नेताओं की किमियागिरी

Amit Shah

Menka Gandhi
Menka Gandhi
सुनते हैं कि एक व्यापारी था, उसने ईश्वर को प्रसन्न करके यह वरदान ले लिया कि वह जिस वस्तु को हाथ लगाएगा, वह सोने की हो जाएगी। मौजूदा दौर में लगता है, यह वरदान नेता पुत्रों और उनके बाकी रिश्तेदारों को हासिल हो गया है। मिट्टी को भी हाथ लगा देते हैं तो वह सोना हो जाती है। देश की जरूरतमंद आवाम इन महान देवदूतों से यही गुजारिश करना चाहती है कि हुजूर और कुछ मत दीजिए, बस यही किमियागिरी सीखा दीजिए। हमारे भी दिन बहुर जाएंगे।
यह किमियागिरी ही तो है जो शाहजादे की मरी हुई कंपनी अचानक से 16 हजार गुना मुनाफा कमा लेती है। कभी घाटे में दिन काट रही कंपनी पूरी ताकत झोंककर 50 हजार कमाती है तो अचानक उछलकर 80 करोड़ का प्राफिट ले आती है। जिसमें से 51 करोड़ रुपए विदेश से आते हैं। इतना ही नहीं शेयर मार्केट में डील करने वाली कंपनी को मध्यप्रदेश में ही पावर प्रोजेक्ट का काम सौंपा दिया जाता है। यहां दो-पांच लाख के प्रोजेक्ट के लिए लोन की ख्वाहिश लिए युवाओं की चप्पलें घिस जाती हैं, लेकिन उन्हें 7 करोड़ की जमीन पर कोई कंपनी 25 करोड़ का लोन दे देती है, जिसका अपने अकाउंट में कहीं जिक्र भी नहीं करती।
मनी लांड्रिंग की जो परिभाषा समझ आती है, वह यही कहती है कि किसी मरी हुई कंपनी में अचानक से पैसा आता है। उसमें इतने नोट ठूंस दिए जाते हैं कि वह फुल कर कुप्पा हो जाती है। फिर अचानक एक दिन वह कंपनी मर जाती है या यूं कहें तो मार दी जाती है। ऐसी कई कागजी कंपनियों के दम पर किताबों में ही अरबों इधर से उधर कर दिए जाते हैं। एक आम व्यापारी छोटी सी कंपनी खोलता है, युवा कोई स्टार्टअप लाते हैं तो खून-पसीना एक करके भी करोड़ों के टर्नओवर तक आने में कई बरस लग जाते हैं, यहां यह काम चुटकियों में हो जाता है। और जो किरदार मिलकर महान मुनाफे कमाने वाली अद्भूत दास्तां की स्क्रिप्ट लिखते हैं वे सब वहीं हैं, जो वर्षों से इर्द-गिर्द मंडरा रहे हैं। कोई सोहराबुद्दीन एन्काउंटर में गवाहों को धमकाने का आरोपी रहा है तो कोई पुराना विश्वस्त सहयोगी।
और यह जादू कोई पहली बार नहीं हुआ है। इसके पहले दामाद जी भी यह करिश्मा दिखा चुके हैं। उन्होंने हरियाणा में जमीन खरीदी थी सात करोड़ में, लैंड यूज बदलते ही यह जमीन पूरे 50 करोड़ रुपए की हो गई। वह सिर्फ नौ दिन में। यानी नौ दिन में ही पूरे 43 करोड़ रुपए का मुनाफा। बीकानेर में भी 270 बीघा जमीन 79 लाख में खरीदी गई थी। और यह उनके योग्य हाथों का ही कमाल था कि चंद दिनों में ही उस जमीन को इस लायक बना दिया गया कि वह 5 करोड़ रुपए में बिकी। उस मामले में भी तो यही हुआ था। ऐसे ही असुरक्षित लोन दिए गए थे, ऐसे ही कंपनी पर कृपा बरसाई गई थी।
नेताओं के पास मुनाफा काटने का यह फार्मूला सिर्फ कंपनियों तक ही सीमित नहीं है। मध्यप्रदेश के नेता खेती में भी ऐसा ही करिश्मा दिखा रहे हैं। यहां बाकी किसान न्यूनतम मूल्य तय करने, सूखा ग्रस्त घोषित करने के लिए पुलिस की लाठी-गोली खा रहे हैं। सूद नहीं चुका पाने पर फांसी पर झूल रहे हैं। वे ही खेत नेताओं को लाखों रुपए महीने की कमाई करके दे रहे हैं। ऐसे अनगिनत मामले हैं, जिनमें नेताओं और उनके करीबी रिश्तेदारों ने मुनाफे की परिभाषाएं बदलकर रख दी है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक ऐसी मिसालों से देश भरा पड़ा है। दक्षिण के एक नेता पुत्र ने तो अखबार से भी ऐसी ही क्रांति की थी, जब रातोंरात जिले-जिले में अखबार के निजी दफ्तर खोल दिए गए और उनका राज्य अखबार की उन्नति की एक नई मिसाल का साक्षी बना।
सवाल मत पूछिएगा कि ये सब कैसे होता है। इस देश में अब सवाल पूछने की इजाजत किसी को नहीं है। अगर अपनी नागरिकता बचाए रखना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि मुंह सिल लीजिए वरना देशद्रोही की तमगे के साथ लाहौर-कराची के टिकट तैयार मिलेंगे। वरना, मामले का खुलासा करने वाली पत्रकार पर 100 करोड़ की मानहानि का दावा तो तैयार हो ही चुका है। और हां, जांच के चक्कर में मत उलझ जाइयेगा। जांचों की हकीकत किसी से छुपी नहीं है।

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