मरकर ही ईश्वर मिल जाते तो फिर जिंदा क्यों रहते

पता नहीं यह कब से चल रहा है। शायद तब से जब आदम और हव्वा ने प्रतिबंधित फल खाया और वे धरती पर आ गए। अथवा जब मनु महाराज ने संतति के जरिये मानवों की उत्पत्ति की। आस्तिक हो, नास्तिक हों, सगुण-निगुर्ण किसी भी धारा को मानने वाले, लेकिन कहीं न कहीं मन में एक भाव दबा रहता है। ईश्वर से साक्षात्कार का। जीवन की तमाम भागदौड़ के बीच यह खयाल भले ही कितना धुंधला हो जाए, लेकिन खत्म नहीं होता। बस सवाल यह है कि आखिर हम ईश्वर से कैसे मिलना चाहते हैं। अगर सिर्फ मरकर ईश्वर मिल जाते तो फिर जिंदा रहने की जरूरत ही क्या होती।

वैसे इसमें कुछ गलत नहीं लगता कि हम ईश्वर की सत्ता को महसूस करना चाहते हैं। परमपिता के दिव्य स्वरूप से एकाकार होना चाहते हैं, उस विश्व निर्माता में अपने अस्तित्व को विलीन कर परम शांति को प्राप्त करना चाहते हैं। हमारे देश में ऐसे महात्माओं की समृद्ध परंपरा है, जिन्होंने अपने ज्ञान, तप और भक्ति के बल पर यह करके भी दिखाया है। यह हमारी संस्कृति और सभ्यता का बहुत ही उजला पक्ष है। जो हमें हर स्थिति में नैतिक मूल्यों पर बने रहने में मदद भी करता है।

लेकिन पर्तें उघाड़ कर देखेंगे तो पाएंगे कि एक इस भाव के कारण ही हमें कितना और कहां-कहां ब्लैकमेल किया जा रहा है। वास्तव में ईश्वर के नाम पर जितना हमें मूर्ख बनाया जा रहा है, शायद उतना कभी किसी ने नहीं बनाया होगा। बचपन के कई सारे डर इसी से दिमाग में घुसाए गए कि ऐसा मत करो वरना भगवान पाप देंगे। वे पाप क्यों देंगे और उससे क्या होगा, यह किसी ने नहीं बताया। जिंदगी के हर हिस्से में भगवान कई लोगों के मन में डर के रूप में समाए हुए हैं। उस डर को दूर करने के लिए वे तमाम तरह के खटकर्म करते रहते हैं।

मंदिरों में हजारों का चढ़ावा चढ़ाते हैं, फिर भले ही घर के पास कोई व्यक्ति अभावों के आगे दम तोड़ दे। तरह-तरह की पूजा-पाठ कराते हैं। गृह शांति के उपाय करते हैं। जरूरत पड़ी तो कई लोग टोने-टोटके और तंत्र-मंत्र का सहारा भी लेने से नहीं चूकते। रात को कई बार शहर के चौराहों-तिराहों पर सिंदूर पुते कटे हुए सफेद कद्दू दिखाई दे ही जाते हैं। कहीं मूंग, अंडे, दीपक और पूजा का बाकी सामान लाल-काले कपड़े में लिपटा मिलता है। समझ नहीं आता कि इनसे क्या होता होगा, लेकिन लोग जीवन में शुभता लाने के लिए बैसाखियों की तरह इनका इस्तेमाल करते हैं।

श्राद्ध में कौवों को भोजन कराते हैं, कुत्तों को जलेबियां खिलाते हैं। मछलियों को आटा की गोलियां और चींटियों को आटा परोसते हैं। कहीं नारियल बहाते हैं तो कहीं सिक्के नदियों के हवाले कर देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि इनसे कुछ ठीक हो सकता है। उन्हें इससे अतिरिक्त आत्मविश्वास मिलता हो और किसी दूसरे को कोई नुकसान नहीं होता तो फिर भी ठीक है। वे अपना मन समझाने के लिए ये करें तो फिर भी एक बार उन्हें स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन जब वह अंधविश्वास का चोला ओढ़ ले और खुद मूर्खों की तरह ब्लैकमेल होने लगे तो फिर समझ नहीं आता कि ये कैसा धर्म है और ईश्वर के प्रति कैसी लगन है।

जब लोग निर्मल दरबारों का हिस्सा बन जाते हैं, ईश्वर से अपने झगड़े-टंटों में दलाली कराने की कोशिश करने लगते हैं तो फिर उनकी सोच-समझ पर तरस आता है। ऐसे लोगों पर अंधा भरोसा कर बैठते हैं, जो ईश्वर के नाम की दुकान खोलकर बैठे हैं, तब लगता है कि मेरा ईश्वर किसी का बिजनेस पार्टनर कैसे हो सकता है। वह चिंता करेगा तो सबकी करेगा, किसी का घर खाली करके दूसरे का घर भरने वाले काम में वह सहभागी कैसे हो सकता है।

और धर्म के मायने ये ढकोसले कैसे हो सकते हैं। एक हद तक कुछ प्रक्रिया आत्मिक शुद्धि का माध्यम हो सकती हैं, लेकिन सिर्फ एक पक्षीय कर्मकांड कैसे स्वीकार किया जा सकता है। अगर ऐसा होता तो जीवनभर पूजा करने वाले पंडे-पुजारी सीधे स्वर्ग ही जाते। वे क्यों स्टेशनों पर, तीर्थों पर एक-एक रुपए के लिए यजमानों से झगड़ते। पूरा जीवन पूजा करके भी जीवन लोगों का मन शुद्ध नहीं हुआ, वे हमें क्या मोक्ष का मार्ग दिखाएंगे, ईश्वर से साक्षात्कार कराएंगे।

अगर ये खुदकुशी है तो समझना मुश्किल है कि दिल्ली के उस परिवार ने कैसे खुद को इसके लिए तैयार किया होगा। छोटे-छोटे बच्चों के मुंह पर कैसे टेप लगाई होगी, उनके हाथ बंधवाएं होंगे, आंखों पर पट्टियां लगाई होगी। अगर किसी धार्मिक अंधविश्वास के चलते उन्होंने ऐसा किया है, तो ऐसे धर्म और ऐसी आस्था को बड़ा सा पत्थर बांधकर किसी कुएं में फेंक देना ही बेहतर होगा। पता नहीं धर्म और धर्मांधता का मतलब हम कब समझ पाएंगे।

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