जब एक संन्यासी शहर बदलता है

Osho

Acharya Rajnish

Swami Kailash Bharti, Indore

स्वामी कैलाश भारती 25 बरस के थे जब आचार्य रजनीश से मिलने के लिए पुणे पहुंच गए। उस समय वे धार जिले के किसी सुदुर गांव के स्कूल में टीचर थे। 190 रुपए तनख्वाह मिलती थी। वह न जाने कैसा आकर्षण था, जो उन्हें ओशो के पास ले गया। रजनीश ने अपना अंगूठा उनके सिर के बीचोंबीच रख दिया। कितने पल, कितने घड़ी, उन्हें याद नहीं, लेकिन उन पलों ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

25 बरस का जो युवा पुणे गया था, वह लौट कर अपने कर्मक्षेत्र में आया तो लेकिन वैसे नहीं जैसे बाकी लोग लौटते हैं। वे धार में ही ओशो सुमार्ग ध्यान केंद्र चलाने लगे। सुबह लोगों को ध्यान कराते, शाम को वीडियो पर आचार्य रजनीश के प्रवचनों से रूबरू कराते। व्यक्तिगत परिवार में रुचि ही नहीं रह गई थी। समाज को ही अपना परिवार बना लिया और लोगों को ध्यान से जोडऩे को ही अपना नैतिक कर्तव्य मान लिया।

वर्ष बीतते गए और वे ध्यान में ही डूबे रहे। अभी भी जब उनसे मिलेंगे तो उनकी आंखें ही भीतर का सारा हाल बता देंगी। मैं जिंदगी में कई तरह के लोगों से मिला हूं, लेकिन उनके जैसी शांत आंखें किसी की नहीं देखी। उन्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे भीतर कोई हलचल ही नहीं। विचारों का कोई उपद्रव मन के गलियारों में बचा ही नहीं। वे लोगों से जुड़ते रहे और उन्हें ध्यान से जोड़ते रहे। इस स्थिति तक की शासकीय शिक्षक की नौकरी से मिलने वाली पूरी तनख्वाह उसी में होम कर देते। क्योंकि व्यक्तिगत कोई जरूरत बची भी नहीं थी।

इसी क्रम में लोगों को खुद के और करीब लाने के लिए उन्होंने ध्यान शिविरों की शुरुआत की। ओशो के जन्मदिवस पर 11 दिन के विशेष ध्यान शिविर लगाए जाते। धार में फॉरेस्ट के ईको सेंटर से उनका प्रयास शुरू हुआ। पहली ही बार में हाल एक-दो दिन बाद ही छोटा पडऩे लगा तो अलगे वर्ष जीराबाग कॉलोनी के विशाल हॉल में शिविर लगाया।

लोग आते और रोज ओशो प्रणित अलग-अलग ध्यान पद्धतियों का अभ्यास करते। कई लोगों को पहली बार खुद के भीतर उतरने का मौका मिला। ध्यान के बाद रोज सभी को भरपेट स्वादिष्ट नाश्ता भी कराया जाता और यह सब स्वामी कैलाश भारती खुद से ही करते। फिर बाद में त्रिमूर्ति नगर में एक बड़ा हॉल बना लिया गया। ओशो सुमार्ग ध्यान केंद्र बन गया। वहां शिविर होने लगा। कुछ बरस यह क्रम ऐसे ही चलता रहा।

एक दिन अनायास ही इंदौर में उनसे भेंट हुई। बताया कि वे सेवानिवृत्ति के बाद इंदौर ही आ गए हैं। आज फिर मुलाकात हुई तो घर छोडऩे के बहाने उनके साथ गया। वे सत्यसाईं चौराहे से आगे टहल रहे थे, जो उनके घर से ढाई-तीन किमी दूर होगा। घर पहुंचे तो पाया कि दरवाजे पर कोई ताला नहीं लगा था। मैंने सवालों भरी नजर से देखा तो हंसने लगे कि किसी को कुछ ले जाना हो तो शौक से ले जाए।

मैंने धार छोडऩे पर सवाल किया तो बड़े संकोच के साथ बताने लगे कि ध्यान केंद्र में एक-दो संन्यासी रख लिए थे। उनके भोजन आदि के इंतजाम कर दिए थे। वे लोगों को ध्यान का अभ्यास कराते थे। कुछ दिन सब ठीक चला, लेकिन बाद में वे ये जताने लगे कि आश्रम उनका है। चार-पांच गुंडों को ले आए, कुछ परिजन को ले आए और आश्रम पर कब्जा करने की कोशिश की। इसके बाद मैंने धार छोड़ दिया। मन में आया कि अब इंदौर चलते हैं अब यही केंद्र चल रहा है। धार के आश्रम में भी केंद्र है, लेकिन उसे एक स्कूल को दे दिया है।

हालांकि वे यहां भी वैसे ही केंद्र चलाते हैं, 23 हजार रुपए पेंशन मिलती है और 15 हजार रुपए महीने के किराए पर मकान ले रखा है। मैंने कुछ पूछने की कोशिश की तो कहने लगे कि अपना जीवन तो ऐसे ही माइनस में चला है। वहां भी मुझे तनख्वाह कम ही पड़ती थी। मैं और पूछने की कोशिश करने लगा तो कहने लगे वर्तमान में जीने का यही आनंद है। चिंताओं से हमेशा माइनस ही रहते हैं।

उनके साथ बिताए कुछ पल अनूठे थे। फिर मन में उन लोगों का ख्याल आया जिनके कारण वे शहर छोडऩे को विवश हो गए। बाबा भारती और डाकू खडक़सिंह की कहानी दिमाग में कौंध गई। अगर लोग संन्यासी का भरोसा तोडऩे में नहीं सकुचा रहे हैं क्या रह जाएगा। एक व्यक्ति जो पूरी जिंदगी बिना किसी स्वार्थ के लोगों को खुद से जोडऩे में लगा है लोग उससे उसकी आध्यात्मिक पूंजी हासिल करने के बजाय उन्हीं ईट-पत्थर के मकानों में लगे हैं।

जानकर दु:ख हुआ कि उस घटना के बाद उन्होंने न सिर्फ शहर बदला लोगों पर भरोसा करना ही सीमित किया, लोगों से मेल-मिलाप में एक दूरी रखना शुरू कर दिया। खुशी इस बात की है कि उन्होंने लोगों को साधना करना नहीं छोड़ा। ध्यान की जो पूंजी रजनीश ने उन्हें सौंपी थी, वे पूरे सामथ्र्य से उसे लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

चित्र- स्वामीजी के जीवन का वह ऐतिहासिक क्षण जब ओशो ने उनके सर पर अपना अंगूठा रख दिया था. दूसरा चित्र स्वामी कैलाश भारती जी का और आखिर में उनके केंद्र में रखी आचार्य रजनीश की चरण पादुकाएं.

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