घोड़ों पर सवार विमान

एक गांव में एक सेठ रहता था। सेठ बहुत परोपकारी था। खास बात यह थी कि उसने सबकुछ अपनी मेहनत से कमाया था। पैसा कमाने, बचाने और सही जगह लगाने में उसे महारत हासिल थी। सबसे अहम उसकी पारखी नजर थी, एक झलक में ताड़ जाता था कि कौन कितनी लंबी रेस का घोड़ा है। जैसे ही किसी में दम देखता वह उसे अपने खेमे में करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता। उस पर इतने अहसान करता कि वह कभी उसके दायरे से बाहर नहीं जा पाता। अंतिम समय में सेठ ने यही सीख अपने बच्चों को भी दी।

अब बच्चे भी इस पथ पर चल निकले। वे कभी किसी को डिनर पर बुलाते तो कभी किसी की शादी में उपहारों की झड़ी लगा देते। धंधे के साथ ही लंबी रेस के घोड़े पालने में कभी कौताही नहीं करते। जितना दिमाग बिजनेस में लगाते उससे कहीं अधिक घोड़ों को पालन पर भी देते। यही वजह थी कि उनका अस्तबल हमेशा से ही घोड़ों से आबाद रहता। सेठ के बच्चों को हिनहिनाहट बहुत पसंद थी। जब भी अस्तबल से गुजरते, घोड़ों की हिनहिनाहट सुनकर खुश हो जाते। इसी शौक की वजह से वे हर बार नए और बेहतर घोड़े लाने की जुगत में लगे रहते।

धीरे-धीरे इसी शगल ने उनकी कीर्ति पताका को दिग-दिगांत तक पहुंचाने में काफी मदद की। क्योंकि जिस भी क्षेत्र में जाते वहां उनके ही पाले-पोसे घोड़े नजर आने लगते। उनके कदम रखते ही सब उनके आसपास मंडराने लगते। हिनहिनाने लगते। लोग कुत्ते को कितना ही वफादार कहे, असली वफादार घोड़े होते हैं। क्योंकि कुत्तों को वफादारी सीखने और निभाने के लिए अलग से कुछ नहीं करना होता है। लेकिन घोड़े को लंबी रेस तक पहुंचने के लिए उतना ही लंबा सफर तय करना होता है। जो संघर्ष के दौर में घोड़े पर हाथ रखता है, घोड़ा हमेशा उसका अहसान मानता है।

इसका नतीजा यह हुआ कि हर लाइन सेठजी के कुनबे से शुरू होने लगी। जिस लाइन में वे खड़े हो जाएं, उनके अलावा कोई और वहां फटकने की हिम्मत भी न जुटा सके। लोगों की कंपनियां दिवालिया होने लगीं और ये उन्हीं धंधों में चांदी कूटने लगे। क्रिकेट में हाथ डाला तो वहां अरबी घोड़ों की फौज खड़ी की। पढ़ाई-लिखाई की तरफ कदम बढ़ाए तो विचार को ही देश में सर्वश्रेष्ठ का दर्जा मिल गया। बड़े-बड़े संस्थान चारों खाने चित हो गए और ये सूरमा की सूरमा बने रहे।

क्योंकि बाकी सब तो सिर्फ धंधा करते थे, लेकिन ये घोड़े भी पालते थे। कभी उनके हाथ दबाते तो कभी उनकी पीठ सहलाते। यहां तक कि धंधा चमकाने के लिए उनकी तस्वीरें अपने विज्ञापनों में छपा लेते तब भी कोई चूं नहीं कर पाता। क्योंकि जैसे ही बोलने की कोशिश करता, पीठ पर उनकी अंगुलियों के निशान उभर आते।

ऐसे ही एक बार देश की सुरक्षा की बात आई। सेठजी के बच्चों ने सोचा ये ऐसा मामला है जिसमें एक बार हाथ घुसा दिया तो फिर पीछे पलटकर न देखना पड़ेगा। एक भाई वैसे भी सालों से लूटा-पिटा बैठा था। कोई पूछ ही नहीं रहा था। किस्मत से पुरानी सरकार ने बात आधी-अधूरी छोड़ रखी थी। बनियागिरी में कमजोर थे, जो सरकारी कंपनी को साझेदार बनाकर बात आगे बढ़ाते रहे। सरकारी काम सरकारी गति से चलते हैं। सरकार गई और बात आई-गई हो गई।

अब नई सरकार आई तो इनकी बांछे खिल गईं। इसमें वे लोग थे, जिन्हें इनके पिता ने तब खाने पर बुलाया था, जब वे कुछ नहीं थे। यानी पिता ने संघर्ष के दिनों में उनकी पीठ सहलाई थी। बस सरकारी कंपनी गड्ढ़े में चली गई और सेठजी के बेटे की नई नवेली कंपनी को बैठे-बिठाए सोने की खान मिल गई। देशहित की दुहाई देने वालों ने सेठजी के बेटे की जमावट कर दी। अब पोल खुल भी गई तो सेठ को चिंता की जरूरत नहीं है, क्योंकि अपनी ही नहीं दूर देश की सरकार भी सफाई दे रही है। अपने ही लोगों को गलत ठहरा रही है। मंत्री बहस कर रहे हैं, तर्क-कुतर्क भिड़ा रहे हैं।

जनता तमाशा देख रही है, लेकिन इससे ज्यादा वह कुछ कर भी नहीं सकती है। कोई कीमतों की नापतौल में लगा है तो कोई निजी कंपनी पर इतने बड़े उपकार की वजह ढूंढ रहा है। वजह मिल भी जाएगी तो क्या कर लेंगे। सेठजी तो बेखौफ विमान का सफर कर ही रहे हैं, क्योंकि उसके आगे-पीछे, ऊपर-नीचे घोड़े दौड़ रहे हैं।

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