एक दिन हिन्दी का

तो आखिर इस वर्ष भी वह दिन आ ही गया। जब प्रिंट लाइन में से खोजबीन कर हिन्दी अखबार के संपादकों को निकाला जा रहा है। दो दिन पहले एक आलीशान दफ्तर में इसके लिए बकायदा बैठक हुई। बड़े साहब ने हिन्दी समिति के प्रभारी को तलब किया। कहने लगे, दुबे जी इस बार हिन्दी पर कुछ हो नहीं रहा क्या। बड़े साहब पूछ रहे थे, मंत्रालय से रिमाइंडर आ गया है। तुम हिन्दी वाले कुछ करते-धरते नहीं हो क्या। बताते क्यों नहीं, क्या करना है।

दुबेजी सकपका गए। कहने लगे, सर एक हफ्ते पहले ही फाइल आपको सौंपी थी। आंख नीची कर बोले, आप देख नहीं पाए होंगे। बिना समय गंवाए दुबे जी ने फाइलों के पहाड़ के बीच में से एक खींची और साहब बहादुर के आगे कर दी। साहब बोले, अरे यार तुम्हारी प्राब्लम ही यही है। हिन्दी की फाइल है तो क्या हिन्दी में ही लिखोगे। उस पर रिमार्क ही कर देते कि मिनिस्टरी के ऑर्डर हैं, हिन्दी डे पर कुछ अच्छा करना है। आपसे कुछ नहीं होगा, आप तो जाइये सभी को बुला लीजिए। बैठक कर लेते हैं, यहीं तय कर लेंगे क्या करना है। और सुनो, चाय-समोसे का इंतजाम भी करते आइयेगा। इतना बजट तो बचाया होगा ना आपने हिन्दी का। दुबे जी कुछ बोले नहीं खींसे निपोरते हुए चले गए।

कुछ ही देर में चाय-समोसे के बीच पूरा ऑफिस आ गया था। सक्सेना जी ने आते ही कहा, अरे यार अभी कौन सा तूफान आ गया है, जो ताबड़तोड़ मीटिंग बुला ली है। जरूरी जानकारी भेजना थी, कमबख्त दुबे से कुछ होता नहीं है। पूरे साल निठल्ला बैठा रहता है और हिन्दी दिवस आते ही हमारी छाती छिलने लगता है। तुम खुद कुछ तय नहीं कर सकते क्या हिन्दी प्रेमी महाशय। पता है, यहां कितना काम पेंडिंग है। पिछले महीने दो नोटिस आए थे। कोई कुछ जवाब देता, इससे पहले साहब आ गए। नाश्ते की प्लेट देखते ही बोले, दुबेजी साल में एक बार तो हमेंं खिलाते हो, बाकी समय तो हिन्दी की सारी चांदी तुम ही लूट लेते हो। मिठाई का एक पीस भी लाते न बना तुमसे। जितना कहा उतना ही किया। कभी काम में भी इतनी सुन लिया करो। दुबेजी के चेहरे का रंग उड़ गया। अभी लाया सर, कहकर तुरंत बाहर को निकल लिए।

मिठाई आने के बाद मीटिंग शुरू हुई। सक्सेना पहले ही उतावल में थे। कहने लगे, सर करना क्या है। वही कर लेते हैं, निबंध प्रतियोगिता, भाषण, चित्रकारी-वित्रकारी। एक दिन पूरे स्टाफ का परिवार सहित हिन्दी में गेट टू गेदर रख लेते हैं। उसी में बच्चों को इनाम विनाम बांट देंगे और हो गया। हिन्दी पखवाड़ा। यह सुनते ही मिसेज गुप्ता ने भी हामी भर दी। ऐसे ही तो होता है हिन्दी पर और क्या करना है। चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए अलग से प्रतियोगिता रख दो। एक दिन उनके बच्चों को भी बुला लेना। वरना वे अगर मेन कॉम्पटिशन में आ गए तो हिन्दी मीडियम के चक्कर में हमारे बच्चों को कॉम्प्लेक्स होने लगेगा कि उनकी हिन्दी कितनी अच्छी है।

सबकी चकर-पकर के बीच साहब ने बात का रुख मोड़ा, कहने लगे, अरे भई इससे कुछ होगा नहीं। इस बार एचओ ने पूरी रिपोर्ट मांगी है। हर दिन की अलग से डिटेल बनाना पड़ेगी। अखबारों की कटिंग भी लगाना होगी। किसी ने सुझाव दिया कि बेहतर होगा किसी हिन्दी अखबार के संपादक को ही बुला लेते हैं। वह आएगा तो उसके अखबार में खबर तो छापेगा ही। कटिंग का काम हो जाएगा। दुबेजी के भरोसे रहे तो पिछली बार की तरह एक खबर न छपेगी। फिर डांट खाना पड़ेगी। मिसेज ऊर्जाकर बोलीं, सर देख लीजिएगा गड़बड़ न हो मेरी लोन की एप्लिकेशन पेंडिंग है, कहीं वह न उलझ आए, इस दुबे के चक्कर में। दफ्तर से हिन्दी अखबार मंगवाए गए, पता किया गया कि कौन आसानी से आ सकता है।

कार्यक्रम में हिन्दी के संपादक को बुलाया गया। स्वागत के लिए जैसे ही हार उठाया, संपादक ने खुद ही हाथ आगे बढ़ाकर पहन लिया। उसे डर था कि कहीं एनवक्त पर मूड न बदल जाए। साल में एक ही बार मौका आता है, यह भी हाथ से न खिसक जाए। संपादक बड़ी तैयारी करके आए, भाषण शुरू हुआ। उन्होंने हिन्दी के गुदगुदाते किस्से सुनाए, कई छंद परोसे और भाषा की शुद्धता पर लंबा-चौड़ा भाषण दे डाला। अंग्रेजी स्कूलों और समाज में बढ़ती अंग्रेजियत से आती विकृति, दरकते परिवारों तक को खींच लाए। कैसे हिन्दी से दूर होते ही समाज छिन्न-भिन्न हो रहा है।

उनके भाषण के कारण सबसे बुरी गत बेचारी घड़ी की हुई। तमाम कलाइयों ने पहली बार महसूस किया कि ये अदना सा उपकरण इतना महत्वपूर्ण हो गया है। आभार प्रदर्शन में साहब ने संपादक के ज्ञान, कौशल, चरित्र, मेहनत और ईमानदारी की बड़ी प्रशंसा की। संपादक जी चौड़े हो गए। अगले दिन दफ्तर के नोटिस बोर्ड और फाइल में अखबारों की कुछ कतरन चिपक गई। साहब के साथ सभी ने राहत की सांस ली। चलो ये पखवाड़ा भी निकल गया। मिसेज ऊर्जाकर को लोन मिल गया और दुबेजी को अगले साल के लिए बजट। ऐसे ही एक और हिन्दी दिवस, हिन्दी पखवाड़ा, हिन्दी माह, हिन्दी वर्ष और हिन्दी जीवन गुजर रहा है। गुजर ही जाएगा।

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