जेल को जेल ही रहने दो

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सिमी आतंकियों द्वारा जेल से भागने की घटना ने पूरी जेल व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एनआईए और अन्य एजेंसियों द्वारा उठाए गए सवालों से इतर भी कई प्रश्न हैं, जिनके जवाब ढूंढे जाना बहुत जरूरी है। जेलों में अपराधियों को सुविधाएं उपलब्ध कराने के किस्से ना नए हैं और न ही एकाध बार सामने आए हैं। बावजूद इसके जेलें भ्रष्टाचार का गढ़ बनी हुई हैं, उसी का नतीजा है कि 15 साल में 28 बार मप्र की जेलों से कैदी फरार हो चुके हैं। सवाल वही है आखिर जेलेें कैदियों को बंद रखने में कामयाब क्यों नहीं हो पा रही है।

इस घटना के बाद इंदौर में कोर्ट की रिपोर्टिंग के दौरान की कई घटनाएं याद हो आईं। कैसे कैदियों को कोर्ट पेशी पर लाने वाले पुलिसकर्मी परिजनों से रुपए ऐंठते थे। कोर्ट में उनकी रूबरू मुलाकात कराने, चाय-नाश्ता या खाना खिलाने, बच्चों से मिलवाने, फोन पर बात कराने जैसे तमाम कामों के लिए पुलिसकर्मी पूरी दादागिरि के साथ रुपए वसूलते थे। पांच मिनट के पांच सौ से दो हजार रुपए तक एंठ लेते थे। क्योंकि कोर्ट परिसर में कोई डर नहीं रहता। दिन के बड़े समय वे कोर्ट में पेशी का इंतजार करते रहते थे। कायदे से इस दौरान उन्हें कोर्ट में बनी जेल में रखा जाना चाहिए, लेकिन सांठगांठ से पुलिसकर्मी कोर्ट परिसर को कैदियों के लिए मीटिंग पाइंट बनाते आए हैं। यही वजह है कि पुलिसकर्मियों में कोर्ट मुंशी बनने की होड़ रहती है, क्योंकि यहां उनकी खरी कमाई होती थी।

कोर्ट में मजिस्ट्रेट सहित वरिष्ठ अफसरों की जांच का भी साक्षी रहा हूं। जांच की सूचना लीक होने के बाद भी हर बार जेलों से बड़ी मात्रा में गुटका, पाउच, बीड़ी, सिगरेट और रुपए बरामद होते थे। मुलाकात के लिए आने वाले परिजन को नोटों की बहुत पतली-पतली भोंगली बनाकर बारिक जाली से कैदी तक पहुंचाने के दृश्य भी कई बार देखे हैं। आप सोच सकते हैं, जिन कैदियों को कोर्ट ने समाज से अलग रखने के लिए जेल भेजा है, उन्हें वहां रुपए का क्या काम। बावजूद इसके कैदियों को रुपए के लिए परिजन के सामने गिड़गिड़ाते भी देखा है और यह कहते हुए भी कि अगली बार ज्यादा लेकर आना नहीं तो ये मुझे खाना भी नहीं देंगे। कैदी साफ तौर पर कहते रहे हैं कि जेल में सांस लेने के भी पैसे देने पड़ते हैं, वरना खूब मार पड़ती हैै और ढेर सारा काम कराया जाता है। खाना भी नहीं दिया जाता। जेल से फोन कर व्यापारियों, बिल्डरों आदि से रुपए मांगने के किस्से भी हर शहर की हवाओं में तैरते मिलेंगे। यही वजह है कि हत्या जैसे मामलों में सजा काटकर आए कई बदमाश कुछ ही वर्षों में अथाह धन-संंपत्ति जुटाकर बाहुबली बनने लगे हैं। ऐसे कई उदाहरण आंखों के सामने हैं।

ये सारे उदाहरण चीख-चीख कर कहते हैं कि जेलें कैदियों को निरुद्ध करने के बजाय अपराधों की शरणस्थली बनती जा रही है। हर जेल यात्रा छोटे बदमाश को और शातिर बनाती जाती है। क्या ये किसी को दिखाई नहीं दे रहा या कोई देखना नहीं चाहता। जेल सुधार के नाम पर जितने भी प्रयास किए गए हैं, वे कैदियों को मानवीय अधिकार देने के नाम पर जेलकर्मियों को भ्रष्टाचार की खुली छूट दे रहे हैं। हाई प्रोफाइल कैदी जेल की व्यवस्था को बरबाद करने में सबसे आगे हैं। जेल में तमाम सुविधाएं हासिल करने के लिए वे सोने के टुकड़े फेंकते रहे हैं और उन्होंने देखते ही देखते पूरी व्यवस्था को ही नेस्तनाबुद कर दिया है।

भोपाल जेल की ही बात करें। कैसी जेल है, जहां के सीसीटीवी कैमरे नहीं चलते, ताकि किसी तरह की मनमानी रिकॉर्ड न हो पाए। पूरी जेल एक प्रहरी के भरोसे है, बाकी एसएएफ जवान नींद निकालते हैं। आतंकियों को चॉबी मिल जाती है, चम्मच और प्लेट से हथियार बना लेते हैं, चादरों से सीढ़ी बनाकर 28 फीट की दीवार फांद लेते हैं और किसी को भनक नहीं लगती है। वे एक प्रहरी की हत्या करके भाग निकलते हैं, सब वैसे ही सोते रहते हैं। बाद में जांच की जाती है तो कैदियों की बैरक से काजू-किशमिश और सिगड़ी निकलती है। और ये एक जेल की कहानी नहीं है, खंडवा जेल जहां से पहले सिमी आतंकी भागे थे, वहां भी कमोबेश यही हाल मिले थे। महू की जेल में घुसकर हत्या चुकी है, कैदियों द्वारा आत्महत्या करने की किस्से तो अनगिनत हैं।

एक ही चीज समझ जाती है कि क्या नोट हमारे लिए इतने जरूरी हो गए हैं कि उनकी ख्वाहिश में हम सबकुछ गिरवी रखने को तैयार हो गए हैं। या सियासत और रसूखदारी इस कदर हावी है कि उसने तमाम व्यवस्थाओं को कमल की डंडी की तरह बना दिया है। हाथ लगाते ही चटक जाती है।

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