फिर अपने शहर में

Indore

एक अंतराल के बाद अपने शहर में लौटना, स्कूल की छुट्टी होने के बाद घर आने जैसा है। गरमी के चार महीनों के बाद सावन के आगमन सरीखा। घुटनों के बल पूरे घर का चक्कर लगाकर लौटे बच्चे का मां के गोद में वापसी की तरह। आप जब दोबारा अपने शहर लौटते हैं तो वैसा ही अहसास होता है, जैसे ब्रेक अप के बाद पैच अप हो जाए तो महोब्बत और जुनूनी हो जाती है। अपने शहर में लौटना अपने आप में लौटने की तरह है। हालांकि वक्त की सिलवटें दोनों तरफ हैं, फिर भी शहर अपनों को पहचानना इंसानों से बेहतर तरीके से जानता है, जैसे चुंबक लोहे को।

दो दोस्त जब सालों बाद मिलते हैं तो क्या होता है। ताजी बातें कम और पुरानी पोथियां ज्यादा खुलती है। एक बार पूछ लिया कहो कैसे हो, सब ठीक चल रहा है ना। उसके बाद शुरू होती है यादों की जुगाली। याद है तब क्या हुआ था। जब ऐसा हुआ था, तो वैसा हुआ था। और इन बातों में कई नई बातें भी खुलती हैं, कई राज बेपर्दा होते हैं। ठीक ऐसा ही होता है, जब आप फिर अपने शहर से रूबरू होते हैं। बहुत कुछ बदल चुका होता है, लेकिन आपके बीच बातों का सिलसिला वहीं से शुरू होता है, जहां से आप शहर की महफिल हो छोडक़र जाते हैं। यह कामकाज के सिलसिले या फिर तीज-त्योहार अथवा किसी अन्य अवसर पर लौटने से इतर अहसास है। क्योंकि इस बार आप जानते हैं कि ये मेल क्षणिक नहीं है। आप शहर को और शहर आपको बिल्कुल अलग ढंग से देखता है।

घर के आसपास खड़ी इमारतों में वह दिखाई नहीं देता, जो आंखें देख रही होती है। वहां दिखाई देता है, अपना बचपन। यहीं तो स्टम्प गाड़ा करते थे और विवेक वहां से दौडक़र बॉलिंग करता था। कैसे एक बार शर्मा आंटी की छत पर चली गई थी बॉल और टूट गई थी उनकी अचार की बरनी। पढ़ाई के लिए जागी रातें याद आती हैं, नौकरी के शुरुआती दिनों की भागदौड़ दिखाई देती है। वे बस स्टॉप जहां से बच्चों को पहली बार स्कूल के लिए रवाना किया था। वे जैसे आवाज दे-देकर बुलाते हैं, बात करते हैं, वही दृश्य दिखाते हैं। आप उनमें खो जाते हैं घुल जाते हैं। उन बगीचों में स्लाइडर पर कोई भी बच्चा फिसले आपको अपने बच्चे ही सकुचाते और इठलाते नजर आते हैं।

दुकानें और उनके मालिक जिनसे आपका रोज वास्ता होता था, कैसा लगता है जब उनसे दोबारा मिलते हैं। यकीन मानिए भरोसा बहुत प्रगाढ़ हो जाता है। वह चौराहा जिस पर से आप दफ्तर जाते वक्त रोज गुजरते थे, वह वैसा ही होता है, लेकिन उस पर जमा यादों की गर्द झड़ जाती है। वह बात करता है तो बताता है कि कब उसी से गुजरते हुए आपके बच्चे ने पहली बार दुकान का बोर्ड पढक़र बताया था। मंदिर जाते हैं तो सिर्फ एक बार टन नहीं होती, पहले बजाई गईं सारी घंटियों की प्रतिध्वनि सुनाई पडऩे लगती है। देवता के समक्ष एक ही प्रणाम न जाने कितने पुराने प्रणामों का समुच्चय बन जाता है।

ठीक वैसे ही जब आप देखी हुई फिल्म दोबारा देखते हैं तो कैसा लगता है। मौजूदा के साथ आगे के सारे दृश्य भी आपको याद हैं, लेकिन अगर आप शौक से उसे देख रहे होते हैं तो हर बार वे स्मृतियों में दर्ज दृश्यों की सहज पुनरावृत्ति नहीं होते। वे दृश्य हर बार नई पर्त खोलते जाते हैं, नया अहसास जगाते हैं। वही ठाकुर, वही गब्बर, वही जय-वीरू, बसंती और मौसी। फिर भी जितनी बार देखो चाहने वालों को शोले पुरानी नहीं लगती। वह हर बार किसी न किसी रूप में कुछ नया कह जाती है, दिखा जाती है, सुना जाती है।

दरअसल, आप अपने शहर से कहीं जाते हैं तो अपने भीतर उसकी ढेर सारी छवियां सहेज कर ले जाते हैं। वक्त के साथ यादें धुंधली जरूर होती है, लेकिन धूमिल नहीं हो पाती। शायद यही वजह है कि अमेरिका में बरसों बरस रिसर्च करने के बाद भी कोई वैज्ञानिक मौत के बाद अपने ही शहर में खुद की पार्थिव देह को विसर्जित करना चाहता है। मानो यह जताना चाहता हो कि जिस शहर की मिट्टी, पानी, हवा से यह शरीर बना है, वह रुखसत के बाद उसी आदर के साथ लौटा दी जाए। मानो अपने शहर से कहना चाहता हो कि बाबा मैंने तुम्हारी विरासत का बड़े जतन से खयाल रखा, इसने भी मेरा बखूबी साथ दिया, अब तुम्हारी वस्तु फिर तुम्हे समर्पित करता हूं। नए सफर पर आगे बढ़ता हूं।

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