तुम मेरी दुनिया छीनोगे मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाऊंगा

irfan khan

एक दोस्त की किसी से लड़ाई हुई। दोस्त ने कहा, जान से मार दूंगा। धमकी बहुत बड़ी थी, लेकिन सामने वाले पर इतना असर नहीं हुआ। पर्दे पर किसी फिल्म में इरफान ने कुछ ऐसी ही बात कही तो सामने वाला भले किरदार में था, लेकिन सिनेमा हॉल की कुर्सियों पर बैठे दर्शकों में भी सिहरन मचते देखी है। बात क्या कही गई है, उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, बनिस्बत इसके कि वह किसने और किस अंदाज में कही है। तेवर ऐसे हों कि बिना मारे शब्दों से ही लहूलुहान कर दे, पर्दे पर इरफान इसी कमाल का नाम था। आवाज भले खुदा की दी हुई थी, लेकिन तेवर इरफान के अपने थे, जिन्हें उन्होंने बरसों की मेहनत से सींचा था। इसलिए जब वे पर्दे पर होते तो कहीं और नजर जाना मुश्किल था।

फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े नामी सितारों को भी ईश्वर ने यह नेमत नहीं बख्शी। क्या था वह कोई जादू या सम्माेहन जो दर्शकों को अभिनय की मुट्‌ठी में भींच लेता था। कसकर जकड़ लेता था। आप हिल भी नहीं पाते, फिर चाहे वह हिन्दी मीडियम का कपड़ा व्यापारी ही क्यों न हो। शुरुआती सीन में मां-बेटी को शादी के कपड़े बेचते हुए कितनी सहजता से वे चांदनी चौक के कपड़ा व्यापारियों की चतुराई से रूबरू करा देते हैं। एक पल को नहीं लगता कि आप कोई फिल्म देख रहे हैं। लगता है आप भी साथ में खरीदी करने गए हैं और गाेया ये मां-बेटी बीच में नहीं होती तो दुकानदार के अंदाज पर फिदा होकर आप अपनी मां-बहन-बेटी के लिए भी कोई न कोई कपड़ा खरीद ही लाते।

पीकू में जब कोई ड्राइवर नकचढ़ी कस्टमर का फोन उठाने को तैयार नहीं होता तो कैबिन से बाहर निकलकर कहते क्या हुआ थोड़ी गुस्सैल है, भगाने को कहती है लेकिन ऐसा कैसा कर सकते है। कस्टमर है भगवान का रूप होता है। और जब वही खुद गाड़ी लेकर पहुंचते हैं, बार-बार गाड़ी रुकवाने पर चिढ़ जाते हैं। अमिताभ को डांट कर एकदम चुप बैठा देते हैं तो कुछ भी असहज नहीं लगता। एक बारगी भी अहसास नहीं होता कि कोई इतने बुजुर्ग को कैसे ऐसे दुबकने पर मजबूर कर देता है। जब वे दीपिका की तरफदारी करते हुए कहते हैं कि अगर फिक्र नहीं होती तो कोलकाता लेकर नहीं जाती, वहीं पटक देती कहीं दिल्ली में।

और जब वे शौच के लिए बैठने के भारतीय तरीके का चित्र बनाकर डिस्क्रिप्शन दे रहे होते हैं तब भी वे एक लय में बह रहे होते। दर्शकों को अपने प्रवाह में समाहित कर रहे होते। पानसिंह तोमर में जब वे स्पोट@र्स में जाने के लिए सिफारिश लगाने अफसर के पास जाते और वे पिघलने से पहले आइस्क्रीम घर पहुंचाने की शर्त रख देते तो हम भी ताकत लगाकर इरफान के साथ दौड़ने लगते। और जब वे बंदूक उठाकर बीहड़ पहुंचते तो हमारा अपना कांधा भी कुछ भारी महसूस होता। इरफान के साथ आप कभी फिल्म देख ही नहीं पाते। उसे महसूस करते, उसे जीते और उसका हिस्सा बनकर ही थियेटर से बाहर निकलते। फिर चाहे वे फिल्म में किसी भी रोल में होते, बाकी कलाकारों से कहीं अधिक हिस्से में दर्शकों के घर तक पहुंचते।

और फिर निजी जिंदगी में भी तो उतना ही ड्रामा हुआ न। जयपुर से दिल्ली, मुंबई होते हुए लंदन के अस्पताल तक। इरफान कितना कुछ सीखाते रहे। मुश्किल दौर में जब उन्होंने अस्पताल से चिट्‌ठी में लिखा कि जीवन के खेल और मौत के खेल के बीच बस एक सड़क है। एक तरफ अस्पताल है, दूसरी तरफ एक स्टेडियम। सिर्फ अनिश्चितता ही निश्चत थी। मैं बस इतना कर सकता था कि अपनी ताकत का अहसास करूं और अपना खेल बेहतर खेलूं। उन्होंने लिखा था मैं तेजी से जिंदगी में अपने सपनों के साथ तेज रफ्तार ट्रेन से अपना सफर कर रहा था तभी किसी ने पीछे से नॉक किया और कहा आपका स्टेशन आने वाला है। और अंतत: वह स्टेशन आ ही गया।

अपनी एक फिल्म में इरफान ने कहा था, आदमी जितना बड़ा होता है उसके छुपने की जगह उतनी कम होती है। अपने दर्द, अपनी बीमारी के साथ इरफान भी ज्यादा दिन तक छुपकर नहीं रह पाए। खुदा ने उन्हें बुला लिया या फिर उन्होंने तो सिर्फ इरफान से यह दुनिया वापस ली, इसके बदले में इरफान उनकी दुनिया में पहुंच गए। क्योंकि मदारी वे उन्होंने यही तो कहा था तुम मेरी दुनिया छीनोगे मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाऊंगा। अब इरफान नहीं है के मायने सिर्फ इतने हैं कि हमें उनसे नया काम नहीं मिल पाएगा। जो काम, जो करिश्मा वे हमारे बीच छोड़ गए हैं, वह सदैव हमारे साथ रहेगा। इसलिए अलविदा नहीं कहूंगा क्योंकि हमारे हिस्से के इरफान हमारे साथ हैं।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.