क्यों होते हैं ये ट्रेन हादसे

एक आदमी घर से निकलता है, पूरा परिवार उसकी सलामती की दुआ करता है। जब ये दुआ कबूल नहीं होती, तब जिंदगी में एक सर्वकालिक सूनापन पसर जाता है। रिश्तों में एक स्याह कोहरा घर कर जाता है। हादसों में मरने वाले सरकारी रिकॉर्ड में एक आंकड़ा होते हैं, नाम होते हैं, लेकिन कई परिवारों के लिए वह उनकी दुनिया का अहम हिस्सा होते हैं। जब कोई यूं ही अचानक साथ छोड़ देता है तो सबकुछ बिखर जाता है। सिर्फ ट्रेन पटरी से नहीं उतरती कई जिंदगियां भी बर्बाद हो जाती हैं।

उस दृश्य की कल्पना कीजिए, जब वे लोग सैकड़ों किमी के इस सफर पर निकले होंगे। क्या माहौल रहा होगा, उनके घर का। कोई अपने परिवार में होने वाली शादी-समारोह का हिस्सा बनने जा रहा होगा तो कोई काम-धंधे से अवकाश लेकर परिवार से मिलने। कोई बीमार माता-पिता की सेवा के लिए निकला होगा तो कोई रोजी-रोजगार, पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में। जाते समय परिवार के बाकी सदस्यों ने उन्हें कैसे विदा किया होगा। आलू की सूखी सब्जी और पराठे के साथ टिफिन में कितनी दुआएं भरकर रखी होंगी। सोने से पहले बात की होगी, सब ठीक है ना। एक ही ट्रेन है इसलिए भीड़ ज्यादा रहती है, परेशानी तो नहीं हो रही कोई। कहां तक पहुंच गए हैं। सोचिए सुबह जब खबर मिली होगी कि कोई ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां से फिर लौट न पाएगा। तब कैसे कांपा होगा माथे का सिंदूर, मंगलसूत्र ने क्या कहा होगा। बच्चों के मन पर क्या बीती होगी, माता-पिता का क्या हाल हुआ होगा।

अब तक सामने आईं 100 मौत में कितने तरह के किरदार होंगे। मां, बहन, बेटी, बेटा, भाई, देवर, पति, चाचा, मौसी, मौसा, बुआ कितने रिश्तों को लील गया यह ट्रेन हादसा। और उनकी भी सोचिए जो गंतव्य पर इनका इंतजार कर रहे होंगे। किसी का बेटा, बहू और पोते-पोतियों के साथ घर आ रहा होगा तो किसी की बेटी पढ़ाई पूरी करके। ढेर सारी तैयारियां होंगी, उन घरों में। कितने सपने और कितनी उम्मीदें होंगी। कितनी योजनाएं बनाई गई होंगी, मेल-मिलाप और दावतों की। कितने काम-काज निकालकर बैठे होंगे परिजन।

दोनों ही छोर के घरों में सुबह के वे पल कैसे बीते होंगे, हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते हैं। दुर्घटना की सूचना मिलने के बाद और उनके परिजन के कुशल या अकुशलता की पुष्टि होने के बीच कैसे बेचैन हिरणी की तरह वे इधर-उधर भागते रहे होंगे। कहां-कहां फोन लगा रहे होंगे, हेल्प लाइन टटोल रहे होंगे। किसी ने टीवी पर आंखें गड़ा रखी होगी, कोई वेबसाइट और न्यूज एप खंगाल रहा होगा। और जब ये सूचनाएं पुष्ट हुई होंगी, तब क्या हुआ होगा। जिन्हें कुशलता की खबर मिली होगी, उन्होंने कितने देवी-देवता मनाए होंगे और जिनके यहां अमंगल की सूचना पहुंची होगी, उनका तो सबसे भरोसा ही उठ गया होगा।

100 मृत और 150 घायल ये सिर्फ 250 लोग ही नहीं हैं, इनके पीछे कई सौ और लोग इस हादसे का शिकार हुए हैं। किसी के सपने कुचले गए हैं तो किसी की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। उनकी जिंदगी का सूनापन कोई सरकारी मुआवजा, नौकरी की पेशकश, इलाज का खर्च, दूर नहीं कर पाएगा। सरकारी रिकॉर्ड में उनके नाम के आगे लेट या स्वर्गीय लिख दिया जाएगा, लेकिन पता नहीं कब हम इन हादसों के आगे भी ऐसा ही लेट या स्वर्गीय लिख पाएंगे। यह हादसा पहली बार नहीं हुआ है, लेकिन ये हादसे हर बार क्यों हो रहे हैं। क्या इन पर हम उतनी ही गंभीरता से विचार कर पा रहे हैं। ट्विटर पर सुविधाएं उपलब्ध कराना अद्भूत है, कोच को आधुनिक बनाने का प्रयास कमाल का है, स्पीड बढ़ाने, सुविधाएं जोडऩे के सारे प्रयास काबिले तारीफ है, लेकिन क्या इन सबके साथ रेल सफर को सुरक्षित बनाने के प्रयासों पर भी उतनी ही प्राथमिकता से काम हो पा रहा है। अगर हो पाता तो हादसे दर हादसे हमें अपने लोगों को खोने के लिए विवश नहीं होना पड़ता।

समस्या वही है कि जो राजनीतिक हादसे के बाद सद्भावना के लिए मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं, जांच के आदेश दे रहे हैं, दोषियों को नहीं बख्शे जाने का ऐलान कर रहे हैं। ऐसे कई आश्वासन रेलवे पहले भी सुन चुका है। हर हादसे के बाद सिर्फ जांच रिपोर्ट का पुलिंदा भारी होता जाता है। सारे दावे, कागजों में ही दफन होकर रह जाते हैं। उन्हीं के साथ दबा दी जाती हैं वे सारी चीखें और चित्कार, बस अगर कुछ नहीं छुप पाता है तो उसके शिकार लोगों के मन की पीड़ा और अपनों को खोने का दर्द। वह खालीपन उनकी जिंदगी का हिस्सा बनकर हमेशा के लिए उनके चेहरे पर कब्जा जमाकर बैठ जाता है, आंखों में पसर जाता है।

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