वह बपौती नहीं है

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने सदियों से स्त्री को गुलाम बनाकर उस पर शासन के दंभ को जी रहे पुरुषवादियों को एक और करारा झटका दिया है। धारा 497 को असंवैधानिक करार देते ही स्त्री पुरुषों की चंगुल से एक तरह से कानूनी तौर पर आजाद हो गई है। हालांकि मर्यादा समाज की संरचना को बनाए रखने में मददगार होती है, लेकिन एकतरफा अनुशासन और थोपे गए नियम सिर्फ शोषण का कारण बनते हैं।

वैसे इस केस की यात्रा भी बड़ी दिलचस्प है। अक्टूबर 2017 में केरल के एनआरआई जोसेफ शाइन ने धारा 497 के खिलाफ याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि यह धारा स्त्री और पुरुष के बीच असमान व्यवहार करती है। धारा के अनुसार यदि कोई पुरुष किसी विवाहित स्त्री के साथ उसके पति की सहमति अथवा मिलीभगत के बगैर संबंध बनाता है तो वह व्यभिचार का अपराधी होगा। यह बलातकार की श्रेणी में नहीं आएगा, लेकिन पुरुष को पांच वर्ष तक की सजा का प्रावधान था। जोसेफ का तर्क था कि व्यभिचार के मामले में सजा सिर्फ पुरुष को क्यों मिले। यदि यह अपराध है तो इसमें संबंधित स्त्री भी समान रूप से सहभागी होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान कोर्ट में अजीब तर्क आए। यहां तक कि केंद्र सरकार की तरफ से ही कहा गया कि इसके खत्म करने से विवाह नाम की संस्था ही बर्बाद हो जाएगी। उन्हें लगा कि यदि धारा खत्म हुई तो पुरुष बेरोकटोक विवाहित स्त्रियों से संपर्क बढ़ाएंगे और स्त्रियां भी निडर हो जाएंगी। जबकि शाइन का तर्क था कि यह समानता, व्यक्तिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का उल्लंघन है। तर्क-वितर्क के बाद अगस्त महीने में ही कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था कि विवाह एक पवित्र मसला है, लेकिन धारा 497 संविधान प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

हालंाकि इसके बाद भी केंद्र सरकार ने हार नहीं मानी और कोर्ट में तर्क रखा कि इस कानून के न रहने से न सिर्फ विवाह संस्था खतरे में पड़ जाएगी, बल्कि सामाजिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित होगा। व्यभिचार के कारण जीवनसाथी, बच्चे और परिवार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त होते हैं। हालांकि केंद्र के ये तर्क टिक नहीं पाए और अंतत: कोर्ट ने धारा के दंडात्मक प्रावधान को समाप्त कर दिया।

वैसे भी यह बड़ा हास्यास्पद था कि स्त्री का व्यभिचार पति की सहमति से हो तो अपराध नहीं होता था, लेकिन उसकी अपनी इच्छा से हो तो अपराध करार दिया जाता। यानी पति उसे संपत्ति की तरह भोगे और फिर किसी दूसरे के आगे डाल दे तब कुछ नहीं, लेकिन यदि वह स्वेच्छा से किसी को चुन ले तो अनर्थ। वैसा ही है कि अगर पांडव जुएं में अपनी स्त्री को हार जाएं और जीतने वाले उससे अभद्रता करे तो वह कोई अपराध नहीं होगा। पुरुषों के मामले में ऐसी-वैसी कोई पाबंदी कहीं है ही नहीं। वे सभी प्रकार की स्वेच्छाचारिता के लिए स्वतंत्र माने गए हैं।

सारे विधान और कानून पुरुषों ने बनाए हैं और शायद वे नहीं चाहते थे कि स्त्री को किसी भी सूरत में अपनी इच्छा से जीने का हक मिल सके। इसलिए धर्म शास्त्र से लेकर कानून तक में उसने उसे दोयम दर्जे पर ही रखा। सारे अधिकारों से वंचित, ताकि वह खुलकर उसका शोषण कर सके। उसे जानवर या संपत्ति की तरह रखे, इस्तेमाल करे और जब मन भर जाए तो चौराहे पर छोड़ दे या किसी और के हवाले कर दे। इस मामले में कोर्ट ने सही कहा कि यह सदियों से चली आ रही मानसिकता का ही नतीजा था। इसे खत्म कर देना ही बेहतर है। हालांकि कोर्ट ने विवाह का भी पूरा मान रखा और इसे तलाक के एक आधार के रूप में मान्यता दी है।

स्त्री को वश में करने का एक ही तरीका है स्नेह। जो अधिकार आप उस पर चाहते हैं वे स्नेह के साथ सहजता से हासिल किए जा सकत हैं। उस पर शासन करने की बर्बर सोच के लिए अब कहीं कोई जगह नहीं है। बेहतर होगा कि समाज और सरकार विवाह को बचाने के लिए पुरुषों को स्त्री का सम्मान करने और स्नेह से रखने-रहने की सीख दे, धाराओं की बेडिय़ों से इस नदी को वश में करना उनके बूते के बाहर की बात है। और हां फैसले के बाद कई लोगों को लग रहा है जैसे वह तुरंत निकल जाने वाली है, तो उन्हें अपने भय की वजह ढूंढना चाहिए। इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा।

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