मुबारक हो सरकार होने वाली है

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लोकतंत्र में सरकार का होना सबसे बड़ी घटना होती है। लोक और तंत्र दोनों ही मिलकर इसे जन्म देते हैं। लोक अपना वोट देता है तो तंत्र उसे सहेज कर सरकार के निर्माण की प्रक्रिया निभाता है। यही प्रक्रिया जब किसी स्त्री-पुरुष के बीच होती है तो पैदा होने वाली उनकी संतान कहलाती है, लेकिन यहां सरकार जन्म लेते ही, लोक और तंत्र दोनों की बाप हो जाती है।

यानी, लोकतंत्र अकेली ऐसी व्यवस्था है, जो अपना बाप पैदा करती है। कुछ राज्य इसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। बहुत कुछ वैसा ही नजारा है, जैसा किसी गर्भवती स्त्री की मौजदूगी को लेकर उसके घर में होता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इंसानों में वही महिला गर्भवती होती है, जिसके बच्चा होने वाला होता है। सियासत में 1760 लोग पेट लेकर घूमते हैं। दावे भी तमाम करते हैं, लेकिन प्रसव के बाद पता चलता है कि कौन सिर्फ तकिया रखकर घूम रहा था और किसके असल में सरकार हुई है।

अब जरा थोड़ा फ्लैश बैक में चलिए। फिल्मों व निजी जिंदगी में गर्भावस्था-प्रसूति के कई दृश्य देखे ही होंगे। दादी-नानी या घर की किसी बड़ी महिला के जरिय सबको खुशखबर किया जाता है। उसके बाद कैसे घर का माहौल बदल जाता है। पूरा घर नन्हे मेहमान की मौजूदगी को महसूस करने लगता है। मां बनने वाली स्त्री का लोग कितना ध्यान रखते हैं, उसके खाने-पीने और काम-काज में उसकी मदद करने को सब आतुर रहते हैं।

अब इन तमाम दृश्यावलियों को यूपी पर जमा कर देखिए। क्या ऐसा नहीं लगता कि यूपी हूबहू ऐसे ही दौर से गुजर रहा है। 11 मार्च को वहां सरकार होने वाली है, उसके पहले ठीक वैसा ही नजारा है, जैसा किसी गर्भवती स्त्री के घर में होता है। हर कोई उत्तर प्रदेश का खैरख्वाह बना बैठा है, उसके सुख-दु:ख की ऐसी चिंता कर रहा है, मानो उससे बड़ा शुभचिंतक कोई है ही नहीं। कोई यूपी को जुमलों के काजू-बादाम खिला रहा है तो कोई गठबंधन के जरिये दो-दो दाई से सेहत बनाने का दम दिखा रहा है।

हालांकि ये सब करतब दिखाते समय तमाम लोग भूल जाते हैं कि तीन साल पहले भी इन्होंने ऐसी ही शब्दों की नुमाइश की थी। तब भी यूं ही जुमले उछाले गए थे, वादे किए गए थे, भरोसे-दिलासे दिए गए थे। पांच साल पहले जब यूपी का लोकतंत्र इसी तरह पैर भारी कर बैठा था, तब भी तो यही सब दोहराया गया था। साइकिल रैली निकाली गई, लेकिन उसके बाद क्या हुआ। हाईवे पर मां-बेटी से दुष्कर्म हुआ और पुलिस मंत्री की भैंस ढूंढती रह गई। गंगा की सफाई का ढोल पीटा गया, लेकिन बनारस पूरी बारिश घुटनों तक डूबा रहा।

पारिवारिक सरकार पूरे समय अपनों को रुठने-मनाने, बेदखल करने और घर वापसी कराने में लगी रही। जन्मदिन के उत्सव में पूरा प्रदेश सैफई हो गया। साहेब कभी गंगा के बुलावे पर पहुंचे तो कभी दत्तक पुत्र की तरह। उधर, युवराज कह रहे हैं कि यूपी को किसी को गोद लेने की जरूरत ही किया है। गठबंधन में होते हुए भी वे भूल से तीन-चार मंचों पर मौजूदा सरकार की बखिया भी उधेड़ चुके। बहनजी किसी को डार्क हार्स तो किसी को आउट ऑफ सिलेबस लग रही हैं।

और इन सबके बीच फंसा है यूपी का लोकतंत्र। उसकी मजबूरी यह है कि वह धृतराष्ट्र की तरह सभा में हो रही तमाम कारगुजारियां सहने को विवश है। मदारी के खेल की तरह यूपी के रंगमंच पर लोग रोज नए तमाशे लेकर आ रहे हैं और वह डरा-सहमा सब देख रहा है। सब उसके अपने होने का दावा कर यही दिलासा दे रहे हैं कि चिंता मत करो सब ठीक होगा। सब अपनी दवाई खिला रहे हैं, अपने इलाज दे रहे हैं। वह डरा जा रहा है कि इतनी दाई और डॉक्टरों के बीच क्या होगा उसका हाल। चुनावी घमासान उसके लिए किसी असहय प्रसव पीड़ा से कम नहीं है।

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