इन रंगों को मेरी रगों में दौडऩे से नहीं रोक पाओगे

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कोई कितना भी कुछ कहे, इन रंगों से मेरी देह ही नहीं आत्मा का कोई रिश्ता है। लाख कोशिश कर लीजिए, मेरी रगों में इन रंगों को दौडऩे से नहीं रोक पाएंगे। जब तक मेरी धडक़नों में ये तीन रंग खिलखिला रहे हैं, तब तक न तुम्हारी नफरत मुझ तक पहुंच सकती है और न ही प्यार का भ्रम मुझे उलझा सकेगा। मैं हर हाल में हर बार सिर्फ तिरंगा चुनूंगा और तुम देखते रह जाओगे।

तुम किसी भी लबादे या लिहाफ में मेरे सामने आओ मैं तुम्हे पहचान ही लूंगा। जानता हूं, जब तुम प्यार से पेश आते हो तो मुझे फिरकापरस्त बनाने के लिए जाल बिछाते हो। चाहते हो कि मैं किसी कौम का झंडाबरदार हो जाऊं। उसकी अच्छाई-बुराई से आंख-कान बंदकर दास की तरह सिर झुकाता रहूं। जब तुम कहो उसकी रक्षा के लिए हथियार उठाकर खड़ा हो जाऊं। तुम लड़ाने का हुनर जानते हो, इसलिए दोनों ही पलटनों के अधिपति तुम ही हो। तुम ही भडक़ाते हो, लड़ाते हो और बाद में शांतिदूत बनकर क्षीरसागर की शैया पर लक्ष्मी से पैर दबवाने को लेट जाते हो। कोई कौम खतरे में न है और न हो सकती है, कम से कम किसी दूसरे की वजह से तो हर्गिज नहीं। खतरे में अगर कोई है तो वह तुम हो और अपने आप को बचाने के लिए ही ये स्वांग रचते हो।

फिर अगड़ी-पिछड़ी का भ्रम दिखाकर मेरे भीतर जाति का अभिमान जगाने का षड्यंत्र रचते हो। जानता हूं, मुझे बेहतर बताकर मेरी श्रेष्ठता साबित नहीं करना चाहते, बल्कि खुद की चालों को कामयाब बनाना चाहते हो। मुझे अपने जाल में फांस कर किसी पिंजरे का तोता बना लेना चाहते हो। ताकि मैं दोहराता रहूं, राम-राम बोलता, हरी मिर्ची खाता। न पिंजरे से बाहर निकलूं, न कुछ देखूं, ना सोचूं और न करने की जुर्रत दिखाऊं। सवाल पूछने का भी साहस न बंटोर सकूं। वही दोहराऊं, जो तुम मुझसे सुनना चाहो। डफली तुम्हारी, राग भी तुम्हारा और गला व हाथ मेरे, ऐसा कैसे हो सकता है।

और ये जो आरोपों का खेल हैं ना वह भी अब बहुत हो चुका। तुम्हे क्या लगता है तुम एक-दूसरे पर खींच-खींच कर आरोप जड़ोगे और मैं खुश हो जाऊंगा। तालियां बजाऊंगा। इसे ही ईमानदारी का सबूत मानने लगूंगा और ज्यादा बड़े आरोप लगाने वाले के साथ हो जाऊंगा। भ्रम है, दूर कर लेना। मैं जानता हूं ये आरोपों का तिलिस्म तुम क्यों बुनते हो। मकड़ी के इस जाल में सिर्फ मक्खियां और छोटे-मोटे कीट-पतंगे ही फंसते देखे हैं। तुम यह जाल बुनते हो और फिर खुद ही उसे निगल जाते हो। फिर उगलते हो और फिर निगल जाते हो। तुम्हारा साजिशी आहार और शौच एक है, यह भी न समझ पाऊं, इतना नादान भी नहीं हूं।

जब सारे दाव फेल हो जाते हैं तो फिर तुम डर का ब्रह्मास्त्र चलाते हो। सरहदों की दुहाई देते हो, घर के भीतर दुश्मनों की छद्म फौज के नाम पर बरगलाते हो। मुझसे देशभक्ति के नारे लगवाते हो, श्वेत कपोत और रंग-बिरंगे गुब्बारों को गगन दिखाते हो। सच कहूं, इस गुब्बारे को कितना भी फुलाओ उसकी हकीकत छुपा नहीं पाओगे। जानता हूं कि इसे गेंद की तरह तुम ही टप्पा खिलाकर हर बार उछाल देते हो। तुम्हारी जिंदाबाद कब मुर्दाबाद में बदल जाए और मुर्दाबाद जिंदाबाद में खुद तुम्हे भी पता नहीं रहता। जानता हूं माहिर उस्ताद हो इस खेल के, तुम्हे इस दाव में पकडऩा आसान नहीं है, लेकिन भूलो मत ये इमोशन ब्लैकमेलिंग पुरानी हो चुकी है। कितने भी मोटे पर्दे लगा लो अपने आगे, मेरी नजर से बच नहीं पाओगे।

इन सबके साथ तुम यह भ्रम बनाए हुए हो कि कोई तंत्र है, जो लड़ रहा है, हकीकत यह है कि तंत्र अपने ही ढर्रे पर है। हर मोर्चे पर हकीकत में गण लड़ रहा है। चुनौतियां बहुत हैं, लेकिन हमारे हौसलों के आगे छोटी हैं। हम लड़ रहे हैं उनसे। लड़ रहे हैं तो जीत भी लेंगे, किसी न किसी दिन ये लड़ाई। उस दिन तुम्हे भी नाक में नकेल डालकर बांध देंगे किसी खूंटे से। गणतंत्र में गण आगे है और आगे ही रहेगा। तंत्र को उसके पीछे आना ही होगा। यदि सच में तंत्र में बने रहना है तो नफरत और विद्वेष का कलह घोलने के बजाय अपनेपन की खुशबू फैलाइये,बचे रहेंगे। वरना हमारी रगों में जो ये तीन रंग दौड़ रहे हैं वे सारी कलुष मिटाकर ही दम देंगे। इसलिए मैं खारिज करता हूं तुम्हारे सारे दुष्प्रचार को और सिर्फ तिरंगे को चुनता हूं। और मैं अकेला नहीं हूं।

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