पूरा चांद और खुला एटीएम

तो कल रात आकाश में पूरा चांद था। पूरे से भी पूरा और बेहद करीब भी। मैं चांद की यादों में गुम था। तसव्वुर की खिडक़ी से सिर बाहर निकाल कर चांदनी में नहा रहा था। चांदनी मेरे सिर से होते हुए जिस्म के हर हिस्से को रोशन कर रही थी। यह उजाला मेरी धडक़नों को, मेरी सांसों और रूह को दूधिया कर रहा था। मैं धरती पर दूसरा चांद ही हुआ जाता था, तभी किसी ने ऑफिस में बम विस्फोट किया। सारी खिड़कियां हिल गईं, कान सुन हो गए। देखने-समझने की सारी शक्ति छीन गई। बात ही कुछ ऐसी थी। किसी साथी ने कहा, ऑफिस से 300 मीटर दूर एसबीआई का एटीएम खाली पड़ा है और उससे रुपए भी निकल रहे हैं। इससे बड़ी जलन पैदा करने वाली बात उसने बाद में कही कि मैं अभी निकाल कर आ रहा हूं।

मुझे कुछ नहीं समझ आया चांद को इतना भी नहीं कह सका कि कुछ पल मेरी छत पर ठिठके रहना, मैं बस अभी लौटकर आता हूं। और दौड़ पड़ा, एटीएम की ओर, रास्ते में देखता हूं कि एटीएम की तो शटर गिर गई। सारा उत्साह काफूर हो गया, उस साथी के लिए दो चार श्राप निकलने ही वाले थे कि जब खुद निकाल रहा था, तब ही फोन कर देता। ऑफिस आकर बताने की क्या जरूरत थी। तभी ऊपर नजर पड़ी, एटीएम एसबीआई नहीं बल्कि बीओआई का था। मुझे लगा फेफड़ों में फिर आधा किलो ऑक्सिजन आ गई है। अब मैंने गाड़ी और तेज कर दी। फटाक से एसबीआई के एटीएम के बाहर पहुंचा। लाइट जलते देखी तो तसल्ली हो गई। बाहर दो लोग अलाव ताप रहे थे। एटीएम के गार्ड थे। तस्दीक की बाबा पैसे निकल रहे हैं, जैसे ही उन्होंने कहा, हां निकल रहे हैं, दिल बल्लियों उछल पड़ा।

आज मुझे एटीएम फूल मून की तरह हसीन लग रहा था। उसकी दमकती स्क्रीन चांदनी बांट रही थी। और कार्ड लगाने के स्लॉट के बाहर जगमगाती ग्रीन लाइट किसी माशुका के आंख दबाकर किए जाने वाले इशारे से भी ज्यादा रूमानी। कार्ड लगाने से पहले मैंने गार्ड से फिर तस्दीक करने की कोशिश की। बाबा, दो हजार ही निकल रहे हैं या 2500 निकलने लगे। उन्होंने जवाब दिया, नहीं सिर्फ दो हजार निकल रहे हैं। मैंने पूछा आप अंदाजे से कह रहे हो या किसी ने आजमा कर भी देखा है। वे बोले पचासों लोग आजमा चुके हैं, आप भी देख लो। महोब्बत के वक्त कोई अपनी माशुका को चिढ़ाने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। इसलिए मैंने और ज्यादा की ख्वाहिश करने के बजाय, दो हजार की इजाजत पर ही निसार हो जाना लाजमी समझा। कार्ड लगाते वक्त दिल वैसे ही धडक़ रहा था, जैसे मैं अपनी माशुका के होंठों की तरफ होंठ बढ़ा रहा हूं।

कार्ड स्वैप हो गया। मुझे लगा मैं किसी बाधा दौड़ में आ खड़ा हुआ है। ये प्रक्रिया पहले कभी इतनी लंबी नहीं लगी। एटीएम ने पहले मुझसे सुविधाजनक भाषा पूछी। मैंने बिना वक्त गंवाए अंगुली घूमा दी। फिर बैंकिंग पर अंगुली चलाई, फिर सेविंग अकाउंट पर। फिर उसने दो नंबर प्रेस कराए। उसके बाद पिन नंबर पूछा, तब जाकर अमाउंट भरवाया। मुझे एटीएम प्रेमिका से ज्यादा नखरे करता नजर आया। मेरे सब्र का बांध टूट रहा था और वह निष्ठुर मुझे बार-बार घूमा रहा था। वैसे ही जैसे प्रणय निवेदन के पहले कोई चौसर लेकर बैठ जाए कि आओ पहले एक-एक बाजी हो जाए। खैर, धड़धड़ाते दिल से मैंने एटीएम के सारे नाज-नखरे उठाए और दिल को तब सुकून मिला जब स्क्रीन पर नजर आया कि आपका लेनदेन प्रक्रिया के अधीन है। अंदर से घरघराने की आवाज आने लगी तो मुझे लगा, बस मेरा प्रेम परवान चढऩे ही वाला है। 100-100 के करारे नोट बाहर आए तो लगा जैसे चांद को आसमान से उतारकर सीने से लगा रहा हूं। नोट मेरे हाथों में थे और चेहरे पर पूर्णता की तृप्ति।

मैं उस वक्त और अभिभूत हो उठा जब घड़ी पर नजर गई। 11.47 हो रहे थे। मैंने गार्ड से पूछा बाबा भीड़ नहीं है 15-20 मिनट और पैसे खत्म तो नहीं होंगे न। वे बोले मैं अंदर तो नहीं बैठा उसके, लेकिन अभी तो चल जाएंगे। 15 मिनट है, घूमकर आ जाओ, तारीख बदलते ही फिर निकाल लेना। ये शब्द प्रेम की दूसरी पारी के आमंत्रण की तरह थे। मैं फिर उसी उत्साह से भर गया। पहले जाकर दफ्तर में बधाई बांटी कि रुपए निकल रहे हैं। घड़ी अपनी गति से चल रही थी, लेकिन मैं उससे तेज भागना चाहता था। वक्त था कि कटने का नाम नहीं ले रहा था और मैंने जैसे-तैसे कुछ पल बिताए और फिर पैदल ही चल पड़ा, उसी एटीएम की तरफ। इस बार एक सज्जन बाहर खड़े नजर आए। कुतुहलवश पूछ लिया, भाईसाहब पैसे खत्म हो गए क्या, वे बोले नहीं निकल रहे हैं। अंदर जाने से पहले घड़ी पर नजर गई तो मालूम हुआ अभी 11.57 ही हुए हैं। तीन मिनट बाकी हैं, बाहर खड़े शख्स ने दोहराया यही तो दिक्कत है। मैं भी इसीलिए खड़ा हूं।

खैर तीन मिनट नोट की पाबंदी और उससे जुड़े किस्सों में डूब गए। भैया बड़े ज्ञानी थे, उनके भाई बैंक में थे और वे किस्सों पर किस्से सुनाए जा रहे थे कि कैसे धन्ना सेठों ने चार-चार हजार रुपए पकड़ा कर लोगों को दिहाड़ी पर लाइन में लगा रखा है। नोटबंदी की बात थी तो मोदी जी का आना उसमें लाजमी था। कहने लगे, काम अच्छा किया, लेकिन 50 दिन पहले से नोट छाप लेते तो ये दुर्गति नहीं होती। हालांकि वे इतने पर भी नहीं माने, कहने लगे अब तो वह सोने पर भी आएगा। कह देगा कि सोना वही चलेगा, जिस पर मेरी सील होगी, बाकी सब लोहा है। अभी जो लोगों ने ताबड़तोड़ खरीदा है, वह सब निकलवा लेगा। जब वह ऐसा करेगा, तभी मानेंगे कि कोई आदमी है।

बहरहाल तीन मिनट बीत चुके थे और मैं एटीएम से किया महोब्बत का वादा निभाने फिर भीतर पहुंचा। फिर मशीन घरघराई और वैसे ही करारे नोट बाहर आए। मेरी जेब से ज्यादा मेरा कलेजा भर गया। लौटते वक्त चांद पर नजर पड़ी तो वह कुछ छोटा नजर आया। जेब में दमक रही चांदनी उस पर भारी पड़ती दिख रही थी। मैं उसी की बाहों में हाथ डाले, गुनगुनाते हुए चल पड़ा, नीला आसमा सो गया….

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