इतनी सस्ती नहीं शहादत

मुंशी प्रेमचंद का एक कहानी संग्रह है सोजे वतन, जिसे अंग्रेज सरकार ने बैन कर दिया था। जितनी कॉपियां थी, वह जला दी गईं। कहानियां थीं ही ऐसीं, शोले बरसाती। पहली कहानी है, संसार की सबसे अनमोल वस्तु। कथानक कुछ यूं था कि एक बेइंतहा खूबसूरत राजकुमारी है, जिसे बाहर किसी ने नहीं देखा, सिर्फ उसके हुस्न के किस्से सुने हैं। वह शादी के लिए अजीब सी शर्त रख देती है कि जो व्यक्ति मेरे लिए संसार की सबसे अनमोल वस्तु लेकर आएगा, उसी से शादी करूंगी। कई लोग जतन करते हैं, लेकिन वह सभी को खारिज कर देती है।

एक युवक आता है, कई बार कोशिश करता है, एक से एक नायाब चीजें लेकर आता है, लेकिन राजकुमारी हर बार उसे अस्वीकार कर देती है। आखिर मैं वह एक डिबिया में एक बूंद खून लेकर आता है। राजकुमारी चौंक जाती है, पूछती है यह क्या है। वह जवाब देता है कि मैं संसार की सबसे नायाब वस्तु की खोज में भटक रहा था। एक जगह मैंने देखा कि दो देशों में युद्ध चल रहा है। तभी मुझे एक घायल सैनिक दिखाई दिया, जिसने अपनी मातृभूमि के लिए जान की बाजी लगा दी थी। मेरे सामने उसने अपनी देह त्यागी, यह उसी सैनिक के जिस्म से निकला लहू का आखिरी कतरा है। यह सुनते ही राजकुमारी, युवक के सामने आ जाती है और उससे शादी के लिए तैयार हो जाती है। वह कहती है कि अपनी मातृभूमि के लिए लड़ते हुए शहीद सैनिक के लहू से अधिक अनमोल वस्तु संसार में कुछ नहीं हो सकती है।

मेरी जानकारी के अनुसार सोजे वतन में सिर्फ पांच कहानियां थीं, लेकिन उन कहानियों ने अंग्रेज सरकार को हिला दिया था। अंग्रेजों की बेचैनी की वजह क्या रही होगी, ऊपर लिखे सारांश में महसूस की जा सकती है। कैसे इस कहानी ने देश की आजादी के दीवानों की रगों में उबलता फौलाद भर दिया होगा। उसी शब्द को जब आप कानून के गुनहगारों की कब्र और अन्य स्मारकों के बाहर लिखा देखते हैं, तो कलेजा छलनी हो जाता है। इस देश ने इतनी शहादतें देखी हैं, उसके बाद शहीद का दर्जा जिस तरह से बांटा जा रहा है, वह कितना अपमानजनक है। एक पूर्व सैनिक पेंशन कम मिलने पर आत्महत्या कर लेता है तो सियासी लोग राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए उसके लिए शहीद का संबोधन इस्तेमाल करने लगते हैं। पुलिस मुठभेड़ में मारे गए सिमी आतंकियों की कब्र के बाहर भी यही लाइन लिखी पाते हैं।

कश्मीर में सेना की गोलियों के शिकार आतंकी बुरहानी वानी को शहीद और स्वतंत्रता सेनानी करार देना पाकिस्तान की मजबूरी है। इसके बगैर वहां कोई सियायतदां जिंदा नहीं रह सकता, लेकिन अपनी ही मिट्टी में पले-बढ़े लोग, अपनों का ही खून बहाने वाले लोगों के लिए, जब वही संबोधन इस्तेमाल करते हैं तो ऐसा लगता है, जैसे किसी ने अलगाव की ऐसी खाई में धकेल दिया है, जहां रोशनी की कोई किरण बाकी नहीं रह गई है। और यह एक तरफा नहीं है। दंगों और धार्मिक उन्मादों में मारे जाने वाले लोगों के लिए भी इस महानतम पवित्र और पूज्य शब्द का घृणित उपयोग हो चुका है।

एक सवाल मन में आता है, ऐसी कौन सी लकीर खींच गई है आपस में, ऐसे कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है। कहां से और कैसे लोगों के मन इतने जहरीले हो गए कि वे कानून और इंसानियत के गुनहगारों को भी शहीद बताकर महिमा मंडित करने में लगे हैं। घबराहट होती है, यह देखकर कि अंग्रेज एक बार जो फूट के बीज इस देश में बो कर गए थे, उसकी फसल अब तक न सिर्फ लहलहा रही है, बल्कि पहले से ज्यादा फलती-फूलती नजर आ रही है। हमें सोचना ही होगा कि आखिर क्या वजह है कि लोग अब भी इस हद तक अलगाव महसूस कर रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि इतने वर्षों बाद भी हम गुनहगारों को फिरके की नजर से देख रहे हैं। अपराध और अपराधियों की कोई धर्म, जाति, संप्रदाय नहीं होता। आतंकियों और उत्पातियों को सिर्फ कानून की नजर से देखना होगा। अफसोस है कि हम अब तक यह नहीं सीख पाए हैं।

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