स्टेशन पर खड़ी लडक़ी

लडक़ी स्टेशन पर खड़ी है। ट्रेन की तरफ पीठ है और सामने कोई है, जिसके साथ वह बातों में मशगूल है। लडक़ी सिर्फ जुबान से बात नहीं कर रही है। उसका पूरा जिस्म बोल रहा है। कभी आंखें मटकती हैं तो कभी भौंहे उठती-गिरती हैं। कभी बाल सहलाती है तो कभी हाथ लहराती है। उस पर टिकी हैं, अनगिनत दूसरी आंखें। वे जो किसी को छोडऩे आए हैं, वे जो खुद किसी यात्रा पर हैं। वे लडक़ी को टुकुर-टुकुर देख रहे हैं। लडक़ी सबको देखकर भी अनजान है।

उसे यूं बातों में डूबी देखकर फैल गई हैं एक आंटी की आंखें। लडक़ी के चेहरे पर ढूंढ रही है कोई परिचित चेहरा। क्या जाने उन्हें याद आ रहा हो, कोई परिचित चेहरा। या यादों से झांक रहा हो खुद का ही चेहरा। हम तो अपने भाई से भी कभी ऐसे नहीं बतियाते थे। एक बार दादी ने दहलीज पर खड़े होकर सामने की छत पर खड़ी अपनी दोस्त से बात करते देख लिया तो खूब डांट पड़ी थी। बात करना है तो घर बुला लो, अच्छे घर की लड़कियों को इस तरह चिल्ला कर बात करना शोभा नहीं देता। तब उनके भीतर एक अच्छे घर की लडक़ी फैल गई और वे उतना ही सिकुड़ गईं। अब उसी सिकुडऩ में जब स्टेशन पर लडक़ी को देखती हैं तो पता नहीं क्या-क्या नजर आता है। कभी बोल भी पड़ती हैं, क्या जमाना आ गया है। आंखों की शर्म चली गई, तब पता नहीं वे किसी वक्त पर अफसोस जताती हैं। वैसे ही टेढ़ी नजर से देखते हुए गुजर जाती हैं।

ट्रेन से उतर कर दो अधड़े चहल-कदमी करते नजर आते हैं। लडक़ी को खड़ी देख, चक्कर खुद ब खुद लंबा हो जाता है। देखना भी चाहते हैं और देख रहे हैं ये जताना भी नहीं चाहते। इसलिए एक नजर फेंक कर दूसरी तरफ घूमा लेते हैं। फिर देखते हैं, फिर घूमा लेते हैं। फिर यही दोहराते हैं। ट्रेन का स्टॉपेज दो मिनट का है, लेकिन इस दो मिनट में ही 20 मिनट सा लंबा अनुभव खींच लेते हैं। फुसफुसाते हैं, अरे, ये कोटा है। मां-बाप घर से पढऩे भेजते हैं और यहां पता नहीं क्या-क्या चलता ये सब है। देखो सामने वाली बोगी में भी सह यही भरे हैं। या तो छुट्टी से आ रहे हैं या छुट्टी पर जा रहे होंगे। बढिय़ा है। उनके इस बढिय़ा में भी खुद लडक़ी के सामने न होने का दर्द साफ झलकता है। ट्रेन सिटी मारती है, वे दोनों हड़बड़ा कर चढ़ जाते हैं, लेकिन नजर नहीं हटा पाते हैं। ओझल होने तक स्टेशन के उसी हिस्से को देखते रहते हैं।

कचौड़ी, फल, कुरकुरे, पकौड़े बेचने वाले वेंडर भी घूरते हुए निकलते हैं और पुलिस के जवान भी। रेलवे के कर्मचारी अभ्यस्त हो गए हैं, फिर भी जैसे बच्चे कुएं में झांकते हैं, कौतुकता से देखते हैं। फिर साथ खड़े साथियों को देखते हैं और दोनों ही नजरें एक-दूसरे को जाने क्या कहती हैं कि कुछ क्षण के लिए बदल जाती हैं। वे काम में लग जाते हैं, लेकिन फिर भी नहीं लगते। फिर देखते हैं, फिर कुछ सोचते हैं और जब तक काम दिमाग पर हावी नहीं हो जाता, वहीं अटके रहते हैं। क्या पता सोचते होंगे कि इस पीढ़ी का कुछ नहीं हो सकता। देखो कैसे मटक-मटक कर बात कर रही है। घरवालों को पता भी नहीं होगा कि बेटी कहां है। वे भी मुंह कसैला करते हैं और निकल पड़ते हैं।

फिर लडक़ों की टोली आती है। उनकी नजर ही नहीं हटती। कोई कहता है, भाई ऐसा अपने साथ कभी होगा क्या। किसी को लगता है, कुछ लोग तो किस्मत लिखाकर लाते हैं। उनकी आंखें चमकती हैं, मुंह में लार भर जाती है, खुले मुंह से बात करते हैं तो भीतर का सब बाहर आने लगता है, चरित्र भी। वे उनके पास जाकर हरकत करने से भी बाज नहीं आते। जोर से हंसते हैं, कह देते हैं, लगे रहो। पीछे पलट-पलटकर देखते हैं, आंखों से खुरचने की कोशिश करते हैं, नोंच ही लेते हैं।
और वह लडक़ी… वह वैसे ही बात कर रही है। क्योंकि वह सिर्फ बात कर रही है। उसके पास बहुत कुछ है कहने को। वह कह रही है, सामने खड़ा लडक़ा सुन भी रहा है। और बाकी लोग… वे वही सुन रहे हैं, जो उनके भीतर गूंज रहा है, सड़ रहा है, सदियों से।

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