कैसी शराब बंदी… डॉक्टर की चिट्ठी और आईटी रिटर्न पर मिल रही बोतलें

सूरत के होटल ताज गेटवे में पहुंचने के बाद एक चीज मुझे बार-बार परेशान कर रही थी। राज्य में शराबबंदी है, लेकिन वहां एक छोटे से कमरे में जैसे बड़ी सी शराब दुकान खुली हुई थी। ऊपर रैक में तमाम ब्रांड की बोतलें जमी हुई थीं, जिन पर बकायदा रेट लिखे हुए थे। 125 रुपए से लेकर कोई 6 हजार रुपए तक की बोतल पर मेरी निगाह पड़ी। मैं असमंजस में पड़ गया, क्योंकि उस एक कमरे में जाने के लिए खासी भीड़ लगी हुई थी। इस भीड़ में महिला, पुरुष, विदेशी पर्यटक तो ठीक युवतियां और बच्चे तक शामिल थे। एक बारगी मुझे समझ ही नहीं आया कि आखिर ये सब हो क्या रहा है।

दिन में कई बार उस दुकान के सामने से गुजरा। हर बार नए लोग नजर आते। मैं हर बार झांककर कुछ टोह लेने की कोशिश करता। जब रहा नहीं गया तो अंदर जा पहुंचा। देखा कई सारे लोग खड़े हुए थे। उनके हाथों में कुछ कागज-पत्तर थे। सामने नोटिस बोर्ड पर तीन-चार नोटिस लगे थे, जिनमें से ज्यादातर गुजराती में थे। एक अंग्रेजी में था, जिसमें लिखा था कि शराब ले जाते समय रास्ते में आपकी चेकिंग हो सकती है, इसलिए परमिट साथ रखें। ऊपर बड़े अक्षरों में एक और नोटिस था, जिस पर लिखा था कि फोटोग्राफी पूर्णत:प्रतिबंधित है। काउंटर पर तीन लोग खड़े थे, जो लोगों के कागज-पत्तर और डिमांड के अनुसार शराब निकालकर दे रहे थे। बाजू में एक सज्जन बक्से में पैक करके सबको बोतलें थमा रहा था। हर बोतल के कवर पर बारकोड लगे हुए थे।

मैंने काउंटर पर खड़े लोगों से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को वहां देख मेरे भीतर की बेचैनी बढ़ रही थी कि आखिर माजरा क्या है। लोग आते बड़े-बड़े बॉक्स में शराब की बोतलें लेते और ट्रॉली में रखकर बाहर निकल जाते। एक सज्जन से पूछने की कोशिश की तो कहने लगे परमिट मिलता है। आपको चाहिए तो परमिट बनवाना पड़ेगा। टूरिस्ट हैं और इसी होटल में ठहरे हैं तो रेलवे या फ्लाइट का टिकट दिखाना पड़ेगा। बगैर परमिट के नहीं मिलेगी।

अब तो मेरी बेचैनी और बढ़ गई। मैंने होटल के एक स्टाफ मेंबर को खंगालने की कोशिश की तो कहने लगा ये तो सब सरकार की अनुमति से ही हो रहा है। सरकार परमिट जारी करती है। जिसका जितना कोटा रहता है, उसे उतनी ही शराब मिलती है। मैंने कहा, लेकिन भाई लोग तो बड़े-बड़े बक्से लेकर जा रहे हैं। इतना परमिट कैसे जारी हो रहा है। तो वह सकुचाते हुए बोला वह तो पूरा सिस्टम है। यह फाइव स्टार है तो यहां दुकान खोली हुई है, एक और जगह ऐसी ही दुकान है, जहां से लोग लेकर जाते हैं।

मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। फिर मैंने एक अन्य साथी से पूछताछ की कोशिश की तो वह इतना ही बोला, अगर आपको चाहिए तो सब व्यवस्था हो जाएगी। थोड़ी महंगी मिलेगी, लेकिन मिल जाएगी। आप तो बता दीजिए कितनी चाहिए। मैंने कहा, नहीं भाई मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है, मुझे तो बस यह जानना है कि लोग शराबबंदी के बाद भी यहां से बक्सों में भर-भरकर बोतलें कैसे ले जा रहे हैं। इतना सुनकर वह मुस्कराता हुआ चल दिया।

अब मेरे सब्र का बांध टूट रहा था। एक सज्जन जो बॉक्स लेकर जा रहे थे। मैंने उन्हें रोक लिया कहा, अगर बुरा न मानें तो मैं आपका परमिट देखना चाहता हूं। उन्होंने जेब में रखे परमिट को जैसे और भींच लिया। कहने लगे, आपको क्या काम है। मैंने कहा, कुछ नहीं मैं तो बस जानना चाहता हूं कि परमिट होता कैसा है और मिलता कैसे है।

तब उन्होंने कहा, देखिए ये तो डॉक्टर की रिपोर्ट पर निर्भर करता है। मैंने कहा, डॉक्टर की रिपोर्ट पर कैसे। तो कहने लगे, आपकी उम्र और सेहत देखकर डॉक्टर रिकमंड कर देते हैं कि आप इतनी शराब ले सकते हैं। उसी के आधार पर परमिट बनाया जाता है। मैंने कहा, ऐसे तो पूरा गुजरात ही डॉक्टर से लिखवा लेगा। तो वे कहने लगे नहीं डॉक्टर भी बड़ा होना चाहिए। हर कोई डॉक्टर के लिखे पर काम नहीं चलेगा। फिर इसके अलावा पांच साल का इनकम टैक्स रिटर्न भी जमा करना होता है। मैं चौंक पड़ा, पूछा भाई रिटर्न का शराब से क्या लेना-देना। इस पर वे मुस्करा कर चल दिए।

मैं सोचता रह गया, ये अच्छी शराबबंदी है, जहां डॉक्टर और रिर्टन देखकर गला तर करने का मौका दिया जा रहा है। यानी वही पी सकता है, जिसे हम पीने देना चाहते हैं। बाकी सबके लिए बोतल खाली है। बापू के गुजरात में शराबबंदी भी ऊंच-नीचे से बच नहीं पा रही है।

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