रिश्तों की सांस नली में कोरोना

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कोरोना से जंग के इस कठिन दौर में सियासत ने मजहब की खाई गहरी की तो जान के जोखिम ने दिलों के बीच भी अघोषित रेखाएं खींच दी है। साथ होकर भी लोग दूर हैं, जरा सी छींक आते ही सारे कसमें-वादे हवा हो जाते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग के बावजूद चार लोगों के बीच हल्की सी खांसी या खराश ही क्या आ जाए 10 घरों से लोग पूछ बैठते हैं, कौन है भाई क्या हुआ है। इस सवाल में छींकने या खांसने वाले की जरा फिक्र नहीं है, सवाल सिर्फ अपनी जिंदगी का है कि कहीं तुम्हारा फोड़ा ये बम मेरी जान न ले ले और इस तुम में क्या-क्या नहीं आ गया है। हर रिश्ता जैसे नई स्याह परिभाषा गढ़ने को आतुर है।

कुछ दिनों पहले एक वीडियो देखा था। एक नन्ही बच्ची पलंग पर है, बेतहाशा रोए जा रही है। बार-बार गले पर हाथ लगाती है, कभी पीछे से गला सहलाती है तो कभी आगे की तरफ हाथों से चोट मारती है। पैर पटकती है। मोबाइल से वीडियो बना रहे दो हाथों के साथ दो जोड़ी आवाजें भी गूंजती है। बेटा लेट जाओ, पानी पी लो, लेकिन कोई उसके करीब जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा।

कलेजे का टुकड़ा यूं बेहाल हो तो किसे अपनी जान की फिक्र होगी, यही सोचता-समझता आया है जमाना अब तक, लेकिन कोरोना ने खौफ किस कदर बढ़ा दिया कि चीखें भी बेअसर है। नहीं जानता उस बच्ची के साथ क्या हुआ होगा। दुआ जरूर करता हूं कि वह स्वस्थ होगी। परिवार अब उसे यूं अकेला नहीं छोड़ रहा होगा।

फिर कुछ कहानियां दफ्तर में साथियों से चलकर आईं। भोपाल के एक पत्रकार पॉजिटिव निकले तो एक साथी के पड़ोसियों ने उन्हें घेर लिया। कहने लगे-एक पत्रकार पॉजिटिव निकला है। आप भी शहर में घूम रहे हैं, क्या पता उनके संपर्क में भी आए हाेंगे। इसलिए बेहतर होगा कि या तो आप घर में ही रहे अथवा कुछ समय के लिए अपार्टमेंट ही छोड़ दें।

ऐसा एक-दो नहीं आधा दर्जन साथियों के साथ हुआ। पड़ोसियों ने साफ कह दिया कि आप बाहर आना-जाना कर रहे हैं तो कृपया कुछ दिन बाहर ही अपना इंतजाम कर लें। उन्हें समझाना मुश्किल था कि जिस तरह कोरोना का इलाज करना जरूरी है, उतना ही विश्वसनीय सूचनाएं पहुंचाना भी आवश्यक है। सर्दी-खांसी की आवाज सुनकर ही पड़ोसियों को क्वारेंटाइन सेंटर भेजने वाले कई किस्से भी हवाओं में तैर रहे हैं। और इनकी आक्रामकता में वही अपनी जान जाने का डर समाया हुआ है।

कलेजा तब फट गया जब कोरोना से पिता की मौत के बाद बेटा उनके अंतिम संस्कार का जोखिम उठाने का साहस नहीं जुटा पाया। अफसरों ने उसे समझाने की खूब कोशिश की। बताया कि अस्पताल में जो इलाज कर रहे हैं, मौत के बाद तुम्हारे पिता की देह को जिन्होंने संभाला। मुर्दाघर में रखा, वहां से लेकर आए। ये सब काम करने वाले भी इंसान ही हैं। तुम क्यों इतना घबरा रहे हो। लेकिन बेटा हिम्मत नहीं जुटा पाया। अफसरों ने जब उसे पीपीई किट आदि की जानकारी दी तब भी वह यही कहता रहा कि मुझे तो इसे पहनना उतारना आता नहीं है।

प्राण उस समय सूख गए जब गाड़ी में बैठी मां बिलखते हुए बोली कि आप भी हमारे बेटे हो, आपको सब आता है, आप ही कर दो। कुछ देर पहले पति को खो चुकी महिला बेटे को कैसे उस जोखिम में धकेल सकती थी। आंखों के सामने अफसरों ने अंतिम संस्कार किया। जिस कांधे और मुखाग्नि की उम्मीद में बेटे ज्यादा लाड़ से पाले-पोसे जाते रहे हैं, कोरोना ने उन्हें भी डर की कैद में डाल दिया।

आखिर में वह कहानी आई, जिसने फिर मन की देहरी पर उम्मीद का दीया जलाया। पति को सांस लेने में दिक्कत हुई तो वह उन्हें लेकर अस्पतालों में भटकती रही। पहले कस्बे के सिविल अस्पताल में ले गई। वहां हालत और बिगड़ी तो भोपाल ले आई। यहां कोई डेढ़-दो दिन के संघर्ष के बाद पति साथ छोड़ गए। कसम सात जन्म तक साथ निभाने की खाई थी। उसका भरोसा जताने वाला मझधार में छोड़कर जा चुका था, लेकिन वह कहां जाती। शव शहर से बाहर ले जाने की इजाजत नहीं थी।

पति पॉलिथीन की थैली में लिपटा निष्प्राण पड़ा था। कोई कांधे पर हाथ धरने वाला नहीं था। आंसू पोंछने, दिलासा देने, ढांढस बंधाने वाला तो बहुत दूर की बात है। ऐसे क्षण में वह एम्बुलेंस में देह लेकर अकेली ही निकल पड़ी विश्राम घाट के लिए। सिर्फ ड्राइवर ही साथ था। बाद में एक सहेली और उसके पिता आए। उसने पति की देह को अग्नि के सुपुर्द कर दिया। आखिर तक यूं उनका साथ निभाया।

कोरोना सिर्फ लोगों की जान ही नहीं ले रहा। और भी बहुत कुछ छीन रहा है, जिसकी भरपाई आने वाला वक्त शायद ही कर पाए। मौत का खौफ या जीने की ख्वाहिश कभी इस हद तक भी तारी हो सकती है कि अपने बच्चों और मां-बाप से भी दूर कर देगी, कभी सोचा न था।

हालांकि इन काली घनी रातों जैसे दिन और उससे भी गाढ़ी रातों के बीच उम्मीद की कहानियां भी बाकी हैं। हमें उन्हीं दीयों की कतार अपने घर-आंगन में सजाना है। कोरोना आज या कल चला जाएगा, हम या हमारे किस्से अभी कुछ समय और यहीं रहेंगे। हमें तय करना है कि उनका रंग चटख होगा या वे इतने धूसर होंगे कि मिट्‌टी में मिलकर खो जाएंगे।

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