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नोटबंदी की मलाई 

नोटबंदी के तमाम स्याह पक्ष के बीच कुछ अच्छी बातें भी हैं। नोटबंदी और कैशलेस ट्रांजेक्शन या बैंकों के व्यवहार में आए महान बदलाव से मैंने कई बातें सीखी हैं। इतना ही नहीं इन आदतों को मैं मोनेटाइज भी कर पाया हूं। आजमाकर देखिए शायद आप पर भी कृपा आने लगे।

पहली तारीख को मकान मालिक ने याद दिलाया कि आज पहली तारीख है। मैंने कहा, जी आज पहली तारीख है। मेरी ठंडी प्रतिक्रिया देख, उन्होंने हथेली खुजलाई तो मैंने भी वही दोहरा दिया। वे बोले यार तुम तो कुछ समझ ही नहीं रहे हो। ये बताओ किराया कहां है। मैंने कहा अच्छा किराए की बात हो रही है, तो निकालिए साढ़े 12 हजार रुपए। वे बोले, ये तुम्हे मुझे देना चाहिए, तुम मुझसे क्यों मांग रहे हो। आखिर मकान मालिक मैं हूं।

मैंने कहा, हुजूर आप जो हैं, वह हैं, लेकिन मैं क्या हूं, इसे भी तो समझने की कोशिश कीजिए। देखिए मैं आपके इस मकान में रहता हूं, उससे इसकी सुरक्षा होती है। कोई और इसमें घुस नहीं पाता। फिर मैं इसमें सुबह-शाम दीया-बत्ती करता हूं। मेरी मैड इसकी साफ-सफाई करती है। मेरी पत्नी इस घर को सुंदर और रहने लायक बनाए रखने के लिए तमाम जतन करती है, ये सब काम क्या आप मुझसे मुफ्त कराएंगे।

उन्होंने कहा, यार अजीब बात कर रहे हो, भाई ये सब काम तो तुम अपने रहने के लिए करते हो। मैंने कहा, वह तो ठीक है, लेकिन करता तो आपके घर में हूं ना। तो आपके घर का मेरे रहने से जो भला हो रहा है, उसका कुछ नहीं करेंगे। उन्होंने सिर पकड़ लिया, बोले ऐसा भी कहीं होता है। मैंने कहा, क्यों नहीं होता। बैंकें क्या कर रही हैं। मेरा ही पैसा मैं ही एटीएम से निकालने जाता हूं तो फटाक से पैसा काट लेते हैं। बिजली का बिल ऑनलाइन भरता हूं तो पैसा काटते हैं। रेल का टिकट लेने जाता हूं भी पैसा काट लेते हैं। अब मेरा ही पैसा मैं ही इस्तेमाल कर रहा हूं तब भी जगह-जगह भेंट चढ़ाना पड़ रही है।

आपने तो मेरे जैसे महान व्यक्ति को अपने घर में रखा हुआ है, मैं यहां रहकर आपके मकान की जो मिजाजपुर्सी कर रहा हूं उसका कुछ नहीं करेंगे क्या। मकान मालिक चारो खाने चित। सुना है बेहोश हो गए थे, घर वाले अस्पताल लेकर गए हैं। मैंने पिछले चुनाव में परोसे गए चुनावी जुमलों के कुछ पोस्टर उनके घर में रखवा दिए हैं, उम्मीद है, उन्हें देखकर शायद कोई राहत मिले।

अगले दिन सुबह दूध वाले भैया टकरा गए। कहने लगे बाबूजी इस महीने का हिसाब नहीं हुआ अब तक। मैंने कहा, हां-हां आ जाओ तुरंत कर लेते हैं। उसने मुझे एक कार्ड थमा दिया। बदले में मैंने भी एक कार्ड थमा दिया। हाथ में पकड़ते ही उन्हें करंट लगा, बोले ये क्या है। मैंने कहा, भाई जैसे तुम्हारे दूध का बिल है, वैसे ही यह उसके इस्तेमाल का बिल है। वह कहने लगा आप मजाक कर रहे हैं। मैंने कहा, नहीं भाई मैं बेहद गंभीर किस्म का इंसान हूं। अरे, पर आप बर्तन की धुलाई और दूध लेने का पैसा कैसे वसूल सकते हैं। मैंने कहा, देखो भाई आप तो रोज दूध लेकर आ जाते हो, लेकिन मुझे तुम्हारे दूध के लिए कितने जतन करने पड़ते हैं, ये कभी सोचा है।

बर्तन साफ कराना होता है, उठकर दूध लेने आना-जाना, फिर उसे गर्म करना, ठंडा होने पर फ्रिज में रखना, फ्रिज की बिजली का खर्च वहन करना ये सब क्या तुम्हे दिखाई नहीं देते। वह बोला ये तो सब आप अपने लिए करते हैं, मेरा इसमें क्या है। मैंने कहा, भाई ये भी तो सोचो कि अगर मैं दूध लेना बंद कर दूं तो तुम्हे गाय-भैस पालने, उसे खिलाने-पिलाने, दूध निकालने और उसे यहां तक लाने की जरूरत ही क्या पड़े। अरे, मैं हूं तो तुम्हारा धंधा चल रहा है। अब तुम इसकी कोई कीमत भी न चुकाओगे क्या। अब देखो न सरकार भी तो तुम्हारी ही है, लेकिन वह भी तो तुमसे हर बात के लिए टैक्स वसूल रही है, हमने अपने लिए जरा सा क्या मांग लिया तुम तो बिखर गए।

मकान मालिक के पड़ोस वाले बेड पर दूध वाले भैया ड्रिप लगवा रहे हैं। इसके बाद के बेड पर किराने वाला, सब्जी वाला, कपड़े वाला भी है। मैंने यही सरकारी दाव बच्चों के स्कूल पर भी आजमाना चाहा, लेकिन फिर गम खाकर रह गया कि छोड़ो भाई, गुरुओं को परामर्श मंडल में डालना अपने को शोभा नहीं देता।

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