चले आइये ये ठहाकों का मौसम है

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इन दिनों घरों से बड़ी खुशबू आ रही है। खुशबू पकवानों की नहीं बल्कि अपनेपन की है। महीनों से उलझे हुए तार जुड़ रहे हैं। ढीले पड़े रिश्तों की धूल झड़ रही है। शिकवा-शिकायत दूर हो रही है। खाने की मेज पर पंसदीदा डिश से लेकर टीवी के रिमोट के लिए हो रहे झगड़ों तक में रिश्तों की मिठास घुली हुई है। एक दिवाली ही तो है जो मोड़ देती है सारे कदमों को, खींच लाती है फिर उसी देहरी, उसी आंगन की तरफ। दिवाली से पहले घर का कोना-कोना स्नेह की रोशनी से जगमगा रहा है।

स्टेशन के पास से गुजरिये तो सिर्फ सामान बांध खड़े लोगों का हुजूम नजर आता है। पीठ पर झोला है, हाथ में ट्रॉली बैग है अगल-बगल में बीवी-बच्चे हैं और आंखों में बस या ट्रेन जल्दी पाने की ख्वाहिश से ज्यादा कुछ वक्त में घर पहुंचने की खुशी दमक रही है। इस सफर के लिए सारी सुख-सुविधाओं को ताक पर रखा हुआ है। 55 की सीट वाली बस में 75 घुसे हुए हैं, ट्रेनों में जितने सीट पर हैं, उससे ज्यादा बीच के पैसेज और बाथरूम के आसपास की खाली जगह तक में पसरे हुए हैं।

सफर में जो मिल जा रहा है वह खा ले रहे हैं और बढ़े जा रहे हैं। किसी के माथे पर कोई शिकन नहीं है। किसी ने रिश्वत देकर टीसी से कोना जुगाड़ा है तो कोई ढाई गुना दाम देकर बस पर चढ़ा है। इनमें कई लोग वे हैं, जो एक रुपए ज्यादा मांग लिए जाने पर कोर्ट-कचहरी तक भिड़ जाते हैं, लेकिन अभी किसी से कोई बैर नहीं है।

एक बेहद अनूठा सा संगीत उनके भीतर झंकृत हो रहा है, जो उनके रोम-रोम को पुलका रहा है। झगड़े-टंटे और सुविधा-असुुविधा की बहस से उन्हें दूर कर रहा है। कहते हैं, अरे क्या करना है। आठ घंटे का तो सफर है, अभी थोड़ी देर में नींद आ जाएगी। अभी थोड़ा सह लो फिर सुबह तो अपने शहर की ही होगी। जाने दीजिए, थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए। कुछ ही देर की बात है।

वैसे दिवाली यहीं से शुरू नहीं हुई। दिवाली शुरू उस दिन हुई थी, जब मोबाइल में तनख्वाह का मैसेज आया था। फिर बोनस डला तो खुशियां झिलमिला उठीं। एक-दूसरे का खयाल आया। पिछले बरस किसके लिए क्या लिया था और किसने क्या कहा था। सब याद आता है। एक-एक की पसंद की चीजें खरीदने के लिए बाजार की भीड़ में खाए गए धक्के जितनी तकलीफ देते हैं, उससे कहीं इस बात का अहसास खुशी देता है कि ये तोहफे जब अपनों के हाथ में पहुंचेंगे तो कितना मजा आएगा।

और घर तो जैसे पूरे साल ही इन दिनों का इंतजार करते हैं। बरामदे में कीचड़ से सने साइकिल के पहियों के निशान फिर उभर आते हैं। टेबल पर उदास रखा टेबल लैम्प फिर अपने रात-रात भर जागने के किस्सों को दोहराने लगता है। पीछे की बालकनियों पर कोयले से उकेरी गईं दास्तानें कई बारिश में धुलने के बाद भी उभर ही आती हैं। पीछे की सीढिय़ां एक-दूसरे की टांग खींचते दोस्तों की चुहलबाजियों के किस्सों में डूब जाती है। थाली, कटोरी, गिलास, गद्दे-तकीये चादरों तक में अनगिनत खट्टे-मीठे लम्हे कुलबुला उठते हैं। और वे आंखें जो हर घड़ी इस इंतजार को जी रही हैं वे तो जैसे अपनी तपस्या को फलिभूत होते देखने को बेकरार हैं।

जिन घरों की सांकल और कॉल बेल ने वह स्पर्श पा लिया है, वे धरती पर स्वर्ग से अधिक उल्लासित हैं। उन घरों के खिडक़ी-दरवाजों से अलग ही रोशनी आ रही है, खुशबू फैल रही है। महफिलें जम रही हैं, पूरे साल के किस्सों की आटा-बाटी हो रही है। घरों से लेकर बाजार, गली-चौराहे और बगीचे तक सितारों की तरह जगमगा उठे हैं। हर कहीं से ठहाकों की आवाजें आ रही हैं। दिवाली चार दिन बाद है, लेकिन हर दिल में वह अभी से खिलखिला रही है।

दिवाली का दीपक जैसे एक-एक शख्स को रोशनी दिखा रहा है कि सालभर करते रहना, जो कुछ भी करना है। आगे बढऩे की जद्दोजहद, नौकरी-धंधे के तनाव, मीटिंग-सेमिनार, प्रेजेंटेशन, बच्चों का स्कूल, टेस्ट, परीक्षा, नेशनल गेम्स और भी जाने क्या-क्या, लेकिन जैसे ही कार्तिक हवाओं में ठंडक घोले तुम बढ़ जाना उस घरोंदे की तरफ जहां पूजा का दीपक रोज तुम्हारी राह में शुभकामनाओं की रोशनी बिखेरता है। उस घर के लिए सभी की मौजूदगी से बड़ा तोहफा कुछ हो ही नहीं सकता।

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