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अब कहां होता कॉमन मैन

RK Laxman

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आज कॉर्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का जन्मदिन है। अब वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत सदैव हमारी चेतना का आह्वान करती रहेगी। गूगल की गलियों से होकर जब भी उनके कॉर्टून पर नजर जाती है, मन में एक ही सवाल उठता है कि आज के दौर में अगर कॉमन मैन होता तो कहां होता, किस हाल में होता, क्या करता। क्या वह अब भी उसी तरह आवाज उठा पाता या फिर हाशिए पर धकेल दिया गया होता। मुंह पर पट्टी होती और कानों में रुई ठूंसकर आंखों पर काला कपड़ा बांध दिया गया होता।

लक्ष्मण ने शायद यही सोचकर परिपक्व आयु वाला कॉमनमैन बनाया होगा कि आगे चलकर जिम्मेदार जवाब देने के बजाय पूछने वालों पर ही सवाल खड़े किए जाएंगे। ऐसी स्थिति में युवा कॉमनमैन तैश में आ सकता था और वे जानते थे कि आम आदमी का क्या गुस्सा और क्या उसकी बिसात।

इसलिए उन्हें वक्त के उतार-चढ़ाव से गुजर चुके पकी उम्र के व्यक्ति को देश के आम आदमी का प्रतिनिधि बनाया। बाल सिर्फ कानों के ऊपर रखे, क्या पता शायद यही सोचकर कि जितनी भी आवाजें भीतर जाएं थोड़ी उन बालों का चक्कर लगाकर जाएं। क्या पता इससे ही उनकी तल्खी कुछ कम हो जाए। शायद वे जानते थे कि वक्त के साथ आवाजें कम और शोर ज्यादा होना है।

फिर धोती और कुर्ते पर कोट वाला कॉमनमैन यानी पुराने संस्कारों में जकड़ा होकर भी आधुनिक होने को प्रयासरत। धोती छूटी नहीं, लेकिन कोट पहन लिया। नए और पुराने के बीच किसी धु्रव पर खड़ा हुआ। आंखें अक्सर फैली हुईं, मूंछ लंबी लेकिन नीचे झुकी हुईं और चश्मा स्वाभाविक रूप से होना ही था। क्योंकि जो कुछ देखना पड़ रहा है, उसके बाद आंखों का खराब होना लाजमी है। लंबी नाक जरूरी ही थी, क्योंकि वह रोके हुए है। आम आदमी का स्वाभिमान ही तो उसका सबसे बड़ा हथियार है, जो उसे तमाम दबावों के बीच भी आवाज उठाने पर मजबूर कर देता है। नाम भी इसलिए यू सेड ही था।

अगर लक्ष्मण इस दौर में कॉमन मैन रचते तो वह कैसा होता। हो सकता है धोती की जगह ट्राउजर आ जाती। जिंस के जमाने में ट्राउजर वाला आदमी धोती से आधुनिक और नए चलन से पुरातन ही होता। कुर्ते की जगह बुशर्ट आ सकता था और कोट की जगह शायद जैकेट ले लेता। क्योंकि जैकेट में सारे विकल्प खुले होते हैं। एक ढंग से पहनो तो नेहरू और दूसरे से मोदी जैकेट। व्यक्तिगत तौर पर जैकेट की अपनी कोई विचारधारा नहीं होती। अलबत्ता वह पहनने वाले की विचारधारा का अक्स जरूर बन जाती है।

आंखें इतनी ही खुली रहतीं तो मुश्किल होती, बेहतर होता लक्ष्मण उसे चश्मा पहना देते। पहले की तरह नजर का नहीं रंगीन चश्मा, जिसमें सब दिखाई भी दे और किसी को समझ भी न आए कि ये देख क्या रहा है। दरअसल देखने से ही सारा बवाल है। आप देखते हैं तो ही सवाल उठते हैं, नजरअंदाज करना सीख लेंगे तो सारे तूफान-उफान शांत हो जाएंगे।

दूसरा रास्ता और कारगर है कि देखते रहिए, लेकिन किसी को अंदाजा मत होने दीजिए। यानी चुप कर जाइये, कोई बवाल नहीं होगा। मगर आम आदमी की मुश्किल तब भी यही थी और अब भी यही है कि वह अपनी बेबसी को आवाज का ढोल बजाकर ही कुछ कम महसूस कर पाता है। इसलिए जब, जहां मौका मिलता है, बोल देता है। बोलना उसकी ताकत नहीं मजबूरी है।

फिर कोई फर्क नहीं पड़ता नए कॉमनमैन के बाल वैसे ही उड़े होते या फिर घुंघराले होते। बस नाक अगर गायब होती तो वह ज्यादा मुफीद होता। सांस लेने तक नाक का होना ही ठीक है, उससे अधिक यह किसी की आजादी में खलल भी हो सकती है। और अगर सरकारे आला की नजर पड़ जाए तो यह विद्रोह की निशानी भी हो सकता है।

बस मुझे भरोसा है कि पुराना कॉमनमैन होता या नया, ऑक्सीजन की कमी से बच्चों की मौत पर चुप नहीं रह पाता। नोटबंदी, जीएसटी, रेरा के कानून में दबे लोगों की फुसफुसाहट सुनता। ताजमहल जब धब्बा करार दिया जाता तो वह पौछा उठाकर जरूर पहुंच जाता। गोद में भात-भात करते देह त्याग देने वाली बेटी की मूंदी हुई आंखों में भात के सपने तलाशता। हर बात धर्म और देशभक्ति से जोडऩे वालों से सवाल पूछे बिना नहीं रह पाता।

क्योंकि वह जानता था कि सवाल किसी को कितने भी चूभें, लेकिन जब तक ये सवाल जिंदा हैं, तब तक इस देश में लोकतंत्र जिंदा है। और तभी तक कॉमनमैन की धडक़नें और सांसें जिंदा हैं।

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