हर नोट पर सवार हैं अनगिनत सपने

बैंकों में अपनी गाढ़ी कमाई को नई मुद्रा से बदलने के लिए धक्के खा रहे लोग चुप हैं, लेकिन उनके चेहरे बोल रहे हैं। 10.30 बजे खुलने वाली बैंक के बाहर 9 बजे से कतार लगाए लोगों की बढ़ी हुई दिल की धडक़न कुछ कह रही है। भूखे-प्यासे घंटों इंतजार कर रहे लोगों ने सारे काम छोड़ दिए हैं। वे सिर्फ उन नोटों के लिए यहां नहीं आए हैं, वे उन सपनों की घुटती सांसों को फिर लौटाना चाहते हैं, जिनके फेफड़ों में सरकार की एक घोषणा ने घना कोहरा भर दिया, जो उन्हें एक पल चैन नहीं लेने दे रहा। एक दिन के अंतराल के बाद बैंक खुली तो वह बेचैनी उन्हें कतारों में ले आई।

कालेधन पर लगाम लगाने की कोशिशों ने पूरे देश की स्थिति बदलकर रख दी है। तीन दिन से जो घमासान मचा है, उसे बयां कर पाना मुश्किल है। आप सिर्फ महसूस कर सकते हो, उस बेचैनी को जो लोगों के चेहरे और बिना नींद के सूजी हुई आंखों से झांक रखी है। लोगों में इस कदर अकुलाहट है कि कुछ समझ नहीं आ रहा है। इतने जतन से जो जरूरतों में कटौती कर एक-एक नोट बचाया था उसे कहां ले जाएं।

क्योंकि ये सिर्फ नोट नहीं हंै, इन पर लोगों के ढेर सारे सपने सवार हैं। किसी नोट पर बेटी की शादी की धूमधाम अंगड़ाई ले रही है तो किसी पर उसकी पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी है। बेटे की पढ़ाई-लिखाई और करियर की चिंताएं हैं तो बीमार मां-बाप के खर्च की आशंकाएं भी इन्हीं नोटों के दरीचों से झांक रही हैं। घर की दीवारों में पड़ी दरारें और उखड़ा पेंट मुंह चिढ़ा रहा है। फर्नीचर में लगी दीमक के अपने सवाल हैं तो बिजली की अस्त-व्यस्त लाइन उठाए गए खतरों का हिसाब मांग रही है। गमलों की जगह पुरानी बोतल और टूटी बाल्टियों में लगे पौधे और मनी प्लांट की शिकायत भी सुन सकते हैं।

बीवी की खुशियों पर लगाए पहरे पूछ रहे हैं कि किस दिन के लिए मोगरे की वेणी की जगह बालों को पल्लू में छुपा लिया गया था। हनीमून टाला गया और हर बार सैर-सपाटों की सिर्फ योजनाएं बनीं। पिकनिक के नाम पर सुबह 4 बजे से उठकर खाना बनाया गया और आसपास के ही किसी स्पॉट पर घूम कर खुद को बहला लिया गया। त्याहारों पर सिर्फ बच्चों के कपड़े आए और मां-बाप अभी तो बनवाए थे, कहकर खुशियां बांटते रहे। जिन्होंने पुराने स्वेटर और कंबल में ठंड गुजारी है, बारिश में भी किसी न किसी बहाने से कार घर पर खड़ी कर बाइक से ऑफिस की दूरी नापी है। अपनी बीमारियों को हल्का सा जुकाम, मामूली खांसी और जरा सा बुखार कह कर घर की दहलीज से लौटाया है, वही दहलीज आज उन नोटों को कठघरे में खड़ा करना चाहती है।

घर के कोने में किसी खूंटी पर टंगे शौक पूछते हैं, क्यों बाबू मोशाय जिंदगी के रंगमंच ने बना दिया ना कठपुतली। अपने लिए 300 रुपए की बांसुरी खरीदने की हिम्मत जुटाने में तीन साल बीता दिए, परसाई की किताबें ऑनलाइन ही पढ़ते रहे। दोस्त जो किताबें लौटाना भूल गए उनके शब्दों को यादों में ही उलीचते रहे। गजल के शौक को यूट्यूब के हवाले कर दिया। थियेटर से किनारा कर पायरेटेड सीडी से ही संडे मनाते रहे। जिन नोटों की नाव से तुम अपनों के सपनों का सफर तय करना चाहते थे, वही नाव अब बीच भंवर में गोते खा रही है। गुल्लक का भरा पेट, जो कभी बच्चों की बर्थ डे पार्टी, क्रिकेट की नई किट और स्कूल की ट्रिप की गारंटी थी, वही गुल्लक अब मिट्टी हुई जाती है। मिट्टी हुए जाते हैं, वह सपने जो तुम इन बड़े-बड़े नोटों के कांधों पर बैठकर देख रहे थे।

जानते हो कि कुछ मुश्किल नहीं है पैसे बदल जाएंगे, नहीं तो खाते में जमा होकर तुम्हारे पास ही रहेंगे, लेकिन दिल है कि इतने सपनों को दांव पर लगा देख घबराता है। चक्कर आने लगते हैं, यह देख-सुनकर कि बड़े नोट बंद होने की खबर से किसी को दिल का दौरा पड़ गया। किसी की सांसें रूठ गई और कोई इस दुनिया को ही अलविदा कह गया। और उधर, ज्वेलरी की दुकानों पर बोरियों में नोट लेकर पहुंचे लोगों की भीड़ मुंह चिढ़ाती है। कहां लोग चार हजार रुपए बदलवाने के लिए धक्के खा रहे हैं और वहीं कोई दो गुना कीमत देकर भी सोना खरीदने के लिए हाथ-पैर जोड़ रहा है, रसूख के बल पर बैंकों से पीछे के रास्ते नोट बदलवा रहा है। नोट एक जैसे ही हैं, लेकिन हर नोट की कहानी बिल्कुल अलग है।

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