े किए जा रहे हैं। वे आतंकी थे और एक प्रहरी का कत्ल करके जेल से भाग निकले थे। संयोग या सौभाग्य से वे चंद घंटों में घेरकर मार दिए गए। अब इसमें सवाल की गुंजाइश है ही कहां। सही भी है, लेकिन सवाल अगर हैं तो उनके जवाब देने के बजाय पूछने वाले की आस्था और देशभक्ति को कठघरे में खड़ा करने में कौन सी समझदारी है। सवालों के जवाब में ये घबराहट खुद एक सवाल है।

दरअसल अब यह ट्रेंड बनता जा रहा है। या तो आप मुझसे अक्षरश: सहमत हो जाइये अथवा आप तैयार हो जाइये मेरे भाषायी हमलों के लिए। यदि आप तयशुदा राय के अनुसार सोच-समझ नहीं पा रहे हैं तो आप विरोधी हैं या विरोधियों से सहानुभूति रखते हैं। राष्ट्रद्रोहियों के समर्थक हैं और आपकी इस देश के प्रति निष्ठा भी संदिग्ध है। गोया अगर अब भी आपको समझ नहीं आया तो कुछ जांच एजेंसियां भिड़ाकर साबित कर ये सब बातें साबित भी कर दी जाएंगी। विचारों की स्वतंत्रता आपकी सबसे बड़ी शत्रु बनती जा रही है और सवाल खड़े करने का साहस तो मृत्युदंड का भागी बनाने में देर नहीं कर रहा। सुर में सुर मिलाना, देशभक्ति का एक सूत्रीय टेस्ट बन गया है और बेसुरों के लिए इस देश में तो क्या कहीं जगह नहीं है।

सिमी आतंकियों के एक प्रहरी को मारकर फरार होने व चंद घंटों में एटीएस की गोली से मारे जाने की घटना पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है। यह सक्रियता और तत्परता तारीफ के काबिल है, लेकिन अगर किसी के मन में कोई सवाल उठ रहे हैं तो फिर उनका सहजता से सामना करने में परहेज क्यों किया जाता है।

अगर कोई पूछ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी जेल से एक साथ आठ आतंकी फरार कैसे हो गए। फिर फरार होने के बाद भी वे कई घंटों तक साथ ही क्यों बने रहे। तमाम फिल्मी पटकथा लेखकों की तरह उनके दिमाग में ये खयाल क्यों नहीं आया कि वे जितना साथ रहेंगे उतने ही अधिक जोखिम में रहेंगे। अलग-अलग होकर आम लोगों में शामिल होना या अपने ठिकानों तक पहुुंच जाना उनके लिए आसान होगा। फिर यह सवाल भी कि एटीएस का मुकाबला करने लायक हथियार उनके पास कहां से आए। और अगर उन्होंने मुकाबला किया तो वे हथियार वहां से क्यों नहीं मिले। एटीएस उनमें से एक को भी जीवित क्यों नहीं पकड़ पाई। क्या यह अपनी तरह की विफलता नहीं है।

हालांकि इनके साथ कुछ और बातें भी सामने आ रही हैं कि आतंकियों के कपड़े बदले हुए थे, उन्होंने शेविंग कराई थी और कुछ ग्रामीणों ने ही उनका मुवमेंट देखकर पुलिस को सूचना भी दी थी। कुछ ग्रामीणों के इस बाबद बयान भी न्यूज चैनल्स पर दिखाए गए हैं। सारी चीजें सहमत करने वाली हैं, लेकिन वीडियो के बाद खड़े हुए सवालों को लेकर जो आक्रामकता दिखाई जा रही है वह हैरान करने वाली है। औवेसी और दिग्विजयसिंह के सवाल उनकी व्यावसायिक मजबूरी हो सकती है, लेकिन आम आदमी के जेहन में जो सवाल सहजता से उठ रहे हैं, वे भी लोगों को असहज कर रहे हैं।

इन आतंकियों ने जिस प्रहरी की हत्या की, जिस महिला का सुहाग उजाड़ा, जिन बच्चों के सिर से पिता का साया खत्म कर दिया, उन सभी से हमें भी पूरी सहानुभूति है और उन्हें न्याय दिलाने के लिए लडऩे का माद्दा भी रखते हैं। इन आतंकियों की गतिविधियों से इसके पहले भी जिन लोगों को असुविधा या नुकसान उठाना पड़ा है, उन सबके लिए हृदय में उतनी करुणा है, लेकिन कानून का काम बदला लेना नहीं न्याय करना है और न्याय देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए ही बांधी गई है कि वह अच्छे, बुरे, अपराधी और निर्दोष में फर्क न करे। उसकी नजर में सब बराबर हो। कानून और आतंकी के तौर-तरीकों में य ही सबसे बड़ा बुनियादी फर्क है और इस अंतर का बना रहना उतना ही जरूरी है, जितना खुद कानून का।

इसलिए सवालों को मत रोकिए, उनके पीछे की मंशा को समझने की कोशिश कीजिए। चूंकि सवाल अगर थम गए तो लोकतंत्र मर जाएगा।

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