बूढ़े होते लोग

गुरु पूर्णिमा पर एक संत के आश्रम की सीढिय़ों पर एक युगल बैठा हुआ था। कान भजनों पर लगे थे, लेकिन निगाहें कहीं ओर थीं। अनंत को ताकती हुई सी। कभी नीचे गुब्बारे वाले के आसपास मंडरा रहे बच्चों को देखते तो कभी, घुटनों पर हाथ रखकर सीढिय़ां चढ़ते बुजुर्गों को। वे दोनों जिंदगी की इन दो धाराओं के बीच किसी टापू पर बैठे नजर आ रहे थे। जनाब का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा था, गौर से देखा तो यादों की धुंधली तस्वीर उभर आई। वे मेरे घर से कुछ दूर रहते थे और बहुत तेज साइकिल चलाने के लिए हम सभी बच्चों में बड़े मशहूर थे।
आश्रम की सीढिय़ों पर बैठे हुए उनके चेहरे में वही साइकिलिस्ट ढूंढने की कोशिश करने लगा। मुझे वह कहीं नजर नहीं आ रहा था। जो दिखाई दे रहा था, उसे आप लंबा सा पाज कह सकते हैं। एक अजीब सा ठहराव, जो न नकारात्मक है, न सकारात्मक है। मध्यम स्थिति, गुनगुना सा आदमी न ठंडा न गरम। जिसे गुब्बारे वाले के पास खड़ी बच्चों की भीड़ कुलबुला रही है, लेकिन वह घुटने पर हाथ रखकर सीढिय़ां चढ़ते लोगों को देखकर सिहर रहा है। वही सिहरन उसके भीतर अजीब सा सूनापन भर दे रही है। उसके चेहरे का रंग उड़ा रही है। इसलिए कानों में भले ही भजन पहुंच रहे हैं, लेकिन चेहरे के भाव स्थिर हैं। वह अपनी मझधार में ही मगन है।
बहुत तेज साइकिल दौड़ाने वाला लडक़ा अंदर ही कहीं दुबका बैठा होगा, लेकिन न जाने क्यों वह बाहर नहीं आ पा रहा है। आखिर कौन रोक रहा है, उस लडक़े को। मैं इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था। आसपास टटोलकर देखा तो कुछ और चेहरे भी ऐसे ही नजर आए। मिडिल स्कूल की टीचर भी आई थीं, अपने कद से बड़े हो चुके बच्चों को साथ लेकर। वे बहुत सख्त हुआ करती थीं। क्लास में घनघोर चुप्पी न हो तो पढ़ाने को तैयार नहीं होती। हालांकि पढ़ाती बहुत खूब थीं, बाहर मिलती तो बड़ी सहजता से हंसती-बोलती। अब क्लास की वही चुप्पी मुझे उनके चेहरे का स्थायी भाव बनी दिखाई दे रही थी। हंसी भी तो जैसे बस रस्म अदायगी के लिए। होंठ फैलाए हल्के से दांतों की सफेद को हवा दिखाई और बस बंद कर लिए। आंखों में तो मुस्कान की किरणें पहुंच ही ही नहीं पाई। चेहरे की गोलाइयां तो जैसे अटल भाव से बैठी हीं रह गईं। मैं सोच रहा था क्या ये वही टीचर थी, जिनका मेकअप और ड्रेसिंग सेंस लड़कियों की बातों में शुमार होता था। और उन्हें कुछ बोलने पर वे लड़ाई करने पर भी उतर आती थीं।
फिर एक सीनियर भी नजर आए। मुझसे कोई छह-सात कक्षा आगे रहे होंगे। शर्ट के बटन खोलकर स्कूल में घुसते थे। खूब शरारती, कभी दीवार फांदकर चाट उड़ाने जाते तो कभी टोली लेकर फिल्म देखने पहुंच जाते। साइकिल की सीट का कवर चुराने, वाल-डेबरी उड़ाने में माहिर। पेन, चाबी का छल्ला तो चुटकियों में गायब कर देते थे। कापियों की हेरफर के भी उस्ताद, चिट करने के भी उनके कई किस्से हवाओं में तैरते थे। वक्त आने पर टीचर्स से भी भिड़ जाते थे। हमें बड़ा मजा आता था, उनके किस्से सुनने-सुनाने में। वे मिले गर्मजोशी से ही, लेकिन हाथ मिलाया तो स्पर्श की गर्माहट मेरे रोम से भीतर नहीं उतर पाई।
चेहरे पर अजीब सा ठंडापन उनकी रगों में बहने वाले गर्म खून को प्रतिबिम्बित ही नहीं कर पा रहा था। तभी पसंदीदा टीचर के एक दोस्त मिले। पत्नी-बच्चों के साथ बाइक पर आ रहे थे, लेकिन वैसे ही हाथ उठाकर इशारा किया। मस्ती में झुमते हुए आगे आए। सभी से मिलवाया। जितनी देर साथ रहे खूब बात करते रहे। झरने की तरह बहते रहे। वही किस्सागोई, वही अंदाज, वही ठहाके। मैं जितनी देर उनके साथ रहा, उनके साथ ही था। बाद में भी वे देर तक मेरे जेहन पर छाए रहे। यादों की खिडक़ी पर दस्तक देकर गए थे, कई किस्सों की दावत ने मुझे फिर पुराने दिन जीने का मौका दे दिया।
किस्सों से फारिग हुआ तो फिर वे लोग भी याद आए, मध्यम आयु के ठहराव को जी रहे थे। मैं सोच रहा था, क्या होता है उम्र के बढऩे से। क्या उम्र, ओहदे, रसूख और चुनौतियों का बढऩा इतना दुष्कर होता है कि हम वह नहीं रह पाते, जो हम हैं। ये कैसे हो सकता है, कई फीट गहरी बावड़ी में 25 फीट ऊपर से छलांग मार देने वाला खिलदंडों का शहंशाह, रास्ता रोककर खड़े सांड को देखकर हुश-हुश क्यों करने लगता है। उम्र के साथ आने वाले शारीरिक बदलाव तो आएंगे ही, लेकिन मन की जमीन पर वह पथरीलापन कहां से आ जाता है। संवेदनाओं की नमी कहां छुप जाती है, ठहाकों का बेलोसपन क्यों दुबक जाता है। जबकि बदलाव सिर्फ बाहरी है, भीतर तो वही तेज साइकिल चलाने वाला लडक़ा अब तक पहियों में हवा भर रहा है, फिर क्यों उसे साइकिल को स्टैंड से उतारने की इजाजत नहीं दी जा रही। सवाल है, अपना-अपना जवाब उन सबको ढूंढना होगा।

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