आइये अपने घर फूंक दें

जिंदगी जीने के कई तरीके हो सकते हैं, लेकिन एक राह ऐसी है, जो घर फूंक कर साथ चलने को कहती है। बड़े जोखिम हंै, लेकिन जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव झेलने के बाद समझ आता है कि यकीनन अगर कोई रास्ता है तो वही है। अपना सारा कुछ फूंक कर निकल जाइये। फिर दुनिया की कोई मुश्किल आपको डिगा नहीं पाएगी। बड़े से बड़े पत्थर राह छोडक़र खड़े हो जाएंगे। बस पहले माचिस जलाने की हिम्मत टटोल लीजिएगा। क्योंकि इस राह पर सारी पारंपरिक समझ ढह जाती हैं, परिभाषाएं गडमड हो जाती हैं और तमाम सुन्नत और संस्कार भी पनाह मांग लेते हैं।

वह राह सिर्फ कबीर की हो सकती है, जो बाजार में खड़े होकर आपको बुलाए। हालांकि जितनी आसानी से यह पुकार सुनाई देती है, उतना ही मुश्किल उस दिशा में कदम बढ़ाना है। क्योंकि कबीर की राह पर चलने का मतलब, तपते अंगारों पर चलना है। कबीर किसी को नहीं बख्शते। सबसे पहले वह अपने से शुरू करते हैं और फिर एक लाइन से सबके मुलम्मे उतारकर फेंक देते हैं। बिना मुलम्मों के दुनिया कैसी होगी, इसका कल्पना भी पेट में तितलियां दौड़ा देती है। दिमाग में चींटियां छोड़ देती है। सिहरन होने लगती है। मैं सच में पूरी दुनिया को उसी स्वाभाविक स्थिति में देखना चाहता हूं। कैसी होगी, जब तन, मन और प्राणों पर कोई लबादा न होगा।

आप आश्चर्य कर सकते हैं कि कोई कैसे इतनी सहजता और बेबाकी से एक सिरा पकडक़र सबको स्वाभाविक अवस्था में लेकर आ जाता है। वजह साफ है कि कबीर दूसरों से शुरुआत नहीं करते। वे सबसे पहले अपनी खबर लेते हैं, कहते हैं, बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय, जो मन खोजा आपना मुझसा बुरा न कोय। जब पहले ही कदम पर तय हो गया है कि मैं ही संसार का सबसे निकृष्ट व्यक्ति हूं तो फिर उत्कृष्ट के पाखंड के लिए कोई जगह कहां रह जाएगी। फिर वे दुनिया के सब आलोचकों को अपने करीब रखना चाहते हैं। यानी मुझे पता है कि मैं बुरा हूं, लेकिन अगर आपको मेरी बुराई के बारे में कुछ और मालुमात है तो मेरे घर में मेरे साथ रहिए। निंदक की ऐसी प्रतिष्ठा वही कर सकता है, जिसने अपने मन के सारे दरवाजे खोल रखे हो।

फिर सबसे बड़ा खतरा रटी-रटाई सारी पोथी-पुराणों की धारणाओं के खत्म होने का है। हम एक सिलसिले का हिस्सा हैं और सदियों से उसी प्रवाह में बह रहे हैं। यही सबसे आसान भी है, जो दादा करते आए वह पिता ने किया, जो पिता ने किया उसे मैंने अपना लिया और जो मैं कर रहा हूं उसके लिए अपेक्षा रखता हूं कि मेरा बेटा उसे स्वीकार कर ले। कबीर के साथ तो यह चक्कर पूरा ही खत्म होना है। चाहे मंदिर जाने वाले हों या मस्जिद कबीर के सवालों का जवाब दिए बगैर कदम नहीं बढ़ा पाएंगे। माला फेरते हुए गुजरे जमाने को वे एक पल में कठघरे में ला खड़ा करते हैं और उसी क्षण मस्जिद की अजान के लिए भी सवालों से बिंध देते हैं। पाहन पूजने वालों को नहीं बख्शते तो शोर मचाने वालों को भी नहीं छोड़ते।
हर किसी को इतनी कड़ी कसौटी पर रखते हैं कि किसी को एक क्षण भी नहीं देते। टालने का तो सवाल नहीं उठता है। खुलकर कहते हैं कि काल करे सो आज करे सो अब। फिर उनके आगे किसी का बड़प्पन भी नहीं चलता। साफ कह देते हैं, बड़ा हुआ सो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर। हम जैसे ही अपनी तरफ देखने की कोशिश करते हैं, खुद के भीतर से एक खजूर निकलता महसूस होने लगता है। हालांकि उस क्षण जो आत्मग्लानी होती है, वह अपने भीतर भी बहुत पिघला देती है। तभी वहां खड़े होकर सुनने की हिम्मत दिखा पाते हैं कि जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहंशाह। इसका असल मतलब तभी समझ आता है।

इसलिए दिल सच में कबीर हो जाने को करता है। इस खालिसपन के साथ जीने को करता है। जो जिंदगीभर हर अस्तित्व को चुनौती दे सके। किसी पर आंख न मूंदे हर बात पर सवाल कर सके। अपने मरने के लिए भी जो काशी छोडक़र मगहर चला जाए यह कह कर कि जो कबीरा काशी मुए तो रामे कौन निहोरा। काश कि इस साहस के साथ एक सांस भी ले पाएं। दोहरा सकें

हमन है इश्क मस्ताना हमन को होशियारी क्या
रहें आजाद या जग में हमन को दुनिया में यारी क्या

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