पेड़ की पहेली, बूझ मेरा क्या नाम रे


बेंगलूरु में सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है, वह वहां की हरियाली है। सडक़ के दोनों ओर पेड़ों के झुरमुट आनंद से भर देते हैं। इसी आनंद में डूबते-उतरते मैंने महसूस किया कि एक पेड़ है, जो हर थोड़ी दूर पर नजर आ रहा है, लेकिन मैं उसे पहचान नहीं पा रहा हूं। खूब ऊंचा, घना, लंबी पत्तियों वाला पेड़, जिस पर लंबी नोक वाले छोटे पपीते जैसे फल लगे हुए थे। मेजेस्टिक मार्केट के आसपास हर कुछ कदम पर कहीं न कहीं वह मेरे सामने आ खड़ा होता।
हालांकि बार-बार उससे यूं अपरिचित की तरह मिलना मुझे अखरने लगा। जब रहा नहीं गया तो लोगों से पूछने की कोशिश की। सबसे पहले फुटपाथ पर बैग सिल रहे एक सज्जन से पूछा, क्योंकि पेड़ उनकी दुकान से बमुश्किल चार कदम की दूरी पर ही था। एक बार पूछा, दो बार पूछा, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। वे बैग में चेन लगाने में ही व्यस्त रहे। मुझसे रहा नहीं गया, जोर देकर पूछा, इशारे से समझाने की कोशिश की तो उन्होंने नजरें उठाई, पेड़ की तरफ देखा और इनकार में सिर हिला दिया। मैंने इसे सहजता में लिया और आगे बढ़ गया।
चौराहे पर फिर वही पेड़ हाथ हिलाते नजर आया तो मन नहीं माना। बारिश के कारण दुकान की आड़ में खड़ी दो महिलाओं से पूछने की कोशिश की। आंटी, आप जानती हैं, ये पेड़ कौन सा है। वे तीन लोग थे, दो महिलाएं और एक पुरुष। आपस में कन्नड़ में बात करने लगे। मुझे लगा कि वे पेड़ के बारे में ही बात कर रहे होंगे। कुछ देर वे बात करते रहे, मैं इस उम्मीद में उनके चेहरे तकता रहा कि शायद अब तो यह गुत्थी सुलझ जाएगी, लेकिन इस बार भी निरुत्तर ही रहा। उन्होंने भी मना कर दिया।
फिर एक दुकान पर बैठे बुजुर्ग से पूछने की कोशिश की। उनकी कपड़ों की दुकान थी। आसपास दो-तीन लोग और भी बैठे थे। हाव-भाव से लग रहा था कि वे उसी दुकान में काम करते होंगे। मैंने पूछा, आपकी दुकान के सामने जो यह पेड़ है, उसका नाम जानते हैं क्या। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, मैंने पेड़, फिर ट्री और झोंक में आकर झाड़ तक कह दिया। एक थोड़ा हष्ट-पुष्ट सा बंदा उठा और मेरे हाथ के इशारे को देखकर बोला, जर्नादन टेम्पल। मैंने आश्चर्य में टेम्पल दोहराया तो वह अचकचा गया। मैंने कहा, भाई मुझे उस पेड़ का नाम जानना है, जिस पर नुकीले फल लगे हैं। पेड़ का नाम सुनते ही उसने भी मना कर दिया।
मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं जितना पेड़ को जानने की कोशिश करता वह उतना ही अबूझ होता जा रहा था। मैं उससे ध्यान हटाने की कोशिश करता तो वह हर 10-15 कदम पर आकर खड़ा हो जाता। जैसे बच्चों की तरह दोनों हाथ सिर पर रखकर नाचते हुए, मुझे मुंह चिढ़ा रहा हो। इस बार में एक दुकान में जा घुसा वह इलेक्ट्रिक सामान की आधुनिक सी दुकान थी। काउंटर पर बैठे एक सज्जन से पूछा कि आपकी दुकान के सामने वाले इस पेड़ का नाम जानते हैं क्या। उसने भी इनकार कर दिया। कहने लगे इधर के लोगों से पूछो मैं तो बाहर से अभी ही आया हूं। मुझे नहीं पता। मैंने अलग-अलग तरह के सात-आठ लोगों से एक ही सवाल करने की कोशिश कि, लेकिन कहीं भी जवाब नहीं मिला।
मेरी लगातार नाकाम होती कोशिशों पर एक साथी की टिप्पणी ने दिल ही तोड़ दिया। कहने लगा, लोग कहां इतना ध्यान रखते हैं, नहीं पता होगा किसी को। मैं सोच पड़ गया, क्या सच में ऐसा हो सकता है कि जो पेड़ हर 15-20 कदम पर नजर आ रहा है, उसका कोई नाम तक नहीं जानता। जो उनके सिर पर छांह बनकर खड़ा है, उनके लिए हवा शुद्ध कर रहा है, उनकी मिट्टी बचा रहा है, उन्हें फल दे रहा है, लोग उसका नाम तक नहीं जानते। मुझे लगा शायद यह फल खाने लायक नहीं होगा, इस वजह से लोगों ने दिलचस्पी नहीं ली। फिर लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग मेरी भाषा समझ नहीं पा रहे, लेकिन मुझे लगा मैंने इशारों में भी अपनी तरफ से बात समझाने की पूरी कोशिश की थी। पेड़ का नाम इतना गूढ़ भी नहीं था कि मैं वह भी नहीं कर पाता।
खैर, तलाश अधूरी ही रही। लौटकर गूगल पर सर्च करने की कोशिश की। ट्रीज ऑफ बेंगलूरु किया तो वह पेड़ नजर आ गया। नाम पता चला महोगनी। डोमिनिकन गणराज्य का राष्ट्रीय वृक्ष। ब्राजील, कनाड़ा, अमेरिका के जंगलों में बहुतायत से पाया जाता है। भूरे व चम्मच के आकार के नारियल जैसे फल लगते हैं, जिस पर, 75 फीट की ऊंचाई तक बढऩे की क्षमता वाला। आयरन और विटामिन का भंडार। मूलत: वेस्ट इंडिज की प्रजाति। शुगर, ब्लड शुगर, हृदय रोग, धमनियों के ब्लॉकेज, कैंसर, लीवर, अस्थमा, अल्जाइमर्स से लडऩे और स्टेमिना बढ़ाने में मददगार होता है। लकड़ी ऐसी कि 50 डिग्री तक का तापमान सह सकती है, जिस पर पानी का कोई असर नहीं होता। जहाज व डिजाइनिंग फर्नीचर के लिए बेहद उपयोगी। जल की कमी वाले क्षेत्र में किसानों को मालमाल कर देना वाला पेड़। बेलीजद की मुद्रा पर अंकित, वहां की खुशहाली का प्रतिनिधि।
मैं सोच रहा था कि आखिर इस अनदेखी की वजह क्या है। क्या हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगियों में इतने खो हो गए हैं कि किसी और से कोई सरोकार नहीं रखना चाहते। ये कैसी बेरुखी है, ये कैसा वैराग्य है, जिसने हमें सिर्फ अपनी जरूरतों तक सीमित कर दिया है। प्रकृति का एक दूत बांह फैलाए खड़ा है और कोई उससे दोस्ती करना तो दूर उसका नाम तक पूछने नहीं जाता।

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