गंगाजल : नया प्रसाद

चुनाव की तैयारियां चरम पर थीं। विरोधी नेताजी पर रोज नए-नए आरोप लगा रहे थे। कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि कैसे इस चक्रव्यूह से निकलें। पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी मतदाता के मन की थाह नहीं मिल रही थी। गोदाम में शराब भरी पड़ी थी, कंबल, साड़ी सब का ढेर लगा था। बांटने जा रहे कार्यकर्ताओं को सब जगह से नकारात्मक फीडबैक मिल रहा था।

लोग कुछ भी लेने को ही तैयार नहीं थे। सभी मोहल्लों से सिर्फ बुरी खबर आ रही थी। जो आता वह यही कहता कि हुजूर महिलाएं कह रही हैं कि ये वाली डिजाइन की साड़ी आप पहले भी दे चुके हो। अलमारी भरी हुई है, एक और लेकर क्या करेंगे। कंबल पहले से रखे हैं, उन्हें संभालना मुश्किल है। शराब के ब्रांड पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। पीढिय़ों से हर चीज पर झपट्टा मारने वाले मतदाता बड़े चूजी हो गए हैंै। बड़े बंगले वाले तो पहले भी भाव नहीं देते थे, लेकिन इस बार तो बस्तियों से भी सब ना में गर्दन हिला रहे हैं। नेताजी ने फौरन सारे कार्यकर्ताओं को इक_ा किया, कोर कमेटी की मीटिंग बुलाई गई। तमाम लोगों के बीच बहस शुरू हो गई। कार्यकर्ताओं को कैसे लुभाएं। प्रलोभन की कौन सी गंगा बहाई जाए, जिससे वे सब कब्जे में आ जाएं।

किसी ने सुझाव दिया कि आजकल बालयोगी ब्रह्मचारिणी की सभा में बड़ी भीड़ उमड़ रही है। उन्हें बुला लेते हैं, जनता धर्म गंगा में गोते लगाएगी और हम उसमें से वोट के मोती चुग लेंगे। आनन-फानन में ब्रह्मचारिणी से संपर्क किया गया। उनके पीए ने पहले फोन ही नहीं उठाया। कई बार कोशिश के बाद किसी तरह आधी रात को बात हुई तो पता चला कि वे आम, जाम और प्याज पार्टी के नेताओं के लिए पहले ही ऐसी कथाएं कर रही हैं। जिसमें धर्म के बाद नेताजी अपना भक्तिभाव दिखाकर जनता पर वोट जाल फेंकते हैं। नेताजी बड़े गिड़गिड़ाए कि अपनी लुटिया भी डूबती जा रही है। कुछ भी करके दो घंटे की बुलेट कथा ही कर दीजिए हमारे लिए। काफी मिन्नतों के बाद चार गुना रेट और मोटे चढ़ावे की शर्त पर बात तय हुई।

कथा के पहले नेताजी ने जमकर प्रचार किया। जगह-जगह होर्डिंग, बैनर-पोस्टर तान दिए। सब जगह ब्रह्मचारिणी के साथ उनके बड़े-बड़े कटाउट लगे। घर-घर निमंत्रण भेजे गए, उनके साथ प्रसाद-पुष्प की आड़ में उपहार भी ढेल दिए गए। सिर झुकाकर नेताजी एक-एक घर की देहरी पर शीश नवाने पहुंचे। पूरे क्षेत्र में धर्म की जय-जयकार होने लगी। नियत दिन कथा शुरू हुई। उनके साथ भोजन-भंडारे भी चल निकले। रोज हजारों लोगों की क्षुधा तृप्त होती। वे पेट पर हाथ घूमाते और नेताजी के सपने बल्लियों उछलने लगते। सप्ताहभर तक नेताजी सब जगह छाए रहे। जिस कार्यकर्ता ने कथा का सुझाव दिया था, उसकी चल निकली। लेकिन यह क्या कथा खत्म होते ही फिर सन्नाटा पसर गया। नेताजी के विरोधी ने भी एक कथा खोल दी। सारी भीड़ उसी तरह वहां धर्म गंगा में डुबकी लगाने लगी।

नेताजी की बोलती बंद हो गई। सांप सूंघ गया। इतना पैसा बहाया, लेकिन हाथ कुछ नहीं आया। यहां से उठी जनता वहां जाकर बैठ गई। लोगों से रमूज लेने की कोशिश की तो कहने लगे, भई धर्म तो धर्म हैं, आप करें या वे। हमारे लिए तो कथा महत्वपूर्ण है। आपने कराई तो आपके पंडाल में थे, अब वे करा रहे हैं तो उनके शामियाने में शामिल हो गए। नेता बोले, पहले तो हमारी ही तुलना गिरगिट से होती थी, लेकिन अब तो जनता ने हमें ही पीछे छोड़ दिया है।

तभी किसी ने सुझाव दिया कि महाराज एक और कथा करा लेते हैं, लेकिन इस बार प्रसाद कुछ दूसरा होगा। नेताजी को कुछ समझ नहीं आया। कोई और रास्ता दिखाई नहीं दिया तो नई कथा की घोषणा कर दी। इस बीच सुझाव देने वाला कार्यकर्ता ढेर सारी सफेद प्लास्कि की बोतल ले आया, जैसे गंगाजल भरने के लिए तीर्थों पर मिलती है। नेताजी का सिर घूम गया, कुछ समझ नहीं आया। कथा के बाद प्रसाद में सभी को एक-एक बोतल दे दी गई। कुछ ही देर में वहां भीड़ दोगुना हो गई।

हर कोई प्रसाद काउंटर पर टूट पड़ा। युवाओं की संख्या कुछ ज्यादा ही थी। कौतुक देख नेताजी ने एक बोतल मंगवाई, खोलकर सूंघा तो माजरा समझ आ गया। बोतल में गंगाजल की जगह पेट्रोल था। समझ आते ही नेताजी ने भगवान का जयकारा लगाया और अगले दिन के लिए बोतल की सप्लाय और बढ़वा ली।

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