जब सरहद पर जवान रोता है

ये हम कैसा हिंदुस्तान बना रहे हैं। घर में बच्चे भूख और कुपोषण से बिलबिला रहे हैं और सरहद पर जवान जानवरों जैसा खाना मिलने से परेशान हैं। आखिर कोई तो सीमा होगी हमारे गिरने की। पैसों की भूख क्या इतनी बड़ी है कि देश की सुरक्षा और भविष्य दोनों की सेहत से इस हद तक खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रहे। कौन हैं ये लोग, हमारे अपने बीच के ही हैं या किसी दूसरे देश अथवा ग्रह से आए हैं, जिन्हें अपने देश के नफे-नुकसान से कोई लेना-देना नहीं है। क्या उन्हें जरा इल्म नहीं है कि वे क्या कर रहे हैं।

बीएसएफ के जवान का वीडियो हमारे तंत्र की नस-नस में भर गए भ्रष्टाचार की गवाही दे रहा है। उसे देखकर एक ही कहावत याद आती है कि डायन भी एक घर छोड़ देती है, लेकिन हमारे देश के खैरख्वाह वह भी छोडऩे को तैयार नहीं हैं। आप हर बात पर सरहद पर खड़े जवान की दुहाई दे रहे हैं। नोटबंदी है, लाइन में लोग मर रहे हैं, आप कहते हैं, जरा उनके बारे में सोचिए जो माइनस 13 डिग्री में सरहद पर मुस्तैद खड़े हैं। यदि वे आपकी हिफाजत के लिए इतना सह सकते हैं तो आप देश के लिए इतना नहीं कर सकते। इन दलीलों के आगे कई ने अपने मुंह बंद कर लिए, लेकिन जब सरहद पर खड़ा, वह सैनिक भी दो वक्त के खाने को मोहताज नजर आए तो क्या कहेंगे।

मुझे पता है इस बात के जवाब में यही सवाल दागा जाएगा कि कोई पहली बार सेना या पैरामिलिट्री फोर्स में भ्रष्टाचार का मामला सामने नहीं आया है। इसके पहले भी बड़े-बड़े घोटाले और गड़बडिय़ां उजागर हुई हैं। मान लिया कि पहले बहुत कुछ बुरा हो चुका है, लेकिन अब क्यों हो रहा है। आपके पहले वालों ने देश बर्बाद किया, मान लिया, लेकिन आप क्या कर रहे हैं। यदि सैनिक को रोटी तक नहीं दे पा रहे हैं तो फिर किस मुंह से तरक्की के कसीदे पढ़ रहे हैं। न खाऊंगा न खाने दूंगा भी क्या एक चुनावी जुमला भर था। कौन हैं, जो सैनिकों की थाली पर डाका डाल रहा है। उन्हें सींखचों के पीछे क्यों नहीं ले जाया गया अब तक। क्या पूरा सिस्टम ही आंख, कान बंद करके बैठा है, जिसे सैनिकों को परोसी जा रही थाली में दाल के नाम पर नमक और हल्दी का पानी तथा जली हुई रोटियां कभी दिखाई ही नहीं दी।

शर्म तब आई जब सैनिक की पीड़ा को स्वीकार करने के लिए 56 इंच का सीना भी छोटा पड़ गया। बजाय उसकी पीड़ा को समझने और उसका हल ढूंढने के, उसे गलत ठहराने के हजार बहाने ढूंढे गए। यह प्रचारित किया गया कि जवान पहले भी अनुशासनहीनता कर चुका है। हमारे यहां सवाल खड़े करना और सच सामने लाने की कोशिश ही अनुशासनहीनता की नई परिभाषा हो गई है। तीनों वीडियो सबकुछ कह रहे हैं, लेकिन वह किसी को दिखाई नहीं दिया। बीएसएफ के कैंटिन की जांच-पड़ताल में पूरा वक्त लिया गया। समझ सकते हैं कि ये गोरखधंधा एक दिन से नहीं हो रहा होगा और वह सैनिक भी चीख-चीख कर कह रहा था कि सरकार से कोई नाराजगी नहीं है, सरकार पूरा पैसा देती है, लेकिन बीच में अफसर खा जाते हैं। उन खाने वाले अफसरों पर लगाम लगाने में भी इतनी ढिलाई।

यहां तक कि किसी ने कबूल करने की हिम्मत तक नहीं दिखाई कि सैनिक ने अपना दर्द साझा किया है। हम अवाक हैं कि यह कैसे हो रहा है। तत्काल पूरी ताकत लगाकर सड़ चुके इस सिस्टम को बदला जा रहा है। एक भी दोषी बख्शा नहीं जाएगा। चुनावी सभाओं में जो देश की जिम्मेदारी लेने की दुहाई देते हैं, वे कोई भी मुद्दा सामने आने पर क्यों मुंह छिपाते फिरते हैं। यदि सफलता का श्रेय लेने के लिए पूरी दुनिया में ढोल बजाते हैं तो फिर खामियों को क्यों नजरअंदाज क्यों किया जाता है। क्या इसलिए क्योंकि उसमें खुद के बेनकाब होने का खतरा है।

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