तुम्हारा क्या करें बलात्कारियों

सात साल की बच्ची, जो तीसरी कक्षा में पढ़ती है। उसकी नजर में दुनिया कैसी होगी। एक बिलान की धरती और चार बिलान का आसमान, बस इतना ही तो होगा उसका संसार। जिसमें घर के लोग, दोस्त, स्कूल, पेड़-पौधे, बगीचे और मिठाइयां आ जाएं। स्कूल, घर, पढ़ाई और खेल इन्हीं के बीच फुदकती होगी वह। ठहाके पूरे मोहल्ले को गूंजाते होंगे, स्कूल सिर पर उठा लेते होंगे। उस मासूम को देखकर किसी को अपना बचपन याद आता होगा तो किसी को अपनी बेटी या बहन की तस्वीर दिखाई देती होगी। लेकिन उन लोगों का क्या, जिन्हें वह मासूम भी सेक्स मटेरियल दिखाई दी।

कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि उन पलों में उसके साथ क्या बीती होगी। वह ेकौन सा वक्त, वह कौन सी घड़ी होगी। एक-एक क्षण उस बर्बरता को उसने कैसे सहा होगा। माता-पिता की गोद में लाड़ से एठने वाली, उन पलों में कितनी छटपटाई होगी। कितनी रोई, चीखी, चिल्लाई होगी। जिसने अब तक बड़ों को लाड़-दुलार करते देखा, उसने यह रूप कैसे बर्दाश्त किया होगा। उसके रोम-रोम में कैसा जहर घुला होगा। सांसें कहां जाकर फेफड़ों में अटक गई होंगी, धडक़नें सीना फाडक़र बाहर आने को बेसब्र होंगी। अचानक कैसा तूफान आया, जिसने उसकी आत्मा तक को छलनी कर दिया। जिस देह से वह दुनिया जीतने की ख्वाब संजो रही होगी, उसकी वही देह उसे कहां ले गई।

्रफूलों सी नाजुक गुडिय़ा के साथ जिस समाज में ऐसा सलूक होता हो, क्या वास्तव में उसे इंसानों का समाज कहलाने का हक होना चाहिए। क्या कसूर था उस मासूम का। बस इतना ही ना कि वह स्त्री देह में पैदा हुई थी। सिर्फ इस बात की इतनी बड़ी सजा कि अब हर सांस वह उस दर्द के साथ जीने को अभिशप्त होगी। आप अपराधी को सरे आम फांसी पर चढ़ा दीजिए, उसे बीच बाजार भीड़ के हवाले कर दीजिए, लेकिन उससे क्या हो जाएगा। उस मासूम का बचपन तो अब कभी लौटकर नहीं आएगा ना। क्या हम उसके चेहरे की मुस्कान कभी लौटा पाएंगे।

क्योंकि आज हम भले ही अपराधियों को सजा देने के लिए सडक़ पर उतर आए हैं, लेकिन असली सजा तो वह बच्ची भुगतेगी। क्या वह जिंदगी में अब किसी पर भरोसा कर पाएगी। उसकी तरफ उठने वाली हर आंख को कैसे देखेगी। क्या खुद को किसी काल कोठरी में बंद कर लेना उसके लिए बेहतर नहीं होगा, क्योंकि सड़े-गले समाज में घने अंधेरे के अलावा उसके लिए अब बचा ही क्या है। पूरी उम्र तमाम लोग उसकी तरफ आते-जाते अजीब नजरों से देखेंगे। उस पर फब्तियां कसेंगे या उसके दुुर्भाग्य पर तरस खाएंगे। दोनों ही दशाओं में वह प्रताडि़त होगी। वह पीडि़त होकर भी अपराधी की जिदंगी जीने का विवश होगी।

समझ नहीं आता कि आखिर क्या करें। कैसे अपनी बेटियों को बचाएं। क्या उनके भीतर कोई जीपीएस चिप लगा दें। उनके ऊपर कोई सीसीटीवी कैमरा लगा दें और पूरे समय उन पर नजर रखें। हर बहन, बेटी के साथ सुरक्षाकर्मी तैनात कर दें, जो 24 घंटे उनकी निगरानी करें, लेकिन क्या इन हालात में भी वे अपनी स्वाभाविक जिंदगी जी पाएगी। या फिर 12-14 वर्ष के होते ही सारे लडक़ों का साइकोमेट्रिक टेस्ट कराएं, जिनमें भी जरा सी गड़बड़ लगे, अपराधिक प्रवृत्ति के अंश दिखाई दें, उन्हें पहले ही अलग कर दें। जब तक वे पूरी तरह सामान्य न हो जाएं, तब तक उन्हें किसी आइलैंड पर ही रखें। देश के सारे पुरुषों के लिए हर वर्ष यह टेस्ट अनिवार्य कर दें। रास्तों पर स्ट्रीट लाइट की जगह स्कैनर लगा दें, जो हर समय पुरुषों के भीतर की उथल-पुथल पर नजर रखे और जैसे ही किसी के दिमाग में कुछ गड़बड़ महसूस हो, उसे तत्काल उठाकर अलग कर दें।

जानता हूं यह सब नहीं कर सकते तो फिर क्या करें। कैसे बच्चियों को भरोसा दिलाएं कि बिटिया ये दुनिया तेरे ही आंगन का विस्तार है। तेरे सपनों का कैनवास है, तू इसमें अपनी मर्जी के रंग भर सकती है। क्या गारंटी है कि वह अपनी कुची उठाएगी और कोई दैत्य उसका कैनवास फाडक़र बाहर नहीं आएगा।

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