प्रेम कैसे अपराध हो सकता है

भीड़ का अपना चरित्र होता है। वह आसपास अपने जैसे चेहरे-मोहरे देखना पसंद करती है। क्योंकि अलग दिखने और होने वाले लोग उसे खलते हैं। हम तय परिभाषाओं के परकोटे से ही क्यों घिरे रहना चाहते हैं। दुनिया काले-सफेद चौखानों से नहीं चलती है। आप दुश्मनी के नियम तो बना सकते हैं, लेकिन प्रेम को कैसे बांध पाएंगे। भीड़ तो हमेशा से नाक कटाकर खुदा दिखाती आई है।

सदियों से सामान्य व्यवहार यही सिखाने की कोशिश करता है कि जो सब कर रहे हैं वही जायजा है, जो कुछ ही लोगों तक सीमित है वह नाजायज है। असमान्य को बर्दाश्त न कर पाना भी एक तरह की असमान्यता है, इसे हम कभी स्वीकार ही नहीं कर पाते। क्योंकि भीड़ का हिस्सा होना दंभ को पोषित करता है कि वह किसी प्रजाति का हिस्सा है। व्यवस्था का भाग है और क्रम में खड़ा है। इससे इतर जो कुछ भी है, वह अनैतिक, अप्राकृतिक और असमान्य है।

जब भी हम समलैंगिकों की बात करते हैं, तब इसी सोच और समझ के आसपास खड़े होते हैं। क्योंकि परेशानी हमारी नहीं है, इसलिए हम उसे समझने की जहमत भी नहीं उठाना चाहते। किसी और के लिए दिमाग को कष्ट देना हमने सीखा ही नहीं है। हम अपने ही मसलों में मसरुफ रहना पसंद करते हैं। इसलिए जो भी नया और अलग होता है, उसे पहली नजर में ही खारिज कर देते हैं। यही वजह है कि हम अब तक समलैंगिकों को लेकर कोई सोच ही नहीं बना पाए हैं। हमारे लिए वे उपहास व तिरस्कार के विषय से अधिक कुछ नहीं है।

सदियों में हम थर्ड जेंडर को ही मान्यता नहीं दे पाए, जबकि सब जानते हैं कि कोई व्यक्ति इस संसार में अपना लिंग खुद चयन करके नहीं आता है। आपका अस्तित्व जब आकार ले रहा होता है, तब किसी को पता नहीं होता है कि आप आबादी के किस हिस्से में शामिल होने जा रहे हैं। बावजूद इसके हम ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे थर्ड जेंडर कोई खुद चुनकर आता है। आपका लिंग और लैंगिक अभिरुचियां नैसर्गिक हैं, लेकिन थर्ड जेंडर के बारे सामान्य सोच ऐसा दर्शाती है, मानो यह विकृति और व्यक्तिगत अपराध है। हमारा इतिहास भी शिखंडी का सबसे उपयुक्त इस्तेमाल तो करता है, लेकिन उसे योद्धा का दर्जा नहीं देता।

न जाने क्यों हम दुनिया को एक लय में देखने के जुनून को जीते हैं। हमें लगता है कि हर चीज एक क्रम में हो, एक अनुशासन में रहे। उससे बाहर निकलना यानी समाज की मान्यताओं को खंडित करना, पथभ्रष्ट करना और सब बर्बाद कर देना है। ये व्यवस्थाएं, ये क्रम और अनुशासन वास्तव में किसलिए बनाए गए हैं, क्या सिर्फ इसलिए कि तयशुदा श्रेष्ठता बरकरार रहे। उसे कोई चुनौती न दे। वरना क्या वजह है कि किसी की नैसर्गिक क्षमता या अक्षमता को विकृति मान लिया जाए। किसी को अपाहिज और किसी को मानसिक रोगी करार दे दिया जाए। सामान्य न होना क्या इतना बड़ा अपराध है कि उसे चौराहे पर खड़ा कर गरियाने के अलावा कोई काम न दिया जाए।

प्रकृति के सामान्य नियम क्या सामान्य तौर पर ही सभी पर लागू होना चाहिए। अगर कहीं उसका लय टूटा है, कोई बदलाव आया है तो उसके लिए किसी को कमतर कैसे आंका जा सकता है। यह ठीक है कि उसका व्यवहार आपके जैसा नहीं है, अभिरुचियां अलग हैं, लेकिन इसके लिए उससे सम्मान से जीना का अधिकार क्यों छीन लेना चाहते हैं। अपराध की मूलभूत परिभाषा कहती है कि अपराध में अपराधी मन का शामिल होना जरूरी है। यही वजह है कि किसी जान चली जाने पर भी वह सामान्य दुर्घटना हो सकती है और दूसरी तरफ मामूली चोट भी जानलेवा हमला करार दी जा सकती है। दोनों में फर्क अपराधी मन का ही है।

वही फर्क हमको भी समझना होगा, क्योंकि हम जानते हैं कि सिर्फ मनुष्य ही नहीं 1500 अन्य प्रजातियों में भी समलैंगिक होते हैं। वे भी प्रकृति का ही हिस्सा हैं और जब तक वे किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। तब तक अपराधी नहीं कहे जा सकते। समाज प्रकृति के नियम मानने के लिए बाध्य हो सकता है, लेकिन प्रकृति को बाध्य नहीं किया जा सकता। उसे समझने की ईमानदार कोशिश जरूर हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने किसी अनैतिकता को नैतिकता जामा नहीं पहनाया है बल्कि असमान्य लैंगिक अभिरुचियों को मान्यता देनेे की कोशिश की है। दुनिया के 25 देश हमसे पहले ये कर चुके हैं, यहां तक कि उनके बीच विवाह को भी मान्यता दी जा चुकी है। असामान्य होना अपराध नहीं हो सकता और प्रेम तो कतई नहीं।

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