ठंड के साथ कई ठाठ पुराने निकले

आइये कुछ अच्छी बातें करते हैं। मौसम के बदलाव ने रफ्तार पकड़ ली है। थर्मामीटर का पारा लुढक़ रहा है। शाम शाल के आगोश में सिर रखने को बेकरार है और सुबह टोपी में कान दबाना चाहती है। बारिश की बेपरवाही से अस्त-व्यस्त हुई प्रकृति फिर खुद में लौट रही है। सुबह का सूरज आंखें लाल करके नहीं आ रहा। धीरे से गुनगुनाते हुए आ रहा है और शाम को जाते वक्त हाथ हिलाते हुए जाता है। ठंडी हवाओं को उसकी मौजूदगी से दिक्कत न हो इसलिए इन दिनों वह जल्दी निकल जाता है।

अमावस अभी गुजरी है, मानो कहीं छुपकर चांद ही ठंडी हवाओं के जरिये सभी को गुदगुदाकर शरारत कर रहा था। अब धीरे-धीरे वह भी सामने आने लगेगा। अपने आसपास रंगीन घेरा बनाए, वैसे ही जैसे पहाड़ों पर कोई अंगीठी लेकर चल रहा हो। उसका ताप उसे गर्म करने के साथ दूसरों को रोशनी दिखा रहा हो। उसके होने का अहसास कर रहा हो। वैसे चांदनी अब ज्यादा इठला नहीं पाएगी, क्योंकि कुछ ही दिनों में धुंध आकाश को धरती पर खींचकर ले आएगी और वे दोनों एक-दूसरे में वैसे ही खो जाएंगे, जैसे बिछड़े प्रेमी अरसे के बाद एक-दूसरे से मिल रहे हों।
नदियों से बस्तियों का अब पहले जैसा जुड़ाव नहीं रहा। सुनते हैं जिन शहरों में नदियां होती हैं वहां का मिजाज अलग होता है।

ठंड में नदी अपने दामन की बूंदों को गर्म कर लेती है। एक डुबकी लगाते ही सारी ठंड दूर दुबक जाती है। बाकी घरों में टंकी से आते पानी की बौछार नहाने का समय खींच देती है। थोड़े गाने, थोड़े श्लोक और थोड़ी ठिठुरन गीजर के साथ भी सुर मिला ही लेती है। अब तक ऐंठ रहे पंखे और कूलर खुद के लिए कोना तलाशते नजर आ रहे हैं। वैसे पंखों को मच्छरों का वरदान है, इसलिए उनकी गति अब मंथर जरूर होती है, लेकिन पूरी तरह थमती नहीं।

संदूक में दबा कंबल और अलमारी में तह कर रखे गरम कपड़े खुश हैं। बाहर निकलने की तैयारी कर रहे हैं। खुश इस बात से कि उन्हें जल्द ही नेफ्थेलिन की गोलियों से आने वाली कसैली बदबू से निजात मिल जाएगी। पहले थोड़ी धूप देखेंगे फिर ड्राय क्लीन होंगे और फिर चल पड़ेंगे किसी जिस्म पर सवार होकर तफरीह को। गरम कपड़ों की भी अनूठी यादें होती हैं। जब संदूक खुलेगा तो वे यादें भी फिर खुली हवा में सांस ले पाएंगी। दादाजी का फर वाला कोट, दादी का पश्मिना और नानी की दी हुई फुंदे वाली टोपियां बचपन की सैर करा देती हैं। दादाजी की छड़ी और उस पर उनके हाथों की गर्माहट अब तक महसूस होती है। दादी की शॉल में तो जैसे उनकी सारी हिदायतें छुपी बैठी हैं। ओढ़ते ही खुद को बड़ा महसूस करने लगता हूं, सिर पर उनके गर्म तेल की मालिश होने लगती है।

किचन भी खुश है कि अब अक्सर दावत होगी। दादी की जगह पहुंच चुकी मां, सभी के लिए बादाम भिगोएंगी, खसखस पीसेंगी। खजूर का दूध उबलेगा। परहेज करने वालों को भी डांटकर सेहतमंद चीजें खिलाई जाएंगी। माइक्रोवेव कोने में होगा और पुराना सिल बट्टा फिर दमक उठेगा। और हमारी छत सबसे ज्यादा इठला रही है। सुबह औंस की बूंदों के साथ खेलेगी और दोपहर में मोहल्ले की आंटियां और बच्चे धूप सेंकने आ पहुंचेंगे। पहाड़ों पर बर्फ जमेगी और यहां दरवाजों के पीछे छुप गए रिश्तों की बर्फ फिर पिघलने लगेगी।

बाजार में नए स्वाद होंगे। मुरैना की गजक, लखनऊ की गुलाब वाली रेवड़ी, आगरा का पेठा और गर्मागर्म जलेबी। भुनी हुई मुंगफली के साथ गुड़ और चना स्वाद का देशी अंदाज जगा देगा। गाजर, अमरुद और शकरकंद के पकवान, पालक और मैथी के साथ हाजमा बनाए रखेंगे। मैदान में दौड़ते नजर आएंगे बच्चे और बगीचों में हाथ फैलाकर तेज चलते दिखाई देंगे बंदर टोपी पहने बुजुर्ग। बगीचे भी उनके लिए घास के तिकोनों को और हरा कर देंगे, पास की क्यारियों में लगे पौधे फूल खिला देंगे।

फिर यही ठंड बेघरों की जिंदगी में और घना कोहरा भर देगी। फुटपाथ पर कंपकंपाते जिस्मों की हड्डियों को कडक़ कर देगी। बर्तन वाली के हाथ में पानी की रेखाएं गहरी हो जाएंगी, पुराने स्वेटर में उसके भीतर की कंपकंपी रुक नहीं पाएगी। गांव के पुराने सरकारी स्कूल की आधी छत और अधूरी दीवारें हवाएं नहीं रोक पाएंगी। बच्चों के कान में सीटी बजाएंगी, उनकी नाक में से बह जाएंगी।

Loading...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.