नवरात्रि से पहले मोम की तरह पिघलते चेहरे

पुरुष का चेहरा न जाने क्यों इन दिनों मोम जैसा नजर आ रहा है, जो हल्की सी गर्मी से पिघल जाता है, कुरूप हो जाता है। भारतीय महिलाओं द्वारा शुरू किए गए मी टू कैम्पेन ने कई चेहरों से ऐसे ही नकाब नोचकर फेंक दिए हैं। प्रतिमाओं के खंडित होने का यह सिलसिला जारी है। नवरात्रि के ऐन पहले स्त्रियों की यह हुंकार चेतावनी है, उन सभी पुरुषों के लिए जो सप्तशति के श्लोक दोहराते हुए भी स्त्री का सम्मान करना नहीं सीख पा रहे हैं। दोहरी जिंदगी का बोझ कब तक कांधों पर लिए घूमते रहेंगे।

और अब तो केंद्र के मंत्री भी इस कतार पर आकर खड़े हो गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार, केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर आरोप है कि होटल में इंटरव्यू के बहाने वे अभद्रता करते थे। महिलाओं को शराब और बिस्तर ऑफर करते थे। यकीन करना मुश्किल है कि दूसरों के चरित्र का आकलन करने वाले खुद इस हद तक दलदल में धंसे हुए थे। और लेखक चेतन भगत तो जैसे सहानुभूति में सेक्स मांग रहे थे। अपनी जिंदगी को उदास और वीरान बताकर भीख मांगी जा रही थी। बहुत पुराना हथकंडा है। जब उनकी चैट जाहिर हो गई तो उस महिला के साथ पत्नी से भी माफी मांग रहे हैं।

नाना पाटेकर का जिक्र आते ही ये हिंदू का खून ये मुसलमान का खून वाला दृश्य याद आता है। अगर आरोप सही हैं तो दृश्य बदला जाना चाहिए। उन्हीं से उनका सवाल नए अंदाज में पूछा जाना चाहिए, ये तेरी बहन है, ये उसकी बहन है। दोनों ही किसी की बहन है। फिर तेरी बहन के साथ सलूक दूसरा और दूसरे की बहन के साथ कुछ और क्यों। एआईबी के सीईओ तन्मय भट्ट साथियों के साथ विसंगितयों को लेकर पूरी दुनिया की खिल्ली उड़ाते आए हैं, उन्हें गरियाते रहे हैं। उन पर महिला कर्मचारी ने आरोप लगाए हैं। अनुराग की फेंटम फिल्म के विकास बहल पर भी महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया है। जिस पर कंगना रनौत ने भी मुहर लगाई है कि वे जबरन गले लगाते थे।

इन सबके बाद भी हद यह है कि भाजपा सांसद उदित राज कहते हैं कि अकबर पर आरोप लगाने वाली महिला इतने दिन तक क्यों बैठी रही। आरोप लगाने की कोई समय सीमा होना चाहिए। तनु श्री दत्ता को भी कठघरे में खड़ा करने की कोशिश हो रही है कि मोटी हो गई हैं, काम पाने से बुरी तरह चूक गई हैं, फिर लाइम लाइट में आने के लिए ड्रामा कर रही हैं। ऐसे सवाल वही उठा सकता है जिसने स्त्री को सिर्फ देह की नजर से देखा है। वह समझ ही नहीं पाया कि स्त्री देह के इतर भी बहुत कुछ होती है। और जिन वर्जनाओं में हम उसे अब तक पालते आए हैं, इतना वक्त बीतने के बाद भी उन बेडिय़ों को तोडऩा उसके लिए कितना मुश्किल है।

सवाल यह भी है कि आखिर पुरुष के लिए भी तो कोई समय या उम्र की सीमा तय हो कि वह कब तक फ्लर्ट करेगा। उसके लिए भी तो कोई लक्ष्मण रेखा बनाई जाए। वरना यह खूब है कि शादी के पहले प्रेम का झांसा देकर किसी को फांसने की कोशिश कीजिए। शादी के बाद सहानुभूति बंटोरने के लिए इच्छाओं का कटोरा फैला दीजिए। संजीव कुमार की पति, पत्नी और वो याद है ना। क्या करते हैं उसमें संजीव। ऑफिस में कोई नई सेक्रेटरी आते ही उसके सामने दवाइयों का जखीरा लेकर बैठ जाते हैं। बीवी की बीमारी का बहाना कर करीब जाने की कोशिश करते हैं। क्या सच में पूरा पुरुष समाज उसी किरदार का प्रतिबिम्ब होकर रह गया है। मी टू में जिस तरह चेहरे बेनकाब हो रहे हैं, उससे तो यही लगता है।

इसलिए यह नवरात्रि मनाने से पहले मन घबरा रहा है। क्या सच में हम देवी जागरण के इस उत्सव को मनाने के लायक हैं। यह कैसे संभव है कि स्त्री के रूप की आराधना करें और दूसरे को भोगने के लिए सारी सीमाएं लांघ दें। नवरात्रि से मनाने से पहले अपने आसपास भी कोई तो बाड़ लगाएं।

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