चार मकोड़े

वे चार मकोड़े थे। स्कूल के बाजू वाली सडक़ के किनारे पर टहल रहे थे। कोई इधर जाता, कोई उधर जाता। थोड़ी दौड़ लगाता, फिर रुक जाता। सारे लौटकर आते, एक दूसरे के मुंह सूंघते फिर अपने काम में लग जाते। कुछ देर पहले ही बारिश हुई थी, इसलिए आसपास जो भी था वह बह चुका था। उन्हें खासे परिश्रम के बाद भी कुछ नहीं मिल पा रहा था। वे बार-बार यही दोहरा रहे थे कुछ भागदौड़ करते फिर लौट आते, मुंह सूंघते और फिर लौट जाते।

फिर जाने क्या सूझी की चारों अपना घेरा तोडक़र बाहर आए। एक कतार में लग गए, आगे बढऩे लगे। जैसे उस इलाके का चप्पा-चप्पा छानने के बाद भी कुछ हासिल न हुआ हो तो बाहर निकलने का फैसला कर लिया हो। चारों एक-दूसरे के पीछे बढऩे लगे। इस बीच सडक़ के कटे हिस्से में थोड़ा सा कीचड़ आ गया। कुछ देर रुके, ठिठके मानो सलाह कर रहे हो आपस में। फिर आगे बढ़ गए। इसी उहापोह के बीच एक मकोड़ा पीछे रह गया। रास्ता भटक गया, वह देर तक इधर-उधर तलाशता रहा। फिर पीछे लौटकर आया। लगभग उन्हीं रास्तों पर गया, जहां वे पहले टहल रहे थे।

वह देर तक और दूर तक ढूंढता रहा। कभी इधर जाता-कभी उधर जाता। जब थकने लगा तो बीच में आकर खड़ा हो गया। मैंने महसूस किया कि वह अपना मुंह ऊपर करके कुछ कर रहा है। मानो अपने साथियों को जोर से आवाज देना चाह रहा हो। ईश्वर से मदद मांग रहा हो या फिर उदास होकर जोर से रोना-चीखना चाह रहा हो। अपनों से दूर हो जाने का दर्द उसकी हरकतों में महसूस हो रहा था। न जाने कैसी बेचैनी पसर गई थी उसके भीतर, जो वह बार-बार वहीं आता, ढूंढता, फिर किसी दिशा में निकल जाता। मानो मुंह की वही गंध उसे खींच ला रही हो। उसी की कमी उसे खटक रही हो।
उधर, बाकी के तीन मकोड़े भी एक दूसरे के पीछे कतार में कुछ दूर तो चलते रहे, लेकिन बीच में एक और साथी गड़बड़ हो गया। इसके बाद इनका भी व्यवहार बदल गया। थोड़ी देर पहले जैसे वे खुशी में मटक रहे थे, लेकिन अब कुछ सुस्त थे। उनकी चाल धीमी पड़ गई थी। वे दो थे फिर भी बार-बार एक-दूसरे का मुंह सूंघने नहीं आ रहे थे। बस चलते जा रहे थे। पता नहीं कहां तक जाना चाहते होंगे। हालांकि यह जरूर है कि वे एक-दो बार ठिठके जरूर लेकिन रुके नहीं। चलते रहे, मानो कहीं दूर के सफर पर निकले हों। चलते-चलते वे कहीं खो गए।

इधर यह मकोड़ा भी अकेले घूमते-घूमते थक गया। कुछ देर वहां पड़ी आधी खाई जामुन की गुठली के पास सुस्ताया और फिर एक अनाम दिशा की ओर बढ़ गया। वहां कोने में कुछ और मकोड़े, कच्ची सडक़ के पास अपनी दौड़धूप में लगे थे। पहले यह उन्हीं की तरफ बढ़ा, फिर न जाने क्यों अलग ही रास्तेे पर निकल गया। कुछ देर बाद वह फिर लौटा और पुराने दोस्तों की दिशा में बढऩे लगा। वैसे ही धरती का एक-एक इंच सूंघते हुए। दो कदम चलता फिर सूंघता, फिर दिशा तय करता फिर बढ़ जाता।

मुझे नहीं पता कि वह मकोड़ा अपने दोस्तों से दोबारा मिल पाया या नहीं, लेकिन कुछ देर उसके साथ रहकर मेरे भीतर का मकोड़ा भी धरती सूंघने को विवश हो गया। उन रास्तों की महक को महसूस करता रहा, जिन पर अब भी बाकी हैं अपनों के पैरों की निशान। साथ हैं या दूर हैं, लेकिन उनकी सुगंध नथूनों में अब भी स्थाई है। इसके बाद मन बस यही प्रार्थना करने को आया कि कोई मकोड़ा कभी अपनों से न बिछड़े। जानता हूं फार्मिक एसिड उन्हें एक-दूसरे का पता लगाने में मदद करता है, वैसे ही जैसे अच्छे-बुरे पलों की यादें हमें जोड़े रखती है।

हम सबकी यादें सलामत रहे और सलामत रहे मन की गलियारों में साथ की ख्वाहिश। जो मकौड़े बिछड़े हैं, वे कभी न कभी फिर मिलेंगे, साथ होंगे। इस उम्मीद का जिंदा रहना ही, जिंदगी का होना है। चार मकोड़े कुछ देर के साथ में और इससे ज्यादा क्या कह सकते थे। यह वही पाठ तो है जो हम अक्सर भूल जाते हैं।

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