वृंदावन में रहना है तो

question

एक पुराना गाना सुना होगा, दुनिया करे सवाल तो मैं क्या जवाब दूं। फिल्म की नायिका की तरह कोई और भी अगर दुनियाभर के सवालों से घिरा हो तो उलझन में पडऩा स्वाभाविक है। ऐसे में कोई क्या करेगा, मुंह छुपाएगा, जवाब ढूंढेगा या फिर बात ही पलट देगा। हालांकि अब वक्त बदल गया है। इसलिए बहुत जरूरी है कि इस गाने को भी नए सिरे से लिखा जाए। क्योंकि अब किसी के सवालों के जवाब देने की जरूरत नहीं है। पाषण युग का न्याय यही सिखाता था ना, खून का बदला खून तो फिर सवाल का बदला सवाल क्यों नहीं।

वैसे भी सवाल का जवाब देना अब आउट ऑफ फैशन है। आप घर में भी किसी से पूछ कर देख लीजिए, पता चल जाएगा। सुबह उठकर पत्नी या बच्चों से ही दो-तीन सवाल पूछेंगे तो जवाब में यही सुनने को मिलेगा कि आपको हो क्या गया है। सवाल क्यों पूछ रहे हो इतने। आप भी जवाब नहीं दे पाएंगे, यही पूछेंगे तो क्या मैं कुछ पूछ भी नहीं सकता। सवाल पर सवाल पूछने की यह कुतुबमिनारी परंपरा बहुत चुपके से हमारे भीतर तक पैठ गई है।

पड़ोसी से पूछकर देखिए, आजकल तुम्हारा बेटा बहुत लेट आने लगा है। जवाब में क्या सुनने को मिलेगा, तुम अपना संभाल लो, वह तो कई बार रात को आता ही नहीं। दफ्तर में किसी कर्मचारी से पूछ लीजिए, इतनी लेट क्यों आए हैं। जवाब मिलेगा, सर मैं ही मिलता हूं आपको। कल शर्मा पूरे पौन घंटे लेट आया था, उसे तो आपने कुछ कहा नहीं। सारे कायदे मुझ पर ही क्यों लागू होते हैं, इस ऑफिस में। अभी कल ही की बात है, चौराहे से गुजर रहा था। एक पुलिस वाले ने कुछ ऑटो चालकों को वहां से खिसकाने की कोशिश की। ज्यादा ऑटो जमा हो गए थे। ऑटो वाले ने छूटते ही कहा, यहां खड़ा नहीं करें तो कहां ले जाएं। 15 हजार रुपए रोड टैक्स भरा है। रोड पर खड़ा नहीं करें तो क्या घर में ही चलाएं।

यही हाल रहा तो डर है कि कहीं बच्चे परीक्षा में भी ऐसा ही न करने लगे। वहां उनसे सवाल पूछे जाएं और ये परीक्षक को ही सवाल दाग आएं। किताबें भी ऐसी ही छपने लगे कि सवालों के बदले में सवाल कैसे पूछे जाएं। सवालों का बही खाता, सवालों का फिजिक्स और सवालों की ही एनाटॉमी हो जाए। आपकी प्रतिभा इसमें है कि एक सवाल के जवाब में कितने सवाल पूछ सकते हैं। और सवाल के बदले सवाल राष्ट्रीय प्रवृत्ति बन जाए तो यह भी किया जा सकता है कि बच्चों की मेधा शक्ति का आकलन इसी बात से किया जाए कि एक सवाल के बदले में कोई कितने अच्छे और जबरदस्त सवाल कर सकता है।

और इन सबके बाद भी अगर आप सच में सवाल के बदले जवाब सुनना चाहते हैं तो फिर सवालों को मछली के जाल की तरह ही फेंकिये, ताकि जवाब वही मिले जो आप सुनना चाहते हैं। जैसे कभी-कभी लाड़ में आकर प्रेमिका पूछ लेती है, तो क्या मैं सुंदर नहीं लगती हूं। इमोशनली ब्लैकमेल करने वाले इस सवाल में, सवाल कम चेतावनी ज्यादा और धमकी भरपूर है। आपके मन में कुछ भी हो जवाब तयशुदा ही देना होगा। और प्रेमिका से उठकर यदि बात सकल राष्ट्र की हो तो फिर जवाब में सवालों की फेहरिस्त बहुत लंबी होना ही चाहिए। आप एक सवाल पूछिए कि बिना पर्याप्त तैयारी क्यों झोंक दिया पूरे देश को। सवाल बड़ा है, इसलिए इसके जवाब में एक नहीं पूरे 10 सवाल झेलना ही होंगे। ऐसा कैसे, क्या सवाल पूछने का हक आपको ही है। तसल्ली के लिए आखिर में आप से सुझाव मांग कर अहसान किया जा सकता है, लेकिन ड्रामा पूरा होने के बाद स्क्रिप्ट सुधारने का मतलब ही क्या है।

वैसे आप नाहक परेशान मत होइये, ये लोकतंत्र में एक नई शुरुआत है। जरूरी नहीं कि सिर्फ जनता ही सवाल पूछे, सत्ता को भी पूरा हक है कि वह एक पीछे साढ़े सात दाम ले। और पूछिए सवाल, अब ढूंढते रहिए जवाब। वो क्या कहते हैं, वृंदावन में रहना है तो राधे-राधे कहना होगा।

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