ताली बजाएं या मातम मनाएं

कुछ ही दिन हुए हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि कहीं भी सैनिक नजर आएं तो सब तालियां बजाकर उनका सम्मान करें। बुधवार को कम पेंशन मिलने से आहत एक पूर्व सैनिक खुदकुशी कर लेता है। समझ नहीं आ रहा है कि सहपूर्व सैनिकों की परेशानी की ओर ध्यान दिलाने के लिए उठाए गए इस कदम पर ताली बजाऊं या फिर मातम मनाऊं। घटना दिल्ली में हुई है, इस वजह से उस पर बवाल अनिवार्य ही था। सारे राजनीतिक दल मैदान में उतर आते हैं और फिर दिल्ली पुलिस तो दिल्ली पुलिस ही है।

दिल्ली पुलिस खुदकुशी करने वाले पूर्व सैनिक रामकिशन ग्रेवाल के परिजन को हिरासत में ले लेती है। उन्हें बात रखने का हक तक नहीं देती। विरोध जताने आए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया को हिरासत में ले लिया जाता है। उन्हें पूर्व सैनिक के परिजन से मिलने तक नहीं दिया जाता। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को थाने में बैठा लिया जाता है। जब देश के गृहमंत्री राजनाथसिंह से इस बारे में सवाल किया जाता है तो वे चुप्पी साध लेते हैं, कहते हैं यह स्थानीय पुलिस का मामला है, वही निपटेगी। यह कहते हुए, वे भूल जाते हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हीं को रिपोर्ट करती है।

वैसे आप यह भी पूछ सकते हैं कि रोज आत्महत्या कर रहे विदर्भ के किसानों के लिए पक्ष-विपक्ष किसी के भी द्वारा ऐसा आंदोलन क्यों नहीं हुआ। जवाब यही मिलेगा कि विदर्भ के किसानों की खुदकुशी में पॉलिटिकल स्कोप नहीं है। उस अंगीठी में अब इतनी आग नहीं रही कि राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें। दिल्ली में हरियाणा के पूर्व सैनिक की खुदकुशी हॉट इश्यू है। इस पर हंगामा हुआ तो सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। विदर्भ के किसानों की मौत के सवाल पर तो सब ही कठघरे में खड़े हैं। कौन सवाल पूछेगा और कौन जवाब देगा। पूर्व सैनिक की खुदकुशी राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है। क्योंकि यह सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उपजे सेंटिमेंट की काट हो सकती है कि जिन सैनिकों के भरोसे पाकिस्तान को धूल चटाने का दावा कर रहे हो, वे ही खुदकुशी को विवश हैं।

और जिन्हें जवाब देना चाहिए वे खुद मैदान में नहीं आते। विरोधियों के पीछे पुलिस छोड़ देते हैं। शायद उन्हें लगता है, इस पचड़े में पडऩे की जरूरत ही क्या है। वैसे उनके पास कोई जवाब नहीं है और वे देना भी नहीं चाहते। वन रैंक वन पेंशन पर पिछली सरकार भी सैनिकों को ठग चुकी और मौजूदा अपने प्रचार के समय से वादा करती आ रही है। बच्चे भी जानते हैं कि राजनीतिक वादे फूलों की वह माला है, जो पहनाई तो बड़े धूमधाम से जाती है, लेकिन कुछ देर में ही निकाल कर कबाड़े की तरह फेंक दी जाती है या नेताजी का रसूख दिखाने के लिए उन्हीं की गाड़ी पर डाल दी जाती है।

वे पुलिस की गलतियों पर भी इसलिए पेशेवर ढंग से खामोश हैं, क्योंकि राजनीति में गलतियां न कबूल की जाती हैं और न ही कभी सुधारी जाती हैं। उन्हें छुपाने के लिए 10 और गलतियां की जाती हैं। ताकि सत्ता की ठसक बनी रहे। इसलिए ही तो प्रदर्शन के लिए गए कांगे्रस उपाध्यक्ष को नॉन सीरियस पार्ट टाइम नेता बताने में भी किसी को हिचक नहीं होती। सियासी दावपेंचों में सैनिक की खुदकुशी हाशिए पर चली जाती है और हाय-हाय और जिंदाबाद-मुर्दाबाद शुरू हो जाती है।

यह सब देखकर ऐसा लग रहा है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस विशाल और महान देश में एक जबरदस्त सियासी जलसा चल रहा है। घात लगाए भेडि़ए की तरह तमाम राजनीतिक दल दूसरों के शर्ट की सफेदी पर नजर गड़ाए हुए हैं। कहीं से एक छींटा उड़ा नहीं कि सब गिद्धों की तरह टूट पड़ रहे हैं। किसी के लिए कोई घटना लोकतंत्र की हत्या, तानाशाही की पराकाष्ठा और कानून को तिलांजलि है तो किसी के लिए सहज सियासी उन्माद। राष्ट्र भक्ति सहित सारी परिभाषाएं गड़मड़ हो चुकी हैं। शब्दों के मायने बदल गए हैं। किसी घटना से किसी का कोई लेना-देना नहीं है, उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब है कि किसी पर खुद की पीठ ठुकवाई जा सकती है और किस की कमर तोड़ी जो सकती है।

जेहन में एक ही बात आती है कि क्या चुनाव इस देश के सबसे बड़े दुश्मन बन गए हैं। पता नहीं कब होने हैं पंजाब, यूपी और गुजरात में चुनाव। भगवान करे जल्द ही हो जाएं तो अच्छा है, वरना पता नहीं कब तक यह सियासी जलसा यूं ही मुद्दों की अर्थियां सजाता रहेगा।

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