हर शाख पर कालिदास की खोज

सत्ता सुंदरी विद्योत्तमा से शास्त्रार्थ में परास्त तमाम विद्वान फिर उसी खोज में निकल पड़े हैं। खोज कालिदास की, जो अपनी ही शाखा को काट रहा हो। हर शाख पर ऐसे लोगों की तलाश की जा रही है। ढूंढ-ढूंढ कर निकाला जा रहा है। उनसे इशारों में वे सब बातें कहलाई जा रही हैं, जिसकी मदद से सत्ता सुंदरी को शास्त्रार्थ में परास्त किया जा सके। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल सिर्फ सत्ता के नहीं है, सवा सौ करोड़ आबादी के हैं। इसलिए कथानक थोड़ा उल्टा-पुल्टा है।

तो सभा मंडप खचाखच भरा है। लोग शास्त्रार्थ सुनने के लिए उतावले हुए जाते हैं। उन्हें लगता है कि इस शास्त्रार्थ के बाद विद्योत्तमा के सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे। फिर विद्योत्तमा कालिदास की बुद्धिमता के झांसे में आ जाएगी। वह फिर उसका वरण कर लेगी। विद्योत्तमा फिर एक अंगुली उठाती है। तात्पर्य होता है कि एकछत्र राज्य दिया था। क्या हासिल हुआ। किसकी जिंदगी बदली, किसके अच्छे दिन आए। एक आदमी भी ढूंढकर ला सकते हैं क्या। कालिदास को लगता है कि ये कह रही है कि एक ही परिवार पर इतने उपकार क्यों किए जा रहे हैं। बाकी घराने मर गए हैं क्या। इसलिए कालिदास दो अंगुलियां उठा देते हैं। मानो कह रहे हों कि सिर्फ एक ही क्यों दो बड़े परिवार हैं, जिन्हें हमने ऊपर उठाया है।

हम भी तो दो ही हैं। जो सत्ता और संगठन दोनों को चला रहे हैं। दोनों के बीच में कोई नहीं है। एक ब्रह्म है, जो सर्वेसर्वा बने रहने का भ्रम फैलाए बैठा है और एक माया है, जिसने ये सारा प्रपंच रचा है। वही इस भ्रम को बनाए रखने के लिए रोज नए कथानक गढ़ता है। नए किस्से-कहानी दौड़ाता है। आईटी सेल बनाता है, वाट्स एप यूनिवर्सिटी खोलता है। एक को दो और दो के एक करता रहता है। कभी तराजू लेकर बंटवारा करने बैठ जाता है तो कभी तलवार लेकर रेखाएं बना देता है। इसलिए एक नहीं दोनों ही सत्य है। ये ही मिलकर सबका राम नाम सत्य कर रहे हैं।

विद्योत्तमा चुप हो जाती है, उसे कोई जवाब नहीं सुझता। खुद को लाक्षागृह में महसूस करती है। वह इस बार पांचों अंगुलियां खोलकर पंजा दिखा देती है। अगर ये कुछ नहीं कर पाए थे, तो तुम तो कुछ करके दिखाते। कम से कम गिनाने लायक पांच काम तो होते। प्रचार के दौरान सभाओं में तो खूब गरजते थे, जब तो पांच लोग खड़े होकर सवाल पूछने लगें तो घिग्गी बन जाती है। जुमले-जुमले करने लगते हो। आलोचना सह नहीं पाते। दमन के लिए सरकारी मशीनरियां छोड़ देते हो। छापों और गिरफ्तारियों का डर दिखाते हो। ट्रोल आर्मी बनाते हो, ताकि जैसे कोई आवाज उठे, उसकी मां-बहनों का सत्कार कराकर उसे चुप रहने को विवश कर दो।

इसके जवाब में कालिदास फिर मुट्ठी कस लेता है। हवा में लहराता है। उसे लगता है कि सत्ता सवाल पूछ रही है कि कब तक पांच-पांच दिन कहकर दिलासा देते रहोगे। कभी कहते थे 100 दिन दे दो, कभी पचास दिन मांगने लगते हो। फिर कहते तो कि 70 साल का दारिद्रय दूर करने के लिए समय तो चाहिए ही। घूंसा हवा में घूमते ही लोग कह उठते हैं। हमने हमारी ताकत बढ़ाई है। सत्ता को मुट्ठी में कैदकर पांचों महाभूतों को कब्जे में कर लिया है।

लोकतंत्र के चारों स्तंभों पर खड़े होकर हम पांचवीं ताकत बन बैठे हैं। अब सभी हमारी छत्रछाया में, शरण में ही सुरक्षित है, जो बाहर है, वह बेचारा, बेघर और बेआबरू है। इसलिए हमने चुटकलों का नया शब्दकोष बनाया है। हंसोड़ों की फौज खड़ी की है, जो संसद से लेकर गांव की पगडंडियों तक सो सॉरी बोल रहे हैं। एक-दूसरे के पजामे का नाड़ा खींच रहे हैं।

अब आप इसे विडम्बना कहें या नियति हर बार विद्योत्तमा अंगुली और मुट्ठी देखकर ही बेबस हो जाती है। एक अंगुली के बदले दो अंगुली और पंजे के बदले मुट्ठी यही उसकी तकदीर है। उसके दरबार में रोज नए कालिदास आ रहे हैं। रोज नए इशारे कर रहे हैं। नई साजिशों को जन्म दे रहे हैं। हर इशारा जितना कालिदास को और महान बनाता, साबित करता जा रहा है, उतनी ही विद्योत्तमा कमजोर हो र ही है, ठगी जा रही है। क्योंकि सवालों के जवाब में धर्म और मूल्य पिरोए जा रहे हैं, ताकि विद्योत्तमा अगर अंगुली और मुट्ठी से नहीं मानी तो उसे मूल्यों से रिझा लेंगे।

अंतत: उसके हाथ वही पंक्ति आना है नष्टस्य कान्या गति: यानी जो एक बार गिर गया, गिरते जाना ही उसकी नियति है। कितने ही शास्त्रार्थ कर लें, इस गिरावट को रोकना संभव नहीं।

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