खरीदी का जायका तुम क्या जानो वेब बाबू

मेरे एक दोस्त ने दिवाली की सारी खरीदी अंगुलियों से चुटकियों में कर ली। मैं बड़ा हैरान रह गया, तीन-चार दिन हो गए। हर बार लगता है कि अब हो गया, तब हो गया, लेकिन फिर कुछ न कुछ रह जाता है, लेकिन मियां खां ने तो बस 20 मिनट अंगुली टिप-टिप की और फारिग। मैंने कहा, यार ये बड़ा कमाल है, मुझे भी सीखा दो। जैसे ही मैंने कहा, उन्होंने मेरे मोबाइल पर दो-तीन एप डाउनलोड कर दिए। बोले बस अब इन पर अंगुलियां घूमाते जाओ और जो खरीदने का मन करे, उस पर दो बार अंगुली रख दो। बाजार घर चलकर आ जाएगा।

मुझे लगा ये बढिय़ा काम है, मैं एक के बाद एक एप पर तफरीह करने लगा। बड़ा मजा आ रहा था, इधर मेरी अंगुली मोबाइल पर एक से दूसरा कोना नापती और उधर नई ड्रेस में कोई मुस्कुरा उठती। तरह-तरह के रंग-पैटर्न और स्टाइल पूरा मार्केट खंगाल डाला। कानों में मुन्ना भाई एमबीबीएस का गाना बजने लगा… आंखों में आंखे डाल देख ले। इसी बीच दोस्त ने पूछ मारा, कुछ पसंद आया, मेरे मुंह से निकल गया, सब पसंद आया। वह चौंक पड़ा, अरे भई क्या पसंद कर रहे हो। अब हड़बड़ाने की बारी मेरी थी। मैंने खुद को संभाला और कहा, अरे कुछ नहीं अभी तो बस जीभर कर देख ही रहा था और तुमने बीच में टोक दिया। फिर देखता हूं अब कि बार मिजाजपुर्सी के बजाय खरीदने के लिए।

बड़ी बात यह है साहब ही हर चीज पर 30 फीसदी, 50 फीसदी डिस्काउंट चल रहा था। जैसे मेले में लगी कोई दुकान हो, जहां रस्ते का माल सस्ते में बिक रहा हो। लूटमार मची हो। ज्यादा डिस्काउंट वाले माल पर हाथ रखो तो जरा सा अंदर घुसते ही आउट ऑफ स्टाक आ जाए। महंगा माल फौरन से पेशतर हाजिर। मैं उलझ गया, फिर कुछ खरीदने का मन हुआ तो वह क्रेडिट कार्ड का नंबर मांगने लगा, वह तो अखबार वालों को कोई देता नहीं। इसलिए वह विकल्प किसी काम का नहीं निकला। डेबिट कार्ड की डिटेल देने में अपने पैर कांपने लगे। रोज तो खबर आ रही है एटीएम फ्राड कर इतने निकाल लिए, उतने उड़ा दिए। दोस्त बोला इतना डर रहा है तो कैश ऑन डिलेवरी कर ले। मैंने कहा, ये बढिय़ा है पुरानी वीपीपी टाइप स्कीम।

फिर भी मन नहीं माना तो पूछ लिया कि कैश ऑन डिलेवरी में भी एक बार सामान देखने देंगे या नहीं। वह बोला नहीं पहले पैसा देना पड़ेगा उसके बाद ही कुरियर मिलेगा। मैंने पूछा यार पत्थर तो नहीं निकलेंगे पैकेट में। उसने समझाया कभी-कभी कोई फ्राड हो जाता है, लेकिन बड़ी कंपनियों में नहीं होता। मैंने मन मारकर या उसका मन रखने के लिए ऑर्डर कर दिया।

अब चौबीस घंटे दिमाग में वही घूमने लगा। कब आएगा, कैसा आएगा, टाइम पर नहीं आया तो क्या होगा। बाद में उसका क्या करेंगे। दिवाली तो निकल ही जाएगी। उधेड़बुन जारी थी, कपड़ा कैसा होगा, रंग तो नहीं उड़ जाएगा, रौएं तो नहीं निकलेंगे, जिस ब्रांड का बताया है उसी का आएगा कि कोई और पट्टी लगा के अपने को पट्टी बांध देगा। दूध वाला, सफाई वाला, अखबार वाला भी कॉल बेल बजाए तो मुझे ऐसा लगे कि बस आ गया पैकेट। पूरे दिमाग में पैकेट ही पैकेट घूमे। उमर ज्यादा हुई नहीं, लेकिन लानत इस ऑनलाइन खरीदी पर कि सपने में भी पैकेट ही आने लगे तो दिमाग हील गया। ये कैसा टोटका कर बैठा।

खैर साहब जैसे-तैसे दिन बीते और सच में कुरियर वाले ने कॉलबेल बजाई मैंने 40 बार गिनकर पैसे पहले ही तैयार रख छोड़े थे। फिर भी तीन बार और गिने और डिलेवरी बॉय को थमा दिए। और उसे वही रोक लिया कि रुक जा भाई, जब तक माल की तस्दीक नहीं हो जाए, यहीं रुके रहना। उसने कहा, अब इससे कुछ नहीं होगा। आपको लौटाना हो तो उसके लिए अलग प्रोसेस है, मैंने कहा वह सब मुझे नहीं समझता। अगर गड़बड़ निकली तो कह देना कि पार्टी ने लेनेे से मना कर दिया। वह बोला, नहीं साहब पैकेट फाडऩे के बाद ऐसा नहीं हो सकता। मेरा कलेजा मुंह को आ गया। फिर भी हिम्मत करके पैकेट ले लिया।

खोल कर देखा तो सामान ठीक निकला, लेकिन अरमानों का दिवाला निकल गया। वहां जिस अदा से मॉडल ने पहन रखा था, ऐसा लग रहा था कि मैं भी पहनकर वैसा ही हो जाऊंगा, लेेकिन हुआ कुछ नहीं। चार-पांच दिन से मेरी हालत घर में सबको पता थी इसलिए मैं न वह पैकेट रख पा रहा था ना वापस कर पा रहा था। अंगुली की टिप-टिप में हो गई अपनी तो हैप्पी दिवाली।

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