दिनकर को चुनौती देने वाले कवि की जिंदगी का हासिल

79 साल के एक बाबा ऑफिस आए। हाथ में 1970 में प्रकाशित स्वलिखित पुस्तक थी, शीर्षक था उमर हार दी एक दाव पर। साथ में कुछ पेज और महाकवि रामधारीसिंह दिनकर की कालजयी रचना कुरुक्षेत्र की उतनी ही पुरानी एक और पुस्तक। नाम ज्ञानचंद्र जैन, बीए एलएलबी (पी2एलयूजी) यानी एलएलबी की प्रीवियस परीक्षा में फेल। मुझे लगा, पता नहीं बाबा क्या लेकर आए हैं और क्यों आए हैं, लेकिन जब बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो लगा रोजमर्रा की जिंदगी के बीच एक कवि कितना कुछ सहता है। उसकी समझ और संवेदनाएं ही कितनी मुश्किल कर देती है, उनका जीना। रिटायर होने के 20 साल बाद भी वे इस चिंता में भिंड से इतनी दूर मेरे पास आए थे कि कहीं उनकी ये कविताएं, उन्हीं के साथ खत्म न हो जाएं। उन्होंने कभी महाकवि रामधारीसिंह दिनकर की कालजयी रचना को रामचरित मानस के आधार पर चुनौती दी थी, अब वे अपने वक्त से कुछ सवाल कर रहे हैं। एक कवि की जिंदगी का हासिल तलाश रहे हैं।

जब वे दफ्तर आए तो मेरे मन में कुछ झिझक थी। बाहर चप्पल उतारने के बाद कैबिन का दरवाजा मुश्किल से खोल पा रहे थे। हाथ-पैरों में कंपन में साफ देख पा रहा था, लेकिन जब उन्होंने बोलना शुरू किया तो आवाज के जादू ने पलभर में मुझे जोड़ लिया। कहने लगे, आपके भिंड ऑफिस गया था कल, वहां से बताया गया कि ग्वालियर जाना होगा तो मैं आपसे मिलने चला आया। अब आप ही बताइये मैं क्या करूं। ये मेरी रचनाएं हैं, अगर कहीं मेरे फोटो और नाम के साथ छप सके तो। फिर यह भी कह दिया कि इसमें मेरा कोई नाम नहीं होगा, जो होगा आपका ही होगा। मैं बाबा की जिवटता से अभिभूत हो गया कि कोई कवि इस उम्र में अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए बच्चों की तरह उत्साहित है। फोटोकॉपियां हाथ में थामे 80-85 किमी दूर चला आया है, सिर्फ इसलिए की उनकी जो आवाज है, वह उनके गले के खामोश होने के साथ ही थम न जाए।

मैंने उनकी कविताओं पर कुछ बात शुरू की तो बच्चों से खिल उठे। सुनाने लगे तमाम किस्से। मैंने नाम के साथ एलएलबी के साथ लिखे पी2एलयूजी का मतलब पूछा तो साफ कह दिया कि हम इसका गलत फायदा नहीं उठाते। कोई पूछता है तो बता देते हैं कि एलएलबी पढऩे की कोशिश की, लेकिन प्रीवियस में ही फेल हो गए। उसकी सनद हमारे पास आज तक रखी हुई है। मैंने सनद पर आंखें फैलाई तो बोले, अरे वह जो फेल का सर्टिफेकेट था, वही रखा है अब तक। फिर किताब पर बात शुरू की, मैंने पूछा कब छपवाई थी ये किताब तो बोले 1970 में पत्नी की चुडिय़ां गिरवी रख कर दो हजार किताब निकलवाई थीं। 60 पैसे में एक किताब पड़ी थी, एक रुपए दाम रखा था, सोचा था कि बिक जाएगी, लेकिन किताब कहां बिकती है। पड़ी रह गई, यूं ही। फिर इधर-उधर हो गई। किताब में उस समय के मंत्री और कवि
बालकवि बैरागी सहित कई लोगों के संदेश भी थे, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी।
मैंने पूछा तब कवि सम्मेलनों में कभी कविता पाठ किया है, तो बोले हां जरूर किया है। हमने सारे बड़े गीतकारों के लय पर कविताएं लिखीं, नीरज, बालकवि बैरागी, पारस भ्रमर उनमें शामिल हैं। कविता हमारी होती थी, लेकिन लय उनकी होती थी। इसी के साथ वे कुछ गीत गुनगुनाने लगे, कुछ क्षण के लिए मेरा कैबिन किसी कवि सम्मेलन के मंच की तरह हो गया। इतनी शानदार लय थी, उनकी कि लगा कैसे इतना प्यारा कवि लोगों की नजर में आने से वंचित रह गया। मैंने और कुरेदने की कोशिश तो कहने लगे, अब वह ऐसा ही कि कवियों के भी गिरोह हो गए हैं। कोई लाखन का गिरोह तो कोई गब्बर का। हमसे यह सब नहीं हो सका। पारस भ्रमर का एक गीत था गर तुम मिल जाते, उस पर मैंने 23 पेज का गीत लिखा है, लेकिन कभी कहीं गाने का मौका नहीं मिला। दिनकर की कुरुक्षेत्र की पंक्तियों को मानस के आधार पर गलत साबित किया, उसमें कई कवि ने मेरी बात को प्रमाणित भी किया। लेकिन फिर भी जिंदगी जीने में मजा नहीं आया। लगता है मेरे साथ ये सब खत्म हो रहा है।

काम-धंधे के बारे में सवाल किया तो कहने लगे ब्लॉक ऑफिस में काम करते थे। पूरी नौकरी में तीन बार सस्पेंड हुए और एक बार डिसमिस। मैंने पूछा वह क्यों भला, तो कहने लगे अफसरों को लगता था कि खुद भी कमाए और हमें भी खिलाए। ये हमसे हो न सका। हर बार कोर्ट गए और जीत कर वापस नौकरी की। सरकार ने हमसे समझौता किया जब डिसमिस किए गए तब तो। कहने लगे, नीम ना मीठा होए, जो खाओ गुड़-घी से। अब 20 साल से पेंशन पाते हैं।

उनके कवि हृदय की पीड़ा तब उभरकर सामने आई जब वे बोले, अब बच्चे बड़े हो गए हैं। अच्छे निकले, कपड़े की दुकान चलाते हैं। मेरी परेशानी यह है कि कोई मुझे ज्ञानी कहता है, कोई टीचर तो कोई मास्टर जी और कोई दुकान पर देखकर दलाल समझ लेता है कि क्या खरीदे-बेचेंगे। मन में पीड़ा होती है, मैं कवि हूं बस कवि की पहचान चाहता हूं। आखिरी में कहने लगे…

” जिनकी तमाम उम्र अंधेरा निगल गई, उनकी चिता जली तो बड़ी रोशनी हुई “

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